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स्वयंवर और नारद मुनि

भारत में पहले यह रिवाज़ था कि जब किसी राजकुमारी की उम्र शादी लायक़ होती तो एक स्वयंवर रचा जाता जिसमें राजकुमारी ख़ुद अपने पति को चुनती थी|
एक बार एक राजा की लड़की का स्वयंवर था| नारद जी ने, जो भक्त-शिरोमणि कहलाते थे, भगवान् विष्णु के आगे प्रार्थना की कि मुझे सुन्दर-सा चेहरा दे दो| मैं अमुक लड़की के स्वयंवर में जाना चाहता हूँ| भगवान् ने यह विचारकर कि कहीं यह काम के वश में न हो जाये, उसे बन्दर का चेहरा दे दिया| जिस वक़्त वर चुनने का समय आया, लोगों को पीछे हटाकर नारद इस विश्वास के साथ आगे खड़ा हो गया कि कन्या उसी के गले में हार डालेगी| लड़की आगे निकल गयी| दिल में ख़्याल आया कि शायद उसने देखा नहीं है| लोगों को हटाकर फिर आगे जा खड़ा हुआ| लड़की ने कहा, “बार-बार उछलता क्यों है? शीशे में अपना मुँह तो देख!” जब नारद ने शीशे में अपना मुँह देखा तो बन्दर का मुँह! क्रोध में आ गया| भगवान् से कहने लगा कि मैं तुझको श्राप दूँगा| विष्णु भगवान् ने कहा कि मुझे श्राप मंज़ूर है, लेकिन मैं अपने भक्त को गिरते हुए नहीं देख सकता था|

मन बड़ों-बड़ों को गिरा देता है लेकिन भगवान् हमेशा अपने सेवकों की सँभाल करता है|

जिउ जननी सुतु जणि पालती राखै नदरि मझारि||
अंतरि बाहरि मुखि दे गिरासु खिनु खिनु पोचारि||
तिउ सतिगुरु गुरसिख राखता हरि प्रीति पिआरि|| (गुरु रामदास जी)

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