भक्त व संत (55)

भक्त मीरा बाई जी (Bhagat Meera Bai Ji)

राजस्थान की भूमि साहस व शौर्य के लिए प्रसिद्ध है| भारत में हुए साठ प्रतिशत युद्ध इसी राज्य की जमीन पर हुए| युद्धों की इस भूमि पर प्रेम की मूर्ति भी अवतरित हुई जिसका नाम था मीरा!

भक्त नामदेव जी (Bhagat Namdev Ji)

भूमिका: परमात्मा ने सब जीवो को एक - सा जन्म दिया है| माया की कमी या फिर जीवन के धंधो के कारण लोगो तथा कई चालाक पुरुषों ने ऐसी मर्यादा बना दी कि ऊँच - नीच का अन्तर डाल दिया| उसी अन्तर ने करोडों ही प्राणियों को नीचा बताया| परन्तु…

भक्त कबीर दास जी (Bhagat Kabir Das Ji)

भूमिका: संत कबीर (Sant Kabir Ji) का स्थान भक्त कवियों में ध्रुव तारे के समान है| जिनके शब्द, साखी व रमैनी आज भी उतने ही प्रसिद्ध हैं जितने कि उनके समय में थे|

राजा जनक (Raja Janak)

जनक जी एक धर्मी राजा थे| उनका राज मिथिलापुरी में था| वह एक सद्पुरुष थे| न्यायप्रिय और जीवों पर दया करते थे| उनके पास एक शिव धनुष था| वह उस धनुष की पूजा किया करते थे| आए हुए साधू-संतों को भोजन खिलाकर स्वयं भोजन करते थे|

भक्त धन्ना जी (Bhagat Dhanna Ji)

परिचय: भक्त धन्ना जी का जन्म श्री गुरु नानक देव जी से पूर्व कोई 53 वर्ष पहले माना जाता है| आपका जन्म मुंबई के पास धुआन गाँव में एक जाट घराने में हुआ| आप के माता पिता कृषि और पशु पालन करके अपना जीवन यापन करते थे| वह बहुत निर्धन…

भक्त सूरदास जी (Bhagat Surdas Ji)

भक्त सूरदास जी विक्रमी सम्वत सोलहवीं सदी के अंत में एक महान कवि हुए हैं, जिन्होंने श्री कृष्ण जी की भक्ति में दीवाने हो कर महाकाव्य 'सूर-सागर' की रचना की| आप एक निर्धन पंडित के पुत्र थे तथा 1540 विक्रमी में आपका जन्म हुआ था| ऐसा अनुमान है कि आप…

भक्त ध्रुव जी (Bhagat Dhruv Ji)

भूमिका: जो भक्ति करता है वह उत्तम पदवी, मोक्ष तथा प्रसिद्धि प्राप्त करता है| यह सब भगवान की लीला है| सतियुग में एक ऐसे ही भक्त हुए हैं जिनका नाम ध्रुव था|

भक्त बुल्ले शाह जी (Bhagat Bulleh Shah Ji)

भूमिका: पंजाब की माटी की सौंधी गन्ध में गूंजता एक ऐसा नाम जो धरती से उठकर आकाश में छा गया| वे ही भारतीय सन्त परम्परा के महान कवि थे जो पंजाब की माटी में जन्मे, पले और उनकी ख्याति पूरे देश में फैली| ऐसे ही पंजाब के सबसे बड़े सूफी…

भक्त शेख फरीद जी (Bhagat Shek Farid Ji)

देखु फरीद जु थीआ दाड़ी होई भूर || अगहु नेड़ा आइआ पिछा रहिआ दूरि || १ ||

संत तुलसीदास जी (Sant Tulsidas Ji)

भूमिका: श्रीमद भागवत के बाद दूसरे स्थान पर भारतीय जन मानस को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला ग्रंथ रामचरितमानस ही रहा है| ये दोनों ग्रंथ ही सर्वाधिक लोकप्रिय रहे हैं|

भक्त रविदास जी (Bhagat Ravidas Ji)

(जन्म और माता-पिता)

भक्त पीपा जी (Bhagat Pipa Ji)

सतिगुरु नानक देव जी महाराज के अवतार धारण से कोई ४३ वर्ष पहले गगनौर (राजस्थान) में एक राजा हुआ, जिसका नाम पीपा था| अपने पिता की मृत्यु के बाद वह राज तख्त पर विराजमान हुआ|

भक्त प्रहलाद जी (Bhagat Prhlad Ji)

आदिकाल में दैत्य तथा देवता भारतवर्ष में नवास करते थे| उत्तराखण्ड में श्री राम चन्द्र के अवतार से पूर्व भक्त प्रहलाद का जन्म अत्याचारी दैत्य राजा हिरनाक्श के शासनकाल में हुआ| इस भक्त की महिमा अपरंपार है|

गनिका जी (Ganika Ji)

गनिका एक वेश्या थी जो शहर के एक बाजार में रहती थी| वह सदा पाप कर्म में कार्यरत रहती थी| उसके रूप और यौवन सब बाजार में बिकते रहते थे| वह मंदे कर्म करके पापों की गठरी बांधती जा रही थी|

भक्त सुदामा (Bhagat Sudama)

प्रभु के भक्तों की अनेक कथाएं हैं, सुनते-सुनते आयु बीत जाती है पर कथाएं समाप्त नहीं होतीं| सुदामा श्री कृष्ण जी के बालसखा हुए हैं| उनके बाबत भाई गुरदास जी ने एक पउड़ी उच्चारण की है|

भक्त सधना जी (Bhagat Sadhna Ji)

मानव जीवन में सदा परिवर्तन आता रहता है| वह परिवर्तन किसी न किसी घटना पर होता है और जीवन को बदल कर रख देता है| भक्त सधना कसाई था लेकिन प्रभु भक्त बन गया| आपकी कथा श्रवण कीजिए|

भक्त सैन जी (Bhagat Sain Ji)

भूमिका: भक्तों की महिमा अनन्त है| हजारों ही ऐसे भक्त हैं जिन्होंने परमात्मा का नाम जप कर भक्ति करके संसार में यश कमाया| ऐसे भक्तों में "सैन भगत जी" का भी नाम आता है|

साखी ब्रह्मा और सरस्वती की (Sakhi Brahma Aur Sarasvati Ki)

चारे वेद वखाणदा चतुर मुखी होई खरा सिआणा |लोका नो समझाइदा वेख सुरसवती रूप लुभाना |

महर्षि वाल्मीकि जी (Maharshi Walmiki Ji)

महर्षि वाल्मीकि का जन्म त्रैता युग में अस्सू पूर्णमाशी को एक श्रेष्ठ घराने में हुआ| आप अपने आरम्भिक जीवन में बड़ी तपस्वी एवं भजनीक थे| लेकिन एक राजघराने में पैदा होने के कारण आप शस्त्र विद्या में भी काफी निपुण थे|

भक्त परमानंद जी (Bhagat Parmanand Ji)

भूमिका: भक्त परमानंद जी अतीत ज्ञानी, विद्वान, हरि भक्त तथा कवि हुए हैं|

राजा हरिचन्द (Raja Harichand)

सुख राजे हरी चंद घर नार सु तारा लोचन रानी |साध संगति मिलि गांवदे रातीं जाइ सुणै गुरबाणी |

राजा बली (Raja Bali)

सद्पुरुष कहते हैं, पुरुष को तपस्या करने से राज मिलता है, पर राज प्राप्ति के बाद उसको नरक भोगना पड़ता है, 'तपो राज तथा राजो नरक' इसका मूल भावार्थ यह है कि राज प्राप्ति के पश्चात मनुष्य अहंकारी हो जाता है|

भक्त जयदेव जी (Bhagat Jaidev Ji)

प्रेम भगति जै देऊ करि गीत गोबिंद सहज धुनि गावै |लीला चलित वखानदा अंतरजामी ठाकुर भावै |

भक्त रामानंद जी (Bhagat Ramanand Ji)

भूमिका: पवित्र गंगा के किनारे काशी नगरी स्थित है जिसे बनारस भी कहा जाता है| इस नगरी में पन्द्रवी सदी में कभी घर-घर लोग रामानंद जी को याद करते थे| आप एक महा पुरुष हुए हैं| आप वैष्णव मत के नेता और योगी हुए हैं|

भक्त रहीम जी (Bhagat Rahim Ji)

भूमिका: अब्दुल रहीम खानखाना का नाम हिन्दी साहित्य जगत में महत्वपूर्ण रहा है| इनका नाम साहित्य जगत में इतना प्रसिद्ध है कि इन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है|

भक्त बेनी जी (Bhagat Beni Ji)

भक्तों की दुनिया बड़ी निराली है| प्रभु भक्ति करने वालों की गिनती नहीं हो सकती| इस जगत में अनेकों महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने प्रभु के नाम के सहारे जीवन व्यतीत किया तथा वह इस जगत में अमर हुए, जबकि अन्य लोग जो मायाधारी थे, मारे गए तथा उनका कुछ न…

सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र जी (Satywadi Raja Harishchandr Ji)

तिनी हरी चंदि प्रिथमी पति राजै कागदि कीम न पाई ||अउगणु जानै त पुंन करे किउ किउ नेखासि बिकाई ||२||

बाबा सुन्दर दास जी (Baba Sunder Das Ji)

जब कोई प्राणी परलोक सिधारता है तो उसके नमित रखे 'श्री गुरु ग्रंथ साहिब' के पाठ का भोग डालने के पश्चात 'रामकली राग की सद्द' का भी पाठ किया जाता है| गुरु-मर्यादा में यह मर्यादा बन गई है| यह सद्द बाबा सुन्दर दास जी की रचना है| सतिगुरु अमरदास जी …

गौतम मुनि और अहल्या की साखी (Gautam Muni or Ahlya ki Sakhi)

प्राचीन काल से भारत में अनेक प्रकार के प्रभु भक्ति के साथ रहे हैं| उस पारब्रह्म शक्ति की आराधना करने वाले कोई न कोई साधन अख्तयार कर लेते थे जैसा कि उसका 'गुरु' शिक्षा देने वाला परमात्मा एवं सत्य मार्ग का उपदेश करता था भाव-प्रभु का यश गान करता था|

अजामल जी (Ajamal Ji)

अजामल उधरिआ कहि ऐक बार ||

भक्त त्रिलोचन जी (Bhagat Trilochan Ji)

यह भक्त जी भी दक्षिण देश की तरफ से हुए हैं तथा भक्त नामदेव जी के गुरु-भाई वैश्य जाति से थे और ज्ञान देव जी (ज्ञानेश्वर) के शिष्य थे| उन से दीक्षा प्राप्त की थी| दक्षिण में आप की ख्याति भी भक्त नामदेव जी की तरह बहुत हुई तथा जीव…

गजिन्द्र हाथी (Gajindra Hathi)

एक निमख मन माहि अराधिओ गजपति पारि उतारे ||

भक्त भीखण जी (Bhagat Bikhan Ji)

भूमिका: न्यौछावर जाए शहीदों के सिरताज, ब्रह्म ज्ञानी आप परमेश्वर सतिगुरु अर्जन देव जी के, जिन्होंने हर एक महापुरुष तथा परमेश्वर भक्त का सत्कार किया| हिन्दू मुसलमान के सत्कार के साथ उनका भी आदर सत्कार किया, जिनको ब्रह्मण समाज निम्न समझता था| मनव जाति का सत्कर किया

भक्त अम्ब्रीक जी (Bhagat Ambrik Ji)

अंबरीक मुहि वरत है राति पई दुरबासा आइआ|भीड़ा ओस उपारना उह उठ नहावण नदी सिधाइआ|

राजा उग्रसैन (Raja Ugrsaen)

इस धरती पर अनेकों धर्मी राजा हुए हैं जिनका नाम आज तक बड़े आदर से लिया जाता है| उनका धर्म उजागर है| ऐसे राजाओं में यदुवंशी राजा उग्रसैन भी हुआ है| उसका धर्म-कर्म बहुत ही प्रसिद्ध था| वह मथुरा पुरी पर राज करता था| यमुना के दोनों किनारों पर उसी…

संत तुकाराम जी (Sant Tukaram Ji)

हमारे यहाँ तीर्थ यात्रा का बहुत ही महत्त्व है। पहले के समय यात्रा में जाना बहुत कठिन था। पैदल या तो बैल गाड़ी में यात्रा की जाती थी। थोड़े थोड़े अंतर पे रुकना होता था।

भक्त अंगरा जी (Bhagat Angra Ji)

 गुरु ग्रंथ साहिब में एक तुक आती है:

भक्त विदुर (Bhagat Vidur)

आइआ सुणिआ बिदर दे बोले दुरजोधन होइ रुखा |घरि असाडे छडि के गोले दे घरि जाहि कि सुखा |

भाई समुन्दा जी (Bhai Samunda Ji)

अनदिनु सिमरहु तासु कऊ जो अंति सहाई होइ || इह बिखिआ दिन चारि छिअ छाडि चलिओ सभु कोइ || का को मात पिता

साखी पिंगला की (Sakhi Pingla ki)

अजामलु पिंगुला लुभतु कुंचरु गऐ हरि कै पासि ||

सत्ता और बलवंड (Satta or Balwand)

सत्ता और बलवंड दोनों सगे भाई थे| वह भाट जाति से थे और पांचवें पातशाह श्री गुरु अर्जुन देव जी के समय उनकी हजूरी में कीर्तन किया करते थे| रागों में निपुण होने के कारण वह अच्छे रबाबी बन गए|

छज्जू झीवर (Chjju Jhivar)

श्री हरिक्रिशन धिआईऐ जिस डिठै सभि दुखि जाइ || सतिगुरु हरिकृष्ण साहिब जी दिल्ली को जा रहे थे| आप को बालक रूप में गुरुगद्दी पर विराजमान देखकर कई अज्ञानी तथा अहंकारी पंडित मजाक करते थे| उनके विचार से गुरु साहिब के पास कोई आत्मिक शक्ति नहीं थी| ऐसे पुरुष जब…

बीबी बसन्त लता जी (Bibi Basant Lata Ji)

श्री कलगीधर पिता जी की महिमा अपरम्पार है, श्री आनंदपुर में चोजी प्रीतम ने बड़े कौतुक किए| अमृत तैयार करके गीदड़ों को शेर बना दिया| धर्म, स्वाभिमान, विश्वास, देश-भक्ति तथा प्रभु की नई जोत जगाई| सदियों से गुलाम रहने के कारण भारत की नारी निर्बल हो कर सचमुच ही मर्द…

हम मतवाले हैं चले साँई के देस

हम मतवाले हैं चले साँई के देस - 2जहाँ सभी को चैन मिलेगा कभी न लागे ठेसहम मतवाले हैं चले साँई के देस

साखी राजा भक्तों की (Sakhi Raja Bhakton Ki)

१. राजा परीक्षित-राजा परीक्षित अर्जुन (पांडव) का पौत्रा और अभिमन्यु का पुत्र था| महाभारत के युद्ध के बाद यह राजा बना| कलयुग में इसकी चर्चा हुई| पांडवों की संतान का यह एक महान पुरुष था, इसको हस्तिनापुर के सिंघासन पर बिठा कर पांचों पांडव द्रौपदी सहित हिमालय पर्वत को चले…

श्री साईं बाबा जी

श्री साईं बाबा के नाम से कोई विरला व्यक्ति ही होगा जो उनसे परिचित न हो| वे कलयुग के महान अवतार थे| उन्होंने किस देश, जाति, धार्मिक परिवार व कुल में जन्म लिया, यह कोई नहीं जानता| उनके पूर्वज कौन थे, उनके पिता व माता कौन थी, यह कोई नहीं…

जटू तपस्वी (Jatu Tapsvi)

प्रेम पिआला साध संग शबद सुरति अनहद लिव लाई|धिआनी चंद चकोर गति अंम्रित द्रिशटि ‌‌‌‌स्रिसटि वरसाइ ||

भाई सुजान जी (Bhai Sujan Ji)

मंनै पावहि मोखु दुआरु || मंनै परवारै साधारु ||मंनै तरै तारे गुरु सिख || मंनै नानक भवहि न भिख ||

साखी गरुड़ की (Sakhi Garud Ki)

पुरातन काल में एक ऋषि कश्यप हुए हैं, वह गृहस्थी थे तथा उनकी दो पत्नियां थीं - बिनता और कदरू| कदरू के गर्भ में से सांप पैदा होते थे जिनकी कोई संख्या नहीं थी, पर बिनता के कोई पुत्र पैदा नहीं होता था|

साधू रणीया जी (Sadhu Rniya Ji)

जहां सरोवर रामसर है, सतिगुरु हरिगोबिंद साहिब जी के समय एक साधू शरीर पर राख मल कर वृक्ष के नीचे बैठा हुआ शिवलिंग की पूजा कर रहा था| वह घण्टियां बजाए जाता तथा जंगली फूल अर्पण करता था, वह कोई पक्का शिव भक्त था|
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नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

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धर्म और दुकानदारी

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समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

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