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भक्त रामानंद जी (Bhagat Ramanand Ji)

भूमिका:

पवित्र गंगा के किनारे काशी नगरी स्थित है जिसे बनारस भी कहा जाता है| इस नगरी में पन्द्रवी सदी में कभी घर-घर लोग रामानंद जी को याद करते थे| आप एक महा पुरुष हुए हैं| आप वैष्णव मत के नेता और योगी हुए हैं|

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परिचय:

हिन्दी महान कोष व उस साल के लिखित ग्रंथो के अनुसार आप का जन्म प्रयाग (इलाहबाद) में एक ब्राह्मण भूरीरी कर्मा के घर माता सुशीला जी की गर्भ से संवत 1423 विक्रमी को हुआ| उस समय भारत में तुर्क तथा अरब देशों के मुसलमान दबदबा कायम कर चुके थे|

आपका पूर्व नाम रामदत था| पांच साल तक आप घर में ही रहे और जनेऊ की रस्म होने के बाद विद्या के लिए आपको काशी ले जाया गया| उस समय काशी ही विद्या का घर था| वह अपने गुरु से अक्षर और व्याकरण पढते थे| एक दिन बाहर घूमते हुए उनका मेल राघवानंद जी के साथ हो गया| जो कि बहुत बड़े योगी व ज्योतिष विद्या के गुरु थे| उन्होंने रामदत को अपने पास बुलाया और कहा भगवान की लीला कितनी अदभुत है| यह बालक कितना सुन्दर व होनहार है परन्तु कुछ दिनों बाद इसकी मृत्यु हो जायेगी| यह बालक अल्प आयु लेकर आया है|

यह वचन करके राघवानंद जी आगे चले गए| रामदत जी अपने गुरु के पास आ गए जिनसे विद्या ग्रहण करते थे| उन्होंने रोते हुए सारी बात उनके आगे रखी कि थोड़े ही दिनों में मेरी मौत होने वाली है| इसलिए गुरु जी में विद्या प्राप्त नहीं करना चाहता| क्या लाभ विद्या ग्रहण करने का?

गुरु जी ने जब राघवानंद जी का नाम सुना तो वह भी घबरा गए| उन्होंने ऊपर से रामदत जी को दिलासा देते हुए कहा, “कोई बात नहीं, उनका भाव होगा बचपन गया जवानी आई| आओ चलकर पूछते हैं| चिंता मत करो ईश्वर भला ही करेगा|” वह रामदत जी को लेकर राघवानंद जी के पास पहुँचे| राघवानंद जी ने वही बात गुरु के आगे भी रख दी| गुरु जी ने कहा महाराज! कौन सा ऐसा यत्न किया जाये, जिससे इस बालक की आयु लंबी हो जये?

राघवानंद जी ने उत्तर दिया, “इस बालक की आयु लंबी हो सकती है यदि योगाभ्यास हो|” रामदत जी के गुरु जे बिनती की कि फिर इस बालक को अपना शिष्य बनाए और इसकी आयु लंबी करें|

स्वामी राघवानंद ने रामदत को अपना शिष्य बना लिया और नाम रखा रामानंद| स्वामी जी ने उसको योगाभ्यास कराना शुरू कर दिया| योगाभ्यास करते करते और श्वास दसवें द्वार चढाते तथा उतारते रामानंद जी की आयु बढ़ गई और वह योगी हो गए| आपका ऐसा तेज प्रपात बढा कि प्रसिद्ध गुरु, जपी – तपी, करामाती प्रगट हुए| भगत रविदास जी आपके ही शिष्य बने|

स्वामी रामानंद जी ने देश के समस्त तीर्थों की यात्रा करके भक्ति मार्ग का उत्तम उपदेश दिया| आप एक महा पुरुष और ब्रह्म ज्ञानी प्रसिद्ध हुए|

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