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ध्यान-मग्न

ध्यान-मग्न

लुधियाना का एक स्कूल-मास्टर था| उसे नाम अभ्यास का बहुत शौक़ था| एक दिन वह प्यार के साथ दीवाने-हाफ़िज़ पढ़ता-पढ़ता बाहर सैर को चल पड़ा और गुरु के प्यार में इतना मस्त हो गया कि तेरह मील दूर एक गाँव में पहुँच गया| जब देखा कि वह दूर आ गया है तो लोगों से पूछा कि यहाँ से लुधियाना कितनी दूर है? उन्होंने कहा कि तेरह मील है| बोला, “ओहो! मैं सैर करने निकला था, तेरह मील शहर से बाहर आ गया हूँ|” वह बोला, “अब क्या करूँ? उन्होंने कहा कि कोई ताँगा कर लो|” वह बोला, “मुझे ताँगे की ज़रूरत नहीं| मैं जिस तरह आया हूँ, उसी तरह वापस चला जाऊँगा|”

सो जब मनुष्य को नाम की लज्ज़त आ जाती है तो फिर उसे अपने शरीर की भी सुध नहीं रहती|

तुम कम से कम मन से तो ज़रूर सदा इस काम में लगे रहो, ड्यूटी
के समय भी और ख़ाली समय में भी| यह काम तन और मन से
शांतिपूर्वक तथा लगन से किये जाने की माँग करता है|
(क्लाउड ऑफ अननोइंग)

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