राजा हरिचन्द (Raja Harichand)

(2 votes)
  • font size
  • 7111 Views



सुख राजे हरी चंद घर नार सु तारा लोचन रानी |
साध संगति मिलि गांवदे रातीं जाइ सुणै गुरबाणी |

"राजा हरिचन्द" सुनने के लिए Play Button क्लिक करें | Listen Audio Raja Harichand


पिछों राजा जागिआ अधी रात निखंड विहाणी |
राणी दिस न आवई मन विच वरत गई हैरानी |
होरतु राती उठ कै चलिआ पिछै तरल जुआणी |
रानी पाहुती संगतीं राजे खड़ी खड़ाऊं निसाणी |
साध संगति आराधिआ जोड़ी जुड़ी खड़ाऊं पुराणी |
राजे डिठा चलित इहु एह खड़ाव है चोज विडाणी |
साध संगति विटहु कुरबाणी |९|

एक हरिचन्द नाम का राजा था| उसकी रानी का नाम तारा रानी था| रानी को बचपन से ही सद् पुरुषों के वचन सुनने की लगन थी| छोटे-से राज्य की धार्मिक विचारों वाली रानी विवाह के पश्चात भी पूजा पाठ में लगी रहती थी| एक दिन राज भवन के निकट एक भजन मण्डली आ गई, वह हरि कीर्तन करने लगी| सारी रात ही कीर्तन होता रहता| रानी को जब पता चला तो वह भी उस कीर्तन में जाने लगी| अब यह उसका नित्य नियम था| परमात्मा का नाम ही उसके जीवन का आसरा था| वह बिना किसी भय के इस नेक रास्ते पर जाया करती थी|

भाई गुरदास जी के कथन अनुसार एक दिन तारा रानी जब कीर्तन सुनने गई तो बाद में राजा जाग गया| राजा धर्मी नहीं था इसलिए रानी का भी उसे कीर्तन में जाना अच्छा नहीं लगता था| वह सदा अपने राज कार्य में जुटा रहता तथा धर्म-कर्म की ओर ध्यान देने के स्थान पर रंगरलियां मनाने में लगा रहता| ऐसे पुरुष प्राय: शकी स्वभाव के होते हैं| राजा हमेशा अपनी रानी पर शक करता रहता था| रानी जितनी नेक थी उतनी ही रूपवंती भी थी| परमात्मा ने उसे सभी सुख दिए थे, वह शांति से दिन काट रही थी|

जब राजा जागा तो उसने देखा कि रानी की सेज खाली है| वह कहां गई? राजा के मन में हैरानी हुई| उसने उठ कर देखा पर रानी उसे कहीं भी न मिली| राज भवन के पहरेदारों से पूछा तो उन्होंने भी कुछ न बताया, क्योंकि जब रानी जाती थी तो उस समय पहरेदारों को नींद आ जाया करती थी| वह रानी को जाते हुए नहीं देख पाते थे| यह सब भगवान की ही लीला थी|

जब रानी वापिस आ गई तो राजा चुप ही रहा| उसने रानी को कुछ न पूछा| पर अगली रात को उसे नींद न आई| वह जागता रहा और उसने नजर रखी कि कब रानी उठ कर जाती है लेकिन रानी अपने नित्य नियम अनुसार सो गई| जब अमृत के समय कीर्तन का समय आया, आधी रात बीत गई तो रानी उठी| स्नान किया, साधारण भक्ति भाव वाले वस्त्र पहने और कीर्तन में चल पड़ी|

राजा वास्तव में सोया नहीं था| वह तो ऐसे ही आंखें बंद करके लेटा था| जब तारा रानी चली तो राजा ने उसका पीछा किया| रानी कीर्तन में जा बैठी, वहां पर हरि कीर्तन हो रहा था| वहां पर सब भक्त कीर्तन में अन्तर्ध्यान हुए विराजमान थे| परम शांति और प्यार का वातावरण था|

राजा रानी का पीछा करते-करते कीर्तन में पहुंच गया| वह वहां पर खड़ा पहले तो कुछ देर सोचता रहा, फिर रानी की एक खड़ाऊं उठा कर अपने राज भवन में आ गया| राज भवन आकर आराम से अपनी सेज पर सो गया| उसको दीन दुनिया का कोई ख्याल नहीं था, वह तो राज-काज, रंग-राग और माया का पुतला था| उस दिन वह सोते हुए कई स्वपन देखता रहा|

कीर्तन समाप्त हुआ तथा भोग पड़ गया| जब रानी बाहर आ कर अपनी खड़ाऊं पहनने लगी तो एक खड़ाऊं गायब थी| एक खड़ाऊं को देखकर रानी कुछ हैरान हुई कि यह कैसे हो गया? एक खड़ाऊं किसने चुरा ली है| उस समय सत्संगियों को भी पता चल गया| संगत ने अरदास की कि है पारब्रह्म! तुम्हारा यश गान करते हुए रानी की खड़ाऊं का चले जाना भय का कारण है| तुम्हारा यश किस तरह प्रगट होगा? कोई चमत्कार दिखाओ, रानी ने राज भवन जाना है|

संगत ने ऐसी अरदास की कि उसी समय खड़ाऊं के साथ वही जो पुरानी खड़ाऊं थी, आ कर जुड़ गई| रानी तारा ने खड़ाऊं के साथ वही जोड़ी पहनी और राज भवन में आ गई| जब वह अपने कक्ष में गई तो राजा ने पूछा, 'रानी! आप की खड़ाऊं कहां है?'

हे नाथ! मेरी खड़ाऊं मेरे पैरों में है| क्या बात है जो आज आप ने यह पूछने को कष्ट किया|' तारा रानी ने उत्तर दिया|

'कहां है? राजा ने फिर पूछा|'

'दासी के पैरों में|'

राजा हरिचन्द ने देखा दोनों खड़ाऊं रानी के पैरों में थी एक जैसी थी, एक जैसी ही घिसी हुई| राजा को हैरानी हुई और उसने जल्दी से उठा कर लाई हुई खड़ाऊं देखनी चाही, पर वह खड़ाऊं वहां नहीं थी| इस तरह के चमत्कार से राजा बड़ा हैरान हुआ| रानी सारी बात समझ गई कि राजा बाद में जाग गया होगा और शक पड़ने पर मेरे पीछे लग गया होगा| पर सत्संग के कारण मेरी लाज रह गई| पारब्रह्म परमेश्वर बड़ा दयालु और लीला करने वाला है| कोई भी उसका पारावार नहीं ले सकता| तब रानी ने स्पष्ट तौर पर राजा से पूछा, हे नाथ! अब तो आपको विश्वास हो गया कि मैं आधी रात को उठ कर कहां जाती हूं| मैं परमात्मा की भक्ति करती हूं| भक्ति ही मेरे जीवन का उद्देश्य है| इस मायावादी जगत में और है भी क्या? कितना अच्छा हो अगर आप भी वहां सत्संग में जाया करें| सत्संग में बैठ कर थोड़ा-सा तन मन को शांत कर लिया करो, राज-काज तो होते ही रहते हैं|

राजा हरिचन्द ने तारा रानी से क्षमा मांगी तथा उसे कीर्तन में जाने की आज्ञा दे दी| वह स्वयं भी भक्ति मार्ग पर चल पड़ा| 

भक्त सधना जी भक्त पीपा जी भक्त सैन जी भक्त सुदामा

Please write your thoughts or suggestions in comment box given below. This will help us to make this portal better.

SpiritualWorld.co.in, Administrator
अपनी आप बीती, आध्यात्मिक या शिक्षाप्रद कहानी को अपने नाम के साथ इस पोर्टल में सम्मलित करने हेतु हमें ई-मेल करें । (Email your story with your name, city, state & country to: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. ) Submit your story to publish in this portal

Media

 

नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

Disclaimer

 

इस वेबसाइट का उद्देश्य जन साधारण तक अपना संदेश पहुँचाना है| ताकि एक धर्म का व्यक्ति दूसरे धर्म के बारे में जानकारी ले सके| इस वेबसाइट को बनाने के लिए विभिन्न पत्रिकाओं, पुस्तकों व अखबारों से सामग्री एकत्रित की गई है| इसमें किसी भी प्रकार की आलोचना व कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया|
Special Thanks to Dr. Rajni Hans, Ms. Karuna Miglani, Ms. Anisha Arora, Mr. Ashish Hans, Ms. Mini Chhabra & Ms. Ginny Chhabra for their contribution in development of this spiritual website. Privacy Policy | Media Partner | Wedding Marketplace

Vulnerability Scanner

Connect With Us