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चमत्कारी बाल्टी – शिक्षाप्रद कथा

अदरकपुर का राजा जगपाल सिंह बहुत ही संकीर्ण विचारों का था! वह छुआछूत का भी बहुत ध्यान रखता था! उसके राजमहल में जितने भी दास दासियां थे, सब ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय सम्प्रदाय के थे! 

शूद्रों का राजमहल के आस-पास फटकना भी मना था! जिस रास्ते से कभी राजा की सवारी निकलती, उस रास्ते पर किसी भी शूद्र, धोबी, भंगी, चमार आदि को खड़े होने की भी इज़ाज़त नहीं थी! 

अदरकपुर में अदरक का उत्पादन बहुत होता था, इसीलिये उसका नाम अदरकपुर था।  

अदरकपुर राज्य में एक छोटा सा गाँव था – बल्लार! 

बल्लार गाँव पूरी तरह उन्हीं लोगों की आबादी थी, राजा जगपाल सिंह जिनके निकट की हवा के पास से भी गुजरना पसन्द नहीं करता था! 

बल्लार गाँव की दशा बहुत खराब थी! राज्य में बहनेवाली एकमात्र नदी बल्लार से चार कोस दूर थी और राजा जगपाल सिंह की ओर से किसी भी अछूत को नदी पर जाने की अनुमति नहीं थी!

बल्लार गाँव में बहुत से कुंए थे, इसलिये गाँव के लोगों की प्यास बुझ जाती थी, लेकिन एक साल बहुत गर्मी पड़ी! गर्मी के कारण सारे के सारे कुंए सूख गये! 

बल्लार गाँव में त्राहि त्राहि मच गई! गाँव वालों की हिम्मत नहीं थी कि राजाज्ञा के बिना कोसों दूर स्थित नदी से पानी भर कर लायें और अपने परिवार की प्यास बुझायें! 

बल्लार गाँव में एक गरीब विधवा चम्पा अपने पोते के साथ रहती थी! 

चम्पा भगवान शिवशंकर भोलेनाथ की बड़ी भगत थी! स्नान ध्यान के बाद भोलेनाथ को जल चढ़ाये बिना अन्न का एक दाना तक मुंह में नहीं लेती थी! पानी तक नहीं पीती थी! 

जब बल्लार गाँव में पानी के कुंए सूख गये तो एक दिन ऐसा आया कि घर में पानी की एक बूंद नहीं रह गयी! 

नहाना-धोना तो दूर की बात थी! भोलेनाथ पर चढ़ाने के लिये एक चम्मच जल तक घर में नहीं रहा! चम्पा का इकलौता पोता भी पानी के बिना जल बिन मछली सदृश तड़पने लगा! 

ऐसे में चम्पा भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा के आगे आलथी-पालथी लगा, आंख मूंदकर बैठ गयी और रोने लगी कि “प्रभु मुझे धर्मसंकट से उबारो! आप पर जल चढ़ाये बिना मैं अन्न का एक दाना ग्रहण नहीं कर सकती और नहाये बिना आप पर जल नहीं चढ़ा सकती! नहाने के लिये जल नहीं है, बल्कि अपने प्यासे पोते की प्यास बुझाने के लिये भी जल नहीं है! क्या करूँ?”

भोलेनाथ की भक्ति करने वाले जानते हैं कि भोले भण्डारी सचमुच बहुत भोले हैं और अपने भक्तों को कभी कष्ट में नहीं देख पाते तो जब चम्पा आंसुओं से नहा गयी, उसके सारे कपड़े आंसुओं से भीग गये महादेव प्रकट हो गये और चम्पा के सिर पर अपना वरदहस्त रखते हुए बोले-“आंखें खोलो चम्पा!”

चम्पा ने आंखें खोलीं और शंकर भगवान को साक्षात् अपने सामने देख, उनके चरणों में लोट गयी!

भगवान तो अन्तर्यामी हैं! चम्पा के कहे बिना ही उसकी सारी व्यथा कथा समझ गये! फिर भी पूछ ही बैठे -“तुम्हें क्या दुख है चम्पा? हमसे क्या चाहती हो?”

“प्रभु, सबसे पहले तो मैं यह चाहती हूँ कि आप हमारे राजा को सद्बुद्धि दो! वह इन्सान – इन्सान में फर्क करना छोड़ दे! अछूत शूद्रों को भी इन्सान समझे और यह भी कि हमारे बल्लार गाँव में पानी की कमी बिल्कुल न रहे।” चम्पा ने कहा। 

“तू कहे तो गंगा बहा दूँ?” भगवान भोलेनाथ अपना एक हाथ अपनी जटाओं की ओर ले जाते हुए बोले। 

“नहीं-नहीं भगवन।” चम्पा चीखी -“माँ गंगा के वेग से तो बल्लार में प्रलय आ जायेगी। सब जगह पानी ही पानी हो जायेगा। और एक नदी तो यहाँ से चार कोस की दूरी पर पहले से है ना, लेकिन यहाँ के राजा ने हम अछूतों को नदी से पानी भरने देना तो दूर नदी के पानी को छूने तक को मना कर रखा है।”

“इसका मतलब है – तुम्हारे राजा की भी अक्ल ठिकाने लगानी पड़ेगी।” भोलेशंकर मुस्कुराये। 

“प्रभु ! आप तो अन्तर्यामी हो। कुछ भी करो, लेकिन ऐसा करो कि सबके संकट दूर हो जाएँ और भेद-भाव मिट जाये। हमारे बल्लार गाँव में कोई भूखा-प्यासा न रहे।” चम्पा ने कहा। 

“चम्पा, तू बहुत अच्छी है। तेरा पोता प्यास से तड़प रहा है, लेकिन फिर भी तू केवल अपना या अपने पोते का भला नहीं सोच रही है, बल्कि सारे गाँव का भला सोच रही है तो यह ले मैं तुझे यह चमत्कारी बाल्टी देता हूँ।” कहते हुए भोलेनाथ ने एक बाल्टी चम्पा की ओर बढ़ाई, फिर बोले -“इसमें तू जो भी वस्तु नाम मात्र डालेगी। वह वस्तु जब तक बाल्टी पलटकर बाल्टी से बाहर नहीं गिरायेगी, बाल्टी से मिलती रहेगी। ले – पहले मैं इसमें गंगा का पानी डाल रहा हूँ।” कहते हुए भगवान शंकर ने अपनी जटाओं को हटाकर गंगा की एक बेहद पतली धार बाल्टी में डाली और बोले -“अब इस बाल्टी के पानी से तू सारे गाँव वालों के घरों में पानी के जितने भी बर्तन हों – भरवा देना, फिर बाल्टी उलटकर खाली कर देना और बाल्टी में एक चम्मच दूध डाल देना। इसके बाद सारे गाँव में दूध बाँट देना, किन्तु बाल्टी से दूध तब तक ख़त्म नहीं होगा, जब तक तू बाल्टी पूरी तरह पलटकर खाली नहीं करेगी। इसके बाद तू इस बाल्टी से अन्न-फल-सब्जी-फूल कुछ भी प्राप्त कर सकेगी और फिर देखना एक दिन तेरा राजा भी तेरे यहाँ आयेगा। तब अगर तूने बुद्धि से काम लिया तो तेरा गाँव सुख समृद्धि से दमक उठेगा और तेरे राजा का मन भी बदल जायेगा, लेकिन याद रहे यह बाल्टी तेरे पास एक महीने तक ही रहेगी। एक महीने बाद बाल्टी गायब हो जायेगी। और घबराना नहीं, यह बाल्टी तेरे यहाँ से कोई कभी चुरायेगा नही।” इतना कहकर भगवान भोलेनाथ अंतर्ध्यान हो गये। 

चम्पा ने बाल्टी उठाई। 

बाल्टी में गंगा का स्वच्छ निर्मल पानी था। 

सबसे पहले चम्पा ने अपने पोते को एक गिलास में पानी देकर, उसकी प्यास बुझाई। फिर घर के सभी खाली कलशों-मटकों-सुराहियों में पानी भर लिया। उसके बाद घर से बाहर जाकर आवाज़ लगाई –“किसी को पानी चाहिये तो ले लो।”

थोड़ी देर में ही पानी लेने वालों की भीड़ लग गयी। 

पानी के बाद कहीं से गाय का एक चम्मच दूध लाकर चम्पा ने बाल्टी में डाला। फिर पूरे गाँव में दूध बाँट दिया। इसी प्रकार अनाज-दाल-चावल, सब्ज़ी-फल-मेवे-फूल किसी भी चीज़ की बल्लार गाँव में कमी नहीं रही।   

गाँव वाला कोई कभी चम्पा से पूछ्ता तो वह कहती -“सब भोलेनाथ की कृपा है।” 

और भोलेनाथ कुछ चाहें और वो न हो, ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता। 

तो भोलेनाथ की इच्छा से एक दिन राजा जगपालसिंह के दिल में आया कि बहुत दिन हो गये – मैं शिकार खेलने नहीं गया और उसने निर्णय किया कि आज मैं शिकार के लिये निकलता हूँ। अपने साथ पचास सैनिकों की एक टुकड़ी लेकर राजा शिकार के लिये निकला। उसने ठान लिया था कि आज एक शिकार तो करना ही है। शेर नहीं मिला तो हिरण-खरगोश-गिलहरी-चिड़िया-कबूतर किसी का भी शिकार हो, शिकार करना जरूर है, लेकिन अपने घोड़े को जब राजा जगपालसिंह ने ऐड लगाई, उसका घोड़ा उस रोज़ इतना तेज़ दौड़ा, इतना तेज़ दौड़ा कि सभी सैनिक मीलों पीछे छूट गये और घोड़ा जंगल के जंगल पार करके, एक खुले समतल मैदान में पहुँच गया। 

संयोगवश मैदान में कहीं भी कोई ओट नहीं थी और सूरज सीधा सिर पर था। 

 

प्रचण्ड गर्मी के दिन थे।

राजा जगपालसिंह पसीने से तरबतर हो गया। प्यास के मारे उसके गले में काँटे उगने लगे। पानी की तलाश में वह इधर-उधर भटकने लगा। तेज धूप में बहुत देर से पानी पिये बिना रहने के कारण राजा और उसके घोड़े की हालत बहुत खराब हो गयी थी। दोनों निढाल से होने लगे थे। राजा को बहुत तेज़ भूख भी लगने लगी  थी। 

 

एक जगह राजा को अदरक की एक गाँठ पडी दिखी तो भूख से पागल राजा ने बिना सोचे समझे ज़रा सी अदरक मुँह में डालकर चबा डाली।

 

ताज़ी अदरक थी और उसमें तेज़ी भी बहुत थी। राजा की हालत खराब हो गयी। 

“पानी -पानी।”  वह चिल्लाने लगा।  

 

पानी की तलाश में अपना निढाल घोड़ा दौड़ाते हुए आखिरकार बहुत देर बाद राजा को कुछ दूर कई झोपड़ियाँ दिखीं, जिनमें पहली झोपड़ी – गरीब भक्तिन चम्पा की ही थी। 

 

प्यास से बेहाल राजा उस झोपड़ी के निकट पहुँचा। दरवाजे पर पहुँच, उसने घोड़ा रोका और  घोड़े से उतरकर आवाज़ लगाई -“कोई है क्या?”

 

बूढ़ी चम्पा बाहर निकली। राजसी पोशाक में अपने राजा को पहचानने में उसे एक क्षण भी नहीं लगा, लेकिन दूर से ही झुककर ज़मीन को हाथ लगा, वह शीघ्रता से बोली -“महाराज की जय हो। प्रणाम महाराज। मगर ज़रा दूर ही रहियेगा। मैं एक अछूत विधवा बूढ़ी हूँ।”

राजा की प्यास के मारे जान निकल रही थी।  उसे उस समय चम्पा का ‘दूर रहने को कहना’ और ‘अछूत हूँ’  बोलना – न तो सुहाया, ना ही समझ में आया। वह बहुत धीमे और साँस उखड़ने जैसे स्वर में बोला -“माई, बहुत प्यासा हूँ।  प्यास के मारे मेरा और मेरे घोड़े का भी बुरा हाल है। पीने के लिये थोड़ा पानी दो न।”

“हे राम……! पानी तो मेरे यहाँ बहुत है, मगर छी: – छी: दूर रहिये महाराज। वरना आपका धर्म भ्रष्ट हो जायेगा। मैं अछूत हूँ। मैं आपको पानी नहीं पिला सकती, बल्कि आपके पाँव छूने की भी हिम्मत नहीं कर सकती।” चम्पा ने कहा। 

राजा जगपालसिंह ने आसपास दृष्टि दौड़ाई। निकट कहीं कोई नहीं था।  वह धीरे से चम्पा से बोला -“थोड़ा पानी पिला दे माई, वरना मैं मर जाऊँगा।”

“कैसी बातें करते हो महाराज। आज मैं आपको पानी पिला दूँ और कल आपने अपना धर्म भ्रष्ट करने के जुर्म में मेरा गला कटवा दिया तो……?” चम्पा चीखी। 

चीख सुनकर चम्पा का पोता भी झोपड़ी से बाहर आ गया और आसपास की झोपड़ियों में रहने वाले सभी लोग भी बाहर आ गये। राजा ने सबको देखा और उनसे बोला -“इस बूढ़ी से कहो। मुझे और मेरे घोड़े को पानी पिला दे।”

“नहीं-नहीं।” एक लम्बी सफ़ेद दाढ़ी वाला बुड्ढा बोला -“इस गाँव में सभी अछूत रहते हैं महाराज। इस गाँव का कोई व्यक्ति आपको अपने घर का पानी नहीं पिला सकता।”

“अरे मैं तुम्हारा राजा हूँ। मैं खुद तुमसे कह रहा हूँ -पानी पिला दो, वरना मैं मर जाऊँगा। मेरा घोड़ा भी निढाल हो रहा है। वह भी मर जायेगा।” राजा जगपालसिंह पागलों की तरह चिल्लाया। 

“गुस्सा न करें महाराज। ” चम्पा बोली -“हम तो आपकी प्रजा हैं। जैसा आप कहेंगे – करेंगे। आपको पानी भी पिलायेंगे और स्वादिष्ट खाना भी खिलायेंगे – आप बहुत भूखे भी लग रहे हैं।”

“हाँ-हाँ, तो लाओ न कुछ खाने को भी।  मुझे सचमुच बहुत भूख लग रही है। मेरा घोड़ा भी बहुत भूखा है।  उसके लिये भी कहीं से हरी-हरी घास ला दो।” राजा स्वादिष्ट खाने का जिक्र सुनकर  ही बहुत ज्यादा उतावला हो उठा। उसकी भूख उभर आई और पेट में चूहे कूदने लगे थे।  

इधर बूढ़ी चम्पा राजा से बातें कर रही थी, उधर धीरे-धीरे बल्लार गाँव के सारे लोगों को खबर लग गयी कि उनका राजा उनके गाँव में आया हुआ है तो लोग चम्पा की झोपड़ी के निकट जमा होते चले गये। 

राजा की दशा देख, कई बूढ़े चम्पा से कहने लगे -“चम्पा, महाराज को पानी पिला दे।  उन्हें कुछ खिला दे।”

आखिर चम्पा ने घर के बाहर एक चारपाई बिछाई और राजा जगपालसिंह से बोली -“महाराज, बैठिये।  मैं आपके लिये खाना और पानी लेकर आती हूँ, अन्न और जल ग्रहण करने से पहले आपको भगवान भोलेनाथ की कसम खानी होगी कि आज से इन्सान और इन्सान में कोई फर्क नहीं समझेंगे और किसी भी मनुष्य को अछूत नहीं समझेंगे।”

“मैं भोलेनाथ की  कसम खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ माई। आज से मेरे राज्य में कोई अछूत नहीं कहलायेगा। मैं हर महीने एक दिन अछूत कहलाने वाले मनुष्यों के घर का भोजन पानी ग्रहण किया करूँगा।” राजा जगपालसिंह ने कहा। 

“और चार कोस दूर पड़ने वाली नदी से  एक नहर खुदवा कर बल्लार गाँव की पानी की समस्या हमेशा के लिये दूर करेंगे।” चम्पा फिर बोली। 

“हाँ-हाँ, मैं ऐसा ही करूँगा।” राजा ने वचन दिया। 

उसके बाद चम्पा और बल्लार गाँव के लोगों ने राजा और उसके घोड़े की बहुत खातिर की और खूब नाच-गाकर राजा का मनोरंजन किया। 

और वापस अदरकपुर के अपने राजमहल पहुँचने के बाद राजा जगपालसिंह ने एक आदेश जारी किया कि उसके राज्य में कोई छुआछूत नहीं मानेगा। मनुष्य-मनुष्य में फर्क करने वालों को कडा दण्ड दिया जायेगा।

राजा जगपालसिंह ने बल्लार गाँव में कभी पानी की कमी न रहे – इसलिये चार कोस दूर वाली नदी से बल्लार तक एक नहर भी खुदवा दी। 

 

भगवान भोलेनाथ की कृपा से राजा को सद्बुद्धि आ गयी तो प्रजा में भी हमेशा राजा जगपालसिंह की जयजयकार कोने लगी। 

 

राजा के महल में अब सभी तरह के लोगों को काम मिलने लगा था, क्योंकि अछूत समझे जाने वाले – अब अछूत नहीं रह गये थे।  

फिर एक दिन बूढ़ी चम्पा ने भोलेनाथ को याद किया और भोलेशंकर प्रकट हुए तो बोली -“प्रभु, आपकी चमत्कारी बाल्टी ने वह सब कर दिया, जिसकी बल्लार गाँव को जरूरत थी। अब चमत्कारी बाल्टी बेकार पडी है।”

“तो ठीक है। अब इस बाल्टी से किसी और गाँव का भला करते हैं।” भोलेनाथ बोले और बाल्टी सहित अंतर्ध्यान हो गये।