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मैंनूं की होइया – काफी भक्त बुल्ले शाह जी

मैंनूं की होइया

मैंनूं की होइया मैथों गई गवाती मैं| टेक|
क्यों कमली आखे लोका मैंनूं की होया है|

मैं विच वेखां तां मैं नहीं होंदी,

मैं विच वसना एं तैं|

सिर तों पैरीं तीक वी तूं ही,
अन्दर-बाहर है|

इक वार इक उरार सुणींदा,
इक बेड़ी इक नैं|

मनसूर पिआरे कह्या अनलहक़,
कहु कहाया कैं|

बुल्ल्हाशाह उसे दा आशक़,
अपणा आप वंजाया जैं|

मुझे यह क्या हुआ है 

प्रभु के साथ तदाकार भाव होने पर साधक की जो विचित्र स्थिति हो जाती है, उसी का वर्णन इस काफ़ी में किया गया है| सब-कुछ बदला हुआ है| मुझे क्या हुआ, मुझमें से ‘मैं’ गुम हो गई|

लोग मुझे पगली क्यों कहते हैं? अरे भाई, यह तो बता दो कि मुझे क्या हुआ है|

यदि मैं अपने अन्दर झांककर देखती हूं, तो वहां मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है; मेरे अन्दर तो तुम्हीं रहते हो| सिर से पांव तक तुम्हीं तुम हो, अन्दर और बाहर भी तुम्हीं हो|

सुनते थे कि नदी (भवसागर) के दो किनारे होते हैं| एक साथ इधर का किनारा, दूसरा उधर का| वहां एक नाव है और उसी से नदी पार करते हैं, लेकिन प्रभु मिलन के बाद हम इधर और उधर दोनों किनारों से मुक्त हो गए| अब न नाव है और न नदी|

प्रिय मंसूर ने कहा : ‘अनहलक़’, बताओ तो उससे यह शब्द किसने कहलवाया? जिसने मंसूर से यह कहलाया बुल्लेशाह को उसी से प्रेम है और इस प्रकार उसने अपना अहम् त्याग दिया है|

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