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व्यवहार की महिमा – कबीर दास जी के दोहे अर्थ सहित

व्यवहार की महिमा

व्यवहार की महिमा: संत कबीर दास जी के दोहे व व्याख्या

1 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
कबीर गर्ब न कीजिये,
इस जीवन की आस |

टेसू फूला दिवस दस,
खंखर भया पलास ||

व्याख्या: कबीर जी कहते हैं कि इस जवानी कि आशा में पड़कर मद न करो | दस दिनों में फूलो से पलाश लद जाता है, फिर फूल झड़ जाने पर वह उखड़ जाता है, वैसे ही जवानी को समझो |

2 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
कबीर गर्ब न कीजिये,
इस जीवन कि आस |

इस दिन तेरा छत्र सिर,
देगा काल उखाड़ ||

व्याख्या: गुरु कबीर जी कहते हैं कि मद न करो चर्ममय हड्डी कि देह का | इक दिन तुम्हारे सिर के छत्र को काल उखाड़ देगा |

3 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
कबीर थोड़ा जीवना,
माढ़ै बहुत मढ़ान |

सबही ऊभा पन्थसिर,
राव रंक सुल्तान ||

व्याख्या: जीना तो थोड़ा है, और ठाट – बाट बहुत रचता है| राजा रंक महाराजा — आने जाने का मार्ग सबके सिर पर है, सब बारम्बार जन्म – मरण में नाच रहे हैं |

4 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
कबीर यह संसार है,
जैसा सेमल फूल |

दिन दस के व्येवहार में,
झूठे रंग न भूले ||

व्याख्या: गुरु कबीर जी कहते हैं कि इस संसार की सभी माया सेमल के फूल के भांति केवल दिखावा है | अतः झूठे रंगों को जीवन के दस दिनों के व्यवहार एवं चहल – पहल में मत भूलो |

5 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
कबीर खेत किसान का,
मिरगन खाया झारि |

खेत बिचारा क्या करे,
धनी करे नहिं बारि ||

व्याख्या: गुरु कबीर जी कहते हैं कि जीव – किसान के सत्संग – भक्तिरूपी खेत को इन्द्रिय – मन एवं कामादिरुपी पशुओं ने एकदम खा लिया | खेत बेचारे का क्या दोष है, जब स्वामी – जीव रक्षा नहीं करता |

6 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
कबीर रस्सी पाँव में,
कहँ सोवै सुख चैन |

साँस नगारा कुंच का,
है कोइ राखै फेरी ||

व्याख्या: अपने शासनकाल में ढोल, नगाडा, ताश, शहनाई तथा भेरी भले बजवा लो | अन्त में यहाँ से अवश्य चलना पड़ेगा, क्या कोई घुमाकर रखने वाला है |

7 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
आज काल के बीच में,
जंगल होगा वास |

ऊपर ऊपर हल फिरै,
ढोर चरेंगे घास ||

व्याख्या: आज – कल के बीच में यह शहर जंगल में जला या गाड़ दिया जायेगा | फिर इसके ऊपर ऊपर हल चलेंगे और पशु घास चरेंगे |

8 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
रात गँवाई सोयेकर,
दिवस गँवाये खाये |

हीरा जनम अमोल था,
कौड़ी बदले जाय ||

व्याख्या: मनुष्य ने रात गवाई सो कर और दिन गवाया खा कर, हीरे से भी अनमोल मनुष्य योनी थी परन्तु विषयरुपी कौड़ी के बदले में जा रहा है |

9 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
ऊँचा महल चुनाइया,
सुबरन कली दुलाय |

वे मंदिर खाली पड़े रहै मसाना जाय ||

व्याख्या: स्वर्णमय बेलबूटे ढल्वाकर, ऊँचा मंदिर चुनवाया | वे मंदिर भी एक दिन खाली पड़ गये, और मंदिर बनवाने वाले श्मशान में जा बसे |

10 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
कहा चुनावै भेड़िया,
चूना माटी लाय |

मीच सुनेगी पापिनी,
दौरी के लेगी आप ||

व्याख्या: चूना मिट्ठी मँगवाकर कहाँ मंदिर चुनवा रहा है ? पापिनी मृत्यु सुनेगी, तो आकर धर – दबोचेगी |

 

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