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अध्याय 352

महाभारत संस्कृत - शांतिपर्व

1 [बराह्मण] आश्चर्यं नात्र संदेहः सुप्रीतॊ ऽसमि भुजंगम
अन्वर्थॊपगतैर वाक्यैः पन्थानं चास्मि दर्शितः

2 सवस्ति ते ऽसतु गमिष्यामि साधॊ भुजग सत्तम
समरणीयॊ ऽसमि भवता संप्रेषण नियॊजनैः

3 [नाग] अनुक्त्वा मद्गतं कार्यं कवेदानीं परस्थितॊ भवान
उच्यतां दविज यत कार्यं यदर्थं तवम इहागतः

4 उक्तानुक्ते कृते कार्ये माम आमन्त्र्य दविजर्षभ
मया परत्यभ्यनुज्ञातस ततॊ यास्यसि बराह्मण

5 न हि मां केवलं दृष्ट्वा तयक्त्वा परनयवान इह
गन्तुम अर्हसि विप्रर्षे वृक्षमूलगतॊ यथा

6 तवयि चाहं दविजश्रेष्ठ भवान मयि न संशयः
लॊकॊ ऽयं भवतः सर्वः का चिन्ता मयि ते ऽनघ

7 [बराह्मन] एवम एतन महाप्राज्ञ विज्ञातार्थभुजंगम
नातिरिक्तास तवया देवाः सर्वथैव यथातथम

8 य एवाहं स एव तवम एवम एतद भुजंगम
अहं भवांश च भूतानि सर्वे सर्वत्र गाः सदा

9 आसीत तु मे भॊगपते संशयः पुण्यसंचये
सॊ ऽहम उञ्छव्रतं साधॊ चरिष्याम्य अर्थदर्शनम

10 एष मे निश्चयः साधॊ कृतः कारणवत्तरः
आमन्त्रयामि भद्रं ते कृतार्थॊ ऽसमि भुजंगम

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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