🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏

अध्याय 174

महाभारत संस्कृत - आदिपर्व

1 [आर्ज] अस्माकम अनुरूपॊ वै यः सयाद गन्धर्व वेदवित
पुरॊहितस तम आचक्ष्व सर्वं हि विदितं तव

2 [ग] यवीयान देवलस्यैष वने भराता तपस्यति
धौम्य उत्कॊचके तीर्थे तं वृणुध्वं यदीच्छथ

3 [वै] ततॊ ऽरजुनॊ ऽसत्रम आग्नेयं परददौ तद यथाविधि
गन्धर्वाय तदा परीतॊ वचनं चेदम अब्रवीत

4 तवय्य एव तावत तिष्ठन्तु हया गन्धर्वसत्तम
कर्मकाले गरहीष्यामि सवस्ति ते ऽसव इति चाब्रवीत

5 ते ऽनयॊन्यम अभिसंपूज्य गन्धर्वः पाण्डवाश च ह
रम्याद भागी रथी कच्छाद यथाकामं परतस्थिरे

6 तत उत्कॊचनं तीर्थं गत्वा धौम्याश्रमं तु ते
तं वव्रुः पाण्डवा धौम्यं पौरॊहित्याय भारत

7 तान धौम्यः परतिजग्राह सर्ववेदविदां वरः
पाद्येन फलमूलेन पौरॊहित्येन चैव ह

8 ते तदाशंसिरे लब्धां शरियं राज्यं च पाण्डवाः
तं बराह्मणं पुरस्कृत्य पाञ्चाल्याश च सवयंवरम

9 मातृषष्ठास तु ते तेन गुरुणा संगतास तदा
नाथवन्तम इवात्मानं मेनिरे भरतर्षभाः

10 स हि वेदार्थ तत्त्वज्ञस तेषां गुरुर उदारधीः
तेन धर्मविदा पार्था याज्याः सर्वविदा कृताः

11 वीरांस तु स हि तान मेने पराप्तराज्यान सवधर्मतः
बुद्धिवीर्यबलॊत्साहैर युक्तान देवान इवापरान

12 कृतस्वस्त्ययनास तेन ततस ते मनुजाधिपाः
मेनिरे सहिता गन्तुं पाञ्चाल्यास तं सवयंवरम

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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