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अध्याय 14

महाभारत संस्कृत - भीष्मपर्व

1 [व] अथ गावल्गणिर धीमान समराद एत्य संजयः
परत्यक्षदर्शी सर्वस्य भूतभव्य भविष्यवित

2 धयायते धृतराष्ट्राय सहसॊपेत्य दुःखितः
आचष्ट निहतं भीष्मं भरतानाम अमध्यमम

3 संजयॊ ऽहं महाराज नमस ते भरतर्षभ
हतॊ भीष्मः शांतनवॊ भरतानां पितामहः

4 ककुदं सर्वयॊधानां धाम सर्वधनुष्मताम
शरतल्पगतः सॊ ऽदय शेते कुरुपितामहः

5 यस्य वीर्यं समाश्रित्य दयूतं पुत्रस तवाकरॊत
स शेते निहतॊ राजन संख्ये भीष्मः शिखण्डिना

6 यः सर्वान पृथिवीपालान समवेतान महामृधे
जिगायैक रथेनैव काशिपुर्यां महारथः

7 जामदग्न्यं रणे रामम आयॊध्य वसु संभवः
न हतॊ जामदग्न्येन स हतॊ ऽदय शिखण्डिना

8 महेन्द्रसदृशः शौर्ये सथैर्ये च हिमवान इव
समुद्र इव गाम्भीर्ये सहिष्णुत्वे धरा समः

9 शरदंष्ट्रॊ धनुर वक्त्रः खड्गजिह्वॊ दुरासदः
नरसिंहः पिता ते ऽदय पाञ्चाल्येन निपातितः

10 पाण्डवानां महत सैन्यं यं दृष्ट्वॊद्यन्तम आहवे
परवेपत भयॊद्विग्नं सिंहं दृष्ट्वेव गॊगणः

11 परिरक्ष्य स सेनां ते दशरात्रम अनीकहा
जगामास्तम इवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम

12 यः स शक्र इवाक्षॊभ्यॊ वर्षन बाणान सहस्रशः
जघान युधि यॊधानाम अर्बुदं दशभिर दिनैः

13 स शेते निष्टनन भूमौ वातरुग्ण इव दरुमः
तव दुर्मन्त्रिते राजन यथा नार्हः स भारत

अध्याय 1
अध्याय 1
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