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गुरु समान दूसर नहिं कोय

गुरु समान दूसर नहिं कोय

जब शुकदेव गुरु धारण करके, नाम लेकर उसके आदेशानुसार कमाई करके अपने पिता वेदव्यास के पास गया, तो उसने पूछा, “गुरु कैसा है?” शुकदेव चुप! आख़िर बाप ने कहा, “क्या सूर्य जैसा है?” शुकदेव बोला, “सूर्य जैसी चमकवाला है, लेकिन सूर्य में तपिश है, गुरु में तपिश नहीं|” फिर उन्होंने पूछा कि किस जैसा है? कोई जवाब नहीं| फिर पूछा, “क्या चन्द्रमा जैसा है?” बोला, “है तो चन्द्रमा जैसा शीतल, लेकिन चन्द्रमा में दाग़ है, गुरु में कोई दाग़ नहीं|” ऋषि ने पूछा, “फिर किस जैसा है?” शुकदेव ने उत्तर दिया, गुरु जैसा गुरु ही है|” वेदव्यास ने कहा, “अब चाहे रोज़ दस बार विष्णुपुरी में जाओ, कोई नहीं रोक सकता|” शुकदेव ने बड़ी विनम्रता से अपने पिता को कहा, “पिता जी, आपका धन्यवाद| मैं आपकी यह शिक्षा हमेशा याद रखूँगा|”

शुकदेव को विष्णुपुरी से इसलिए निकाल दिया गया था क्योंकि वह निगुरा था| ऋषि वेदव्यास ने उसे कई बार राजा जनक के पास भेजा पर वह अपने अभिमान के कारण वापस आ जाता क्योंकि राजा जनक उसकी तरह त्यागी नहीं था|

उसके पिता ने कहा, “ज़रा एक पल के लिए सोचो कि विष्णुपुरी जैसे मण्डल में दाख़िल होने के लिए भी अगर गुरु की आवश्यकता है तो इससे कहीं ऊँचे शुद्ध आत्मिक मण्डलों में दाख़िल होने के लिए राजा जनक जैसे कितने बड़े यानी पूर्ण सतगुरु की आवश्यकता है?”

सभी सन्तों-महात्माओं ने सतगुरु के सच्चे भक्त को अद्वितीय स्थान दिया है क्योंकि पूर्ण गुरु के बिना मुक्ति नहीं|

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