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कदी मोड़ मुहारां ढोलिआ – काफी भक्त बुल्ले शाह जी

कदी मोड़ मुहारां ढोलिआ

कदी मोड़ मुहारां ढोलिआ,
तेरीआं वाटां तों सिर धोलिआ| टेक|

मैं न्हाती-धोती रह गई,
कोई ढंग सजन गल बह गई,
कोई सुख़न अवल्ला बोलिआ,
कदी मोड़ मुहारां ढोलिआ|

बुल्ला शौह कदी घर आवसी,
मेरी बलदी भी बुझावसी,
जीहदे दु:खां ने मुहं खोलिआ,
कदी मोड़ मुहारां ढोलिआ|

मेरे प्यारे कभी तो लौटो

विरहिणी आत्मा अपने प्रिय से लौट आने का अनुरोध करती है कि हे मेरे प्यारे, कभी तो लौट आओ| मेरा प्राण तो तेरी राहों पर न्यौछावर है|

मैं नहा-धोकर तैयार तो हुई, किन्तु साथ न जा सकी| पत्ता नहीं प्रिय के मन में कौन-सी गांठ, कोई आशंका बैठ गई? पता नहीं, अनजाने में मेरे मुंह से कोई ग़लत बात निकल गई| मैं बेक़रार हूं, अत: मेरे प्यारे कभी तो लौट आओ|

बुल्ले को भरोसा है कि कभी-न-कभी तो शौहर (पति) घर लौटकर आएगा और मेरे मन की जलती आग को बुझा देगा| लेकिन इस समय तो स्थिति यह है कि उसका विरह-दुख मुंहबाए खड़ा है| इसलिए हे मेरे प्यारे, कभी तो लौट आओ|

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