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ग़रीब दुकानदार और पारस

एक बड़ा ग़रीब दुकानदार था| उसका गुज़ारा नहीं होता था| इत्तफ़ाक़ से एक दिन एक महात्मा उसके पास आये| उस दुकानदार ने बड़े प्रेम से उनकी सेवा की| जब महात्मा प्रसन्न हुए तो उसने आँखों में आँसू भरते हुए प्रार्थना की, “मैं ग़रीब हूँ| मेरा गुज़ारा नहीं होता, आप मुझ पर कृपा करो|” महात्मा मेहरबान हो गये और कहने लगे कि मेरे पास पारस है, मैं तुम्हें तीन महीने के लिए देता हूँ| इतने समय में जितना चाहो सोना बना लेना| महात्मा तो कृपा करके चले गये, लेकिन जीवन का भाग्य उसके साथ रहता है| वह ग़रीब दुकानदार बाज़ार गया| पूछा कि लोहे का क्या भाव है? लोहेवालों ने कहा कि पहले तो पाँच रुपये मन था अब सात रुपये मन है| कहने लगा, “मुझे यह घाटे का सौदा नहीं करना|” मूर्ख को इतना पता नहीं था कि एक मन सोने का कितना रुपया होता है| बोला, “जब पाँच रुपये मन होगा तब ख़रीदूँगा|” घर लौट आया| दूसरे महीने फिर बाज़ार गया और पूछा, “लोहे का क्या भाव है?” दुकानदार ने कहा, “लाला जी, अब तो और भी बढ़ गया है|” फिर बोला, “जब पाँच रुपये मन होगा तब ख़रीदूँगा|” तीसरे महीने फिर बाज़ार गया लोहे का भाव पहले से भी बढ़कर पन्द्रह रुपये हो चुका था| ख़ाली हाथ वापस आ गया|

इतने में तीन महीने गुज़र गये| उधर माहात्मा ने सोचा कि चलो जाकर अपना पारस ले आयें; उस दुकानदार ने तो बड़े-बड़े आलीशान मकान बनवा लिए होंगे| लेकिन जब आये तो देखकर हैरान रह गये| वही टूटी हुई दुकान, वही पुराना-सा मकान| महात्मा अपना पारस लेकर चले गये|

यही मिसाल हम पर घटती है| मनुष्य-जन्म पारस है| महात्मा कुल-मालिक है, जिसने हम पर कृपा करके हमें पारस जैसा मनुष्य-जन्म दिया है| हमारे अन्दर कुल-मालिक अकालपुरुष है| हम संसार के बाक़ी सब कामों की ओर तो ध्यान देते हैं लेकिन परमात्मा से मिलाप के काम को टालते रहते हैं| हम यह नहीं समझते कि परमात्मा से मिलाप करके हम उसका रूप हो जायेंगे और जन्म-मरण के बन्धनों से हमेशा के लिए आज़ाद हो जायेंगे| अगर हम मनुष्य-जन्म पाकर अन्तर में तरक़्क़ी करके परमात्मा से मिलाप न करें तो हम से ज़्यादा खोटे भाग्य वाला और कौन हो सकता है!

कबीर मानस जनमु दुलंभु है होइ न बारै बार||
जिउ बन फल पाके भुइ गिरहि बहुरि न लागहि डार|| (कबीर साहिब)

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