मैनूं लगड़ा इश्क़ – काफी भक्त बुल्ले शाह जी
मैनूं लगड़ा इश्क़ अवलड़ा
अव्वल दा, रोज़ अज़ल दा|टेक|
विच कड़ाही तिल-तिल पावे,
तलिआं नूं चा तलदा|
मोइआं नूं एह वल-वल मारे,
दलियां नूं एह दलदा|
की जाणां कोई चिणग कखी ए,
नित सूल कलेजे सलदा|
बुल्ल्हा, शौह दा न्योंह अनोखा,
ओह नहीं रलाइआं रलदा|
मुझे इश्क़ हो गया है
मुझे अपने प्रियतम से अनोखा और अक्खड़ प्रेम हो गया है| उसका यह प्रेम सृष्टि-रचना के पहले दिन से ही है|
साधक को अनेक विपत्तियां उठानी पड़ती हैं| मेरा प्रियतम मुझे तिल-तिल करके कड़ाही में डालता और मुझ तली हुई को और तलता है| (प्रभु अपने भक्त को कष्टों पर कष्ट देता ही चला जाता है|)
यह प्रेममार्ग है ही ऐसा कि इसमें जो मर चुके हैं, प्रेम उन्हें और भी घेर-घेरकर बार-बार मारता है, शूल की तरह कलेजे को बराबर सालता रहता है|
बुल्लेशाह कहते हैं कि उस प्रियतम का प्रेम बड़ा ही अनोखा है| उसका जैसा प्रेम किसी और का नहीं हो सकता| उसका प्रेम सबसे अलग है| उसका अहैतुक प्रेम अनूठा है|