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अध्याय 351

महाभारत संस्कृत - शांतिपर्व

1 [सूर्य] नैष देवॊ ऽनिलसखॊ नासुरॊ न च पन्नगः
उञ्छवृत्ति वरते सिद्धॊ मुनिर एष दिवं गतः

2 एष मूलफलाहारः शीर्णपर्णाशनस तथा
अब्भक्षॊ वायुभक्षश च आसीद विप्रः समाहितः

3 ऋचश चानेन विप्रेण संहितान्तर अभिष्टुताः
सवर्गद्वार कृतॊद्यॊगॊ येनासौ तरिदिवं गतः

4 असन्न धीरनाकाङ्क्षी नित्यम उञ्छशिलाशनः
सर्वभूतहिते युक्त एष विप्रॊ भुजंगम

5 न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च पन्नगाः
परभवन्तीह भूतानां पराप्तानां परमां गतिम

6 [नाग] एतद एवंविधं दृष्टम आश्चर्यं तत्र मे दविज
संसिद्धॊ मानुषः कायॊ यॊ ऽसौ सिद्धगतिं गतः
सूर्येण सहितॊ बरह्मन पृथिवीं परिवर्तते

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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