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जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल – काफी भक्त बुल्ले शाह जी

जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल

जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल,
नाचे बेसुर ते बेताल| टेक|

दरदमन्द नूं कोई न छेड़े,
जिसने आपे दुःख सहेड़े,
जम्मणा जीणा मूल उखेड़े,
बूझे अपणा आप ख़िआल|

जिसने वेस इश्क़ दा कीता,
धुर दरबारों फ़तवा लीता,
जदों ह्जूरों प्याला पीता,
कुछ न रह्या जवाब सवाल|

जिसदे अन्दर वस्स्या यार,
उठिया यार ओ यार पुकार,
ना ओह चाहे राग न तार,
ऐंवे बैठा खेडे हाल|

बुल्ल्हिआ शौह नगर सच पाया,”
झूठा रौला सब्ब मुकाया,
सच्चियां कारण सच्च सुणाया,
पाया उसदा पाक जमाल|

जिसे पूर्ण प्रेम हो जाता है

जिसे प्रभु से पूर्ण प्रेम हो जाता है, वह आनन्दमय मस्ती में आकर बेसुर और बेताल नाचने लगता है|

उस वेदना-भरे जीव को कोई क्या तंग करेगा, जिसने स्वयं अपने लिए दुख संजो लिये हैं| दुखों को वरण करने वाला जन्म और मरण की उखाड़ फेंकता है, और वह अपनी हस्ती को स्वयं पहचान लेता है|

जिसने प्रभु-प्रेम को जीवनाधार बना लिया है, उसे स्वयं आदिसत्ता से आदेश प्राप्त होने लगते हैं| जब स्वयं आदिसत्ता के हाथ से प्रेम का प्याला पिया हो तो उस अवस्था में किसी प्रकार की दुविधा के लिए स्थान ही नहीं रहता|

जिसके हृदय के अन्दर उसका यार (प्रभु) बस जाता है, तो वह आपा भूलकर यार-ही-यार पुकार उठता है| जब रोम-रोम में प्रिय की ध्वनि गूंजने लगे, तब फिर किसी बाहरी राग अथवा ताल की चाह ही नहीं रह जाती और वह अनायास मिलन-सुख में डूबकर नाचने लगता है|

बुल्लेशाह कहता है कि प्रिय के नगर में ही सच प्राप्त होता है| प्रियतम के नगर को देखने के बाद तो संसार के सारे झूठे शोर समाप्त हो जाते हैं| यह परम सत्य मैंने उन लोगों के लिए कहा है, जो सच्चे हैं, और जिन्हें उसके परम प्रेममय पवित्र रूप सौन्दर्य का दर्शन हो चुका है|

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