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अध्याय 347

महाभारत संस्कृत - शांतिपर्व

1 [भीस्म] अथ काले बहुतिथे पूर्णे पराप्तॊ भुजंगमः
दत्ताभ्यनुज्ञः सवं वेश्म कृतकर्मा विवस्वतः

2 तं भार्यासमभिक्रामत पादशौचादिभिर गुणैः
उपपन्नां च तां साध्वीं पन्नगः पर्यपृच्छत

3 अपि तवम असि कल्यानि देवतातिथिपूजने
पूर्वम उक्तेन विधिना युक्ता युक्तेन मत्समम

4 न खल्व अस्याकृतार्थेन सत्री बुद्ध्या मार्दवी कृता
मद्वियॊगेन सुश्रॊणि वियुक्ता धर्मसेतुना

5 [नागभार्या] शिष्याणां गुरु शुश्रूसा विप्राणां वेद पारणम
भृत्यानां सवामिवचनं राज्ञां लॊकानुपालनम

6 सर्वभूतपरित्राणं कषत्रधर्म इहॊच्यते
वैश्यानां यज्ञसंवृत्तिर आतिथेय समन्विता

7 विप्र कषत्रिय वैश्यानां शुश्रूसा शूद्र कर्म तत
गृहस्थ धर्मॊ नागेन्द्र सर्वभूतहितैषिता

8 नियताहारता नित्यं वरतचर्या यथाक्रमम
धर्मॊ हि धर्मसंबन्धाद इन्द्रियाणां विशेषणम

9 अहं कस्य कुतॊ वाहं कः कॊ मे ह भवेद इति
परयॊजन मतिर नित्यम एवं मॊक्षाश्रमी भवेत

10 पतिव्रतात्वं भार्यायाः परमॊ धर्म उच्यते
तपॊपदेशान नागेन्द्र तच च तत्त्वेन वेद्मि वै

11 साहं धर्मं विजानन्ती धर्मनित्ये तवयि सथिते
सत्पथं कथम उत्सृज्य यास्यामि विषमे पथि

12 देवतानां महाभाग धर्मचर्या न हीयते
अतिथीनां च सत्कारे नित्ययुक्तास्म्य अतन्द्रिता

13 सप्तास्त दिवसास तव अद्य विप्रस्येहागतस्य वै
स च कार्यं न मे खयातिदर्शनं तव काङ्क्षति

14 गॊमत्यास तव एष पुलिने तवद्दर्शनसमुत्सुकः
आसीनॊ ऽऽवर्तयन बरह्म बराह्मणः संशितव्रतः

15 अहं तव अनेन नागेन्द्र सामपूर्वं समाहिता
परस्थाप्यॊ मत्सकाशं स संप्राप्तॊ भुजगॊत्तमः

16 एतच छरुत्वा महाप्राज्ञ तत्र गन्तुं तवम अर्हसि
दातुम अर्हसि वा तस्य दर्शनं दर्शनश्रवः

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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