🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏

अध्याय 143

महाभारत संस्कृत - शांतिपर्व

1 [भ] ततस तं लुब्धकः पश्यन कृपयाभिपरिप्लुतः
कपॊतम अग्नौ पतितं वाक्यं पुनर उवाच ह

2 किम ईदृशं नृशंसेन मया कृतम अबुद्धिना
भविष्यति हि मे नित्यं पातकं हृदि जीवतः

3 स विनिन्दन्न अथात्मानं पुनः पुनर उवाच ह
धिन माम अस्तु सुदुर्बुद्धिं सदा निकृतिनिश्चयम
शुभं कर्म परित्यज्य यॊ ऽहं शकुनिलुब्धकः

4 नृशंसस्य ममाद्यायं परत्यादेशॊ न संशयः
दत्तः सवमांसं ददता कपॊतेन महात्मना

5 सॊ ऽहं तयक्ष्ये परियान पराणान पुत्रदारं विसृज्य च
उपदिष्टॊ हि मे धर्मः कपॊतेनातिधर्मिणा

6 अद्य परभृति देहं सवं सर्वभॊगैर विवर्जितम
यथा सवल्पं जलं गरीष्मे शॊषयिष्याम्य अहं तथा

7 कषुत्पिपासातप सहः कृशॊ धमनि संततः
उपवासैर बहुविधैश चरिष्ये पारलौकिकम

8 अहॊ देहप्रदानेन दर्शितातिथि पूजना
तस्माद धर्मं चरिष्यामि धर्मॊ हि परमा गतिः
दृष्टॊ हि धर्मॊ धर्मिष्ठैर यादृशॊ विहगॊत्तमे

9 एवम उक्त्वा विनिश्चित्य रौद्रकर्मा स लुब्धकः
महाप्रस्थानम आश्रित्य परययौ संशितव्रतः

10 ततॊ यष्टिं शलाकाश च कषारकं पञ्जरं तथा
तांश च बद्धा कपॊतान स संप्रमुच्यॊत्ससर्ज ह

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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