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अध्याय 82

महाभारत संस्कृत - आदिपर्व

1 [व] सवर्गतः स तु राजेन्द्रॊ निवसन देव सद्मनि
पूजितस तरिदशैः साध्यैर मरुद्भिर वसुभिस तथा

2 देवलॊकाद बरह्मलॊकं संचरन पुण्यकृद वशी
अवसत पृथिवीपालॊ दीर्घकालम इति शरुतिः

3 स कदा चिन नृपश्रेष्ठॊ ययातिः शक्रम आगमत
कथान्ते तत्र शक्रेण पृष्टः स पृथिवीपतिः

4 [षक्र] यदा स पूरुस तव रूपेण राजञ; जरां गृहीत्वा परचचार भूमौ
तदा राज्यं संप्रदायैव तस्मै; तवया किम उक्तः कथयेह सत्यम

5 [य] गङ्गायमुनयॊर मध्ये कृत्स्नॊ ऽयं विषयस तव
मध्ये पृथिव्यास तवं राजा भरातरॊ ऽनत्याधिपास तव

6 अक्रॊधनः करॊधनेभ्यॊ विशिष्टस; तथा तितिक्षुर अतितिक्षॊर विशिष्टः
अमानुषेभ्यॊ मानुषाश च परधाना; विद्वांस तथैवाविदुषः परधानः

7 आक्रुश्यमानॊ नाक्रॊशेन मन्युर एव तितिक्षतः
आक्रॊष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति

8 नारुं तुदः सयान न नृशंसवादी; न हीनतः परम अभ्याददीत
ययास्य वाचा पर उद्विजेत; न तां वदेद रुशतीं पापलॊक्यम

9 अरुं तुदं पुरुषं रूक्षवाचं; वाक कण्टकैर वितुदन्तं मनुष्यान
विद्याद अलक्ष्मीकतमं जनानां; मुखे निबद्धां निरृतिं वहन्तम

10 सद्भिः पुरस्ताद अभिपूजितः सयात; सद्भिस तथा पृष्ठतॊ रक्षितः सयात
सदासताम अतिवादांस तितिक्षेत; सतां वृत्तं चाददीतार्य वृत्तः

11 वाक सायका वदनान निष्पतन्ति; यैर आहतः शॊचति रार्त्य अहानि
परस्य वा मर्मसु ये पतन्ति; तान पण्डितॊ नावसृजेत परेषु

12 न हीदृशं संवननं तरिषु लॊकेषु विद्यते
यथा मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक

13 तस्मात सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं कव चित
पूज्यान संपूजयेद दद्यान न च याचेत कदा चन

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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