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भृंगी की सृजना

भृंगी के साथ एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है| कहा जाता है कि यह एक छोटे से बिल में अण्डा देती है| फिर यह अपने लार्वे के लिए कोई कीड़ा ढूँढ लाती हैं| उस कीड़े को लार्वे के सामने रखकर बिल को बन्द कर देती है| वह कीड़ा बिल के अन्दर घूँ-घूँ करता रहता है| जब लार्वा बड़ा हो जाता है तो बिल तोड़कर बाहर आ जाता है|

इस बात से यह धारणा बन गयी है कि भृंगी अपनी घूँ-घूँ की तेज़ आवाज़ से दूसरी जाति के किसी कीड़े को भृंगी ही बना लेता है| लोग समझते हैं कि भृंगी बिल के कैद कीड़े को अपनी तवज्जुह देती है| उसकी तवज्जुह से वह कीड़ा भी भृंगी बन जाता है और वे दोनों बिल से बाहर निकलकर उड़ जाते हैं| कबीर साहिब इसी बात को इस प्रकार प्रकट करते हैं :

सुमिरन से मन लाइये, जैसे कीट भिरंग|
कबीर बिसरैं आपको, होय जाय तेहि रंग||

अगर हम भी परमात्मा के नाम का ध्यान करें तो हम उसमें समा जायेंगे| जिसके अन्दर प्रभु का प्रकाश प्रकट हो जाता है, वह उस प्रकाश का ही रूप हो जाता है|
जिसका भी कोई लगातार ध्यान करता है, उसी का ही रूप बन जाता है|

जिसु नामु रिदै सो सभ ते ऊचा|| (गुरु अर्जुन देव)

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