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गल रौले लोकां पाईं ए – काफी भक्त बुल्ले शाह जी

गल रौले लोकां पाईं ए

गल रौले लोकां पाईं ए| टेक|

सच आख मना क्यों डरना एं,
इस सच पिच्छे तूं तरना एं,
सच सदा अबादी करना एं,
सच वस्त अचम्भा आई एं|

शाह रग थीं ओह वसदा नेड़े,
लोकों पा ल्ये लम्मे झेड़े,
यां के झगड़े कौन नबेड़े,
भज भज के उमर गवाई ए|

शोर में उलझा दी बात

साधक का व्यवहार सामान्य जन से भिन्न होता है, अत: लोगों में तरह-तरह की चीमागोइयां होती रहती हैं, जिससे बात कुछ-की-कुछ हो जाती है| यही तथ्य इस काफ़ी में वर्णित है कि लोगों ने शोर मचा-मचाकर बात उलझा दी है|

ऐ मेरे मन, सच कह, भला इस सबसे तू डरता क्यों है? तेरा उद्धार तो सच के द्वारा ही होगा| सच में इतनी शक्ति है कि वह सदा आबाद करता है| सत्य का मार्ग अपनाने से विचित्र वस्तु प्राप्त हुई है|

प्रभु शाहरग तभी समीप रहता है| उसे प्राप्त करने के लिए लोगों ने लम्बे-चौड़े विवाद खड़े कर रखे हैं| उन झगडों का निपटारा भला कौन करे? वे तो व्यर्थ ही भटक-भटक कर उम्र गंवा रहे हैं|

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