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बालक ने आग में क्या देखा?

बालक ने आग में क्या देखा?

गुरु नानक साहिब के समय संगत का नियम था कि वह सुबह-सवेरे गुरु साहिब की हुजूरी में भक्ति-भाव के शब्द पढ़ती थी| गुरु साहिब ने देखा कि जब संगत शब्द पढ़ रही होती है, एक छोटा-सा लड़का रोज़ आकर चुपचाप उनके पीछे खड़ा हो जाता है|

एक दिन गुरु साहिब ने लड़के की ओर मुस्कराकर देखा और कहा, “बेटा, तू रोज़ सवेरे यहाँ क्यों आ जाता है? तेरा यह सोने का समय होता है| तुझे बानी के पाठ में से क्या मिलता है? तेरा ध्यान साथियों से मिलकर खेलने की ओर होना चाहिए, पर तू यहाँ आ जाता है|” गुरु साहिब की बात सुनकर लड़के ने बड़े आदर के साथ जवाब दिया, “एक बार मेरी माँ ने मुझे चूल्हे में लकड़ियाँ जलाने के लिए कहा| मैंने देखा कि आग पहले बारीक-बारीक और छोटी-छोटी लड़कियों को लगती है तथा मोटी और बड़ी लकड़ियों को बड़ी मुश्किल से आग लगती है| उस वक़्त से मैं डरने लगा हूँ कि बड़ी उम्र वालों से पहले मुझे मौत की आग न लग जाये| इसलिए मैं सदा आपकी संगत में रहना चाहता हूँ|”

गुरु साहिब उसकी समझदारी देखकर बहुत ख़ुश हुए और बोले, “भाई, तू उम्र में बच्चा है, पर अक़्ल में बूढ़ा है!”

उस दिन से ही बच्चे का नाम ‘भाई बुड्ढा’ पड़ गया| वह छठी पातशाही गुरु हरगोबिन्द जी के समय तक जीवित रहे| उनका गुरु-घर में बहुत आदर था और गुरु अंगद साहिब, गुरु अमर दास, गुरु रामदास, गुरु अर्जुन देव और गुरु हरगोबिन्द को गुरु-गद्दी का तिलक उन्होंने ही लगाया था|

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