Homeपरमार्थी साखियाँलैला-मजनूँ का प्रेम

लैला-मजनूँ का प्रेम

मजनूँ लैला का आशिक़ था| लैला का बाप फ़ारस का बादशाह था| उसने लैला की ख़ुशी के ख़याल से शहर के सब दुकानदारों को हुक्म दिया कि मजनूँ जिस दुकान से मिठाई खाये, कपड़ा ले, पैसा ले या कोई और चीज़ ले उसका हिसाब मैं दूँगा| अब मजनूँ को तो किसी वस्तु की चाह नहीं थी क्योंकि वह तो केवल लैला के प्यार का मतवाला था| जब लोगों ने सुना कि जिस दुकानदार से जो मर्ज़ी चीज़ ले लो, तो एक मजनूँ की जगह कई मजनूँ हो गये और हर रोज़ बढ़ने लगे| सब दुकानें ख़ाली हो गयीं| शहर उजड़ने लगा| आख़िर दुकानदारों और शहर के लोगों ने बादशाह से जाकर पूछा, “हे राजन! एक, दो या दस मजनूँ तो हो सकते हैं पर सैकड़ों, हज़ारों मजनूँ तो नहीं हो सकते, वह शहर को लूट रहे हैं, उनको रोकना चाहिए|” राजा ने कहा कि मैं लैला से पूछता हूँ और फिर इस धोखेबाज़ी और बेईमानी को ख़त्म कर दूँगा| जब राजा ने लैला को बुलाकर पूछा कि मजनूँ एक-दो हैं या अनेक, क्योंकि शहर तो मजनुँओं से भरा पड़ा है और बाज़ार की सब दुकानों को ख़ाली कर दिया है|

लैला सब समझ गयी कि मामला क्या है| उसने कहा, “पिता जी, यह सब मुझ पर छोड़ दो| मैं जल्दी से जल्दी नक़ली मजनुँओं से शहर को मुक्त करवा दूँगी| आप कल ही मेरी योजना का नतीजा देख लेंगे|”

लैला ने अपने अंगरक्षकों को बुलाया और कहा, “अपने सिपाहियों की निगरानी में सारे शहर में यह ढिंढोरा पिटवा दो कि कल लैला अपने हाथ में खंजर लेकर बाज़ार में आयेगी और अपने हाथ से मजनूँ का गोश्त काटेगी| मजनूँ अपना गोश्त कटवाने के लिए लैला के आगे पेश हो|” जब सिपाहियों ने ढिंढोरा पिटवाया तो, जैसे कोई करिश्मा हो, सब नक़ली मजनूँ भाग गये| सिर्फ़ एक असली मजनूँ रह गया| वह अपने शरीर को नंगा करके सिपाहियों से बोला, “कृपा करके मेरी माशूक़ा को बता दो कि मैं गोश्त देने के लिए तैयार हूँ|”

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय|
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय||
(कबीर साहिब)

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