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असली विद्वान कौन?

एक बार एक विद्यार्थी अपनी बी. ए. की पढ़ाई पूरी करके अपने घर जा रहा था| रास्ते में उसे एक जाट ने पूछा कि कहाँ से आ रहे हो? उसने कह कि मैं विद्या प्राप्त करके आ रहा हूँ| जाट ने पूछा, “तुझे सोहनी-महीवाल का क़िस्सा आता है?” बोला कि नहीं| दोबारा फिर पूछा, “हीर-राँझा आता है?” कहता है कि नहीं| जाट ने फिर कहा, “सस्सी-पुन्नूँ का क़िस्सा आता है?” कहता है कि कोई नहीं| जाट ने कहा, “फिर तुम कैसे पढ़े-लिखे हो!” अब सोचने की बात है कि जिस ने ख़ुद विद्या प्राप्त नहीं की, उसे विद्या के बारे में कैसे समझाया जाये| विद्यार्थी बेचारा क्या कहता, चुप हो गया|

इसी तरह अब आप बताओ, जो अन्दर नहीं गये उनको क्या बतायें? क्योंकि जो नज़ारे सन्त अपने अन्दर ध्यान लगाकर देखते हैं, उनकी मिसाल बाहर है ही नहीं|

मैं अपनी मूर्खताभरी बातें करनेवाली ज़बान से परमात्मा की भेद भरी बातों को बयान करने की हिम्मत नहीं कर सकता| अगर मैं हिम्मत करूँ तो भी बयान नहीं कर सकता| (क्लाउड ऑफ़ अननोइंग)

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