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शब्द की महिमा – कबीर दास जी के दोहे अर्थ सहित

शब्द की महिमा

शब्द की महिमा: संत कबीर दास जी के दोहे व व्याख्या

1 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
शब्द दुरिया न दुरै,
कहूँ जो ढोल बजाय |

जो जन होवै जौहोरी,
लेहैं सीस चढ़ाय ||

व्याख्या: ढोल बजाकर कहता हूँ निर्णय – वचन किसी के छिपाने (निन्दा उपहास करने) से नहीं छिपते | जो विवेकी – पारखी होगा, वह निर्णय – वचनों को शिरोधार्य कर लेगा |

2 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
एक शब्द सुख खानि है,
एक शब्द दुःखराखि है |

एक शब्द बन्धन कटे,
एक शब्द गल फंसि ||

व्याख्या: समता के शब्द सुख की खान है, और विषमता के शब्द दुखो की ढेरी है | निर्णय के शब्दो से विषय – बन्धन कटते हैं, और मोह – माया के शब्द गले की फांसी हो जाते हैं |

3 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
सीखै सुनै विचार ले,
ताहि शब्द सुख देय |

बिना समझै शब्द गहै,
कहु न लाहा लेय ||

व्याख्या: जो निर्णय शब्दो को सुनता, सीखता और विचारता है, उसको शब्द सुख देते हैं | यदि बिना समझे कोई शब्द रट ले, तो कोई लाभ नहीं पाता |

4 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
हरिजन सोई जानिये,
जिहा कहैं न मार |

आठ पहर चितवर रहै,
गुरु का ज्ञान विचार ||

व्याख्या: हरि – जन उसी को जानो जो अपनी जीभ से भी नहीं कहता कि “मारो” | बल्कि आठों पहर गुरु के ज्ञान – विचार ही में मन रखता है |

5 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
कुटिल वचन सबते बुरा,
जारि करे सब छार |

साधु वचन जल रूप है,
बरसै अमृत धार ||

व्याख्या: टेड़े वचन सबसे बुरे होते हैं, वे जलाकर राख कर देते हैं | परन्तु सन्तो के वचन शीतल जलमय हैं, जो अमृत की धारा बनकर बरसते हैं |

6 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
खोद खाद धरती सहै,
काट कूट बनराय |
कुटिल वचन साधु सहै,
और से सहा न जाय ||

व्याख्या: खोद – खाद प्रथ्वी सहती है, काट – कूट जंगल सहता है | कठोर वचन सन्त सहते हैं, किसी और से सहा नहीं जा सकता |

7 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
मुख आवै सोई कहै,
बोलै नहीं विचार |

हते पराई आत्मा,
जीभ बाँधि तरवार ||

व्याख्या: कितने ही मनुष्य जो मुख में आया, बिना विचारे बोलते जी जाते हैं | ये लोग परायी आत्मा को दुःख देते रहते है अपने जिव्हा में कठोर वचनरूपी तलवार बांधकर |

8 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
जंत्र – मंत्र सब झूठ है, मत भरमो जग कोय |
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय |

व्याख्या: टोने – टोटके, यंत्र – मंत्र सब झूठ हैं, इनमे कोई मत फंसो | निर्णय – वचनों के ज्ञान बिना, कौवा हंस नहीं होता |

9 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
शब्द जु ऐसा बोलिये, मन का आपा खोय |
औरन को शीतल करे, आपन को सुख होय ||

व्याख्या: शरीर का अहंकार छोड़कर वचन उच्चारे | इसमें आपको शीतलता मिलेगी, सुनने वाले को भी सुख प्राप्त होगो |

10 दोहा (भक्त कबीर दास जी)
कागा काको धन हरै,
कोयल काको देत |

मीठा शब्द सुनाय को,
जग अपनो करि लेत ||

व्याख्या: कौवा किसका धन हरण करता है, और कोयल किसको क्या देती है ? केवल मीठा शब्द सुनाकर जग को अपना बाना लेती है |

 

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