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मुर्दा खाने का हुक्म

एक बार गुरु नानक साहिब ने अपने सेवकों को मुर्दा खाने के लिए कहा| देखने में यह मुनासिब हुक्म नहीं था| हम मुर्दा छू जाने पर नहाते हैं| फिर मुर्दा खाये कौन? एक भाई लहणा खड़े रहे, बाक़ी सब शिष्य चले गये| यह सबको नामुनासिब हुक्म लगा था, लेकिन भाई लहणा को नहीं| जब वह मुर्दे के इर्द-गिर्द घूमने लगा तो गुरु साहिब ने उससे पूछा, “क्या कर रहे हो?” भाई लहणे ने उत्तर दिया, “हुजूर! मुझे समझ नहीं आ रही कि मुर्दे को किस तरफ़ से खाना शुरू करूँ|” जब वह खाने लगा तो देखता है कि वहाँ कोई मुर्दा नहीं था, बल्कि मुर्दे की जगह उसके सामने गुरु का प्रसाद, मीठा हलवा पड़ा था| गुरु नानक साहिब ने उनको गुरु-गद्दी का हक़दार बना दिया और वे भाई लहणा से गुरु अंगद साहिब बन गये| अंगद का अर्थ है, “गुरु का अपना अंग या हिस्सा”| इसी तरह जब गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने शिष्यों की परख की तब पाँच हज़ार में से सिर्फ़ पाँच प्यारे निकले|

जब गुरु परखता है तो बड़े-बड़े फ़ेल हो जाते हैं| जीव का इम्तिहान में पास होना बड़ी मुश्किल बात है| गुरु किसी का इम्तिहान न ले|

तू अपनी बुद्धि का सहारा न लेना बल्कि सम्पूर्ण मन से यहोवा
(प्रभु) पर भरोसा रखना| उसी को याद करके सब काम करना,
वह तेरा मार्ग-दर्शन करेगा| (प्राँवब्र्ज*)

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