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की जाणां – काफी भक्त बुल्ले शाह जी

की जाणां

की जाणां मैं कोई रे बाबा,
की जाणां मैं कोई|टेक|

जो कोई अन्दर बोले चाले,
ज़ात असाडी सोई|

जिसदे नाल मैं नेहुं लगाया,
ओहो जिहा मैं होई|

मिहर करीं ते फ़ज़ल करीं तू,
मैं आज़ज दी ढोई|

नचण लगी तां घुंघट केहा,
जद मुंह थीं लत्त्थी लोई|

भला होया असीं दूरों छुट्टे,
नेड़िओं लाल लधोई|

बुल्ल्हे शौह इनाइत करके –
शौक शराब दित्तोई|

मैं क्या जानूं 

आत्मा की अपनी कोई जाति नहीं होती और सामान्य व्यक्ति अपने को पहचान भी कहां पाता है| इसीलिए जिज्ञासु सन्त कहता है कि अरे बाबा, मुझे क्या पता कि मैं कौन हूं| मैं कौन हूं, यह मैं भला कैसा जान सकता हूं| मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि मेरे भीतर बैठा जो मुझसे बातचीत करता है, वही मेरी जात है| उसी के साथ मेरा नेह जुड़ा है और मैं बस उस जैसी ही हो गई हूं| अब प्रेम-बन्धन के कारण मैं विवश हूं और मेरा कोई सहारा नहीं है, इसलिए आप मुझ पर कृपा करो, दया करो| जब नाचने लगी तो घूंघट कहां टिकता है| अब तो चेहरे से परदा उतर गया है| (आत्मा-परमात्मा के बीच की बाधा गई) यह एक प्रकार से अच्छा ही हुआ, जो मेरा प्रिय मुझे समीप ही मिल गया, मुझे दूर जाने के झंझट में नहीं पड़ना पड़ा| बुल्ले पर शौह (पति) ने कृपा की और उसे प्रेम-मदिरा पिला दी| (उसी से आई बेख़ुदी में प्रभु से मिलना सम्भव हुआ|)

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