महामारी से अनूठा बचाव - श्री साईं कथा व लीला

(1 Vote)
  • font size
  • 12171 Views



एक समय साईं बाबा ने लगभग दो सप्ताह से खाना-पीना छोड़ दिया था| लोग उनसे कारण पूछते तो वह केवल अपनी दायें हाथ की तर्जनी अंगुली उठाकर अपनी बड़ी-बड़ी आँखें फैलाकर आकाश की ओर देखने लगते थे| लोग उनके इस संकेत का अर्थ समझने की कोशिश करते लेकिन इसका अर्थ उनकी समझ में नहीं आता था|

महामारी से अनूठा बचाव सुनने के लिए Play Button क्लिक करें | Listen Audio


बस कभी-कभी उनके कांपते होठों से इतना ही निकलता - "महाकाल का मुख अब खुल चुका है| सब कुछ उसके मुख में समा जायेगा| कोई भी नहीं बचेगा| एक-एक करके सब चले जायेंगे|"

साईं बाबा के मुख से निकलते इन शब्दों को सुनकर लोग मारे भय के बुरी तरह से कांप उठते| वे बाबा से पूछते, लेकिन वह मौन हो जाते| उनकी कांपती हुई अंगुली आकाश की ओर उठती और वह लंबी सांस लेकर फटी-फटी आँखों से आकाश की ओर बस देखते रह जाया करते थे| गांव का वातावरण सहमासहमा-सा रहने लगा था| प्रत्येक बृहस्पतिवार को साईं बाबा की शोभायात्रा बड़ी धूमधाम से निकलती थी, लेकिन न जाने क्यों लोगों के मन किसी अनिष्ट की आशंका से आशंकित हो उठे थे|

बाबा की इन बातों को सुनकर यदि किसी को सबसे ज्यादा खुशी हुई तो वह पंडितजी थे| वह इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि साईं बाबा जो कुछ भी कहते हैं, वह सच ही होता है|

उनकी भविष्यवाणी झूठी नहीं हो सकती| भविष्य में होने वाली घटनाओं को वे शायद पहले ही जान लेते थे| अकाल, बाढ़, महामारी ऐसी दैवी  आपदाएं हैं, जो गांव-के गांव पूरी तरह से बर्बाद करके रख देती है|

इनका कोई इलाज नहीं है| गांव के सब लोग गांव छोड़कर चले जाते हैं| शायद ऐसा ही कोई संकट शिरडी में आने वाला है| पंडितजी यह सोच-सोचकर मन में बहुत खुश थे कि यदि महामारी फैली तो लोग उनके पास ही अपना इलाज कराने के लिए आयेंगे, जिससे उनको अच्छी-खासी कमाई होगी, जबकि सारा गांव अनिष्ठ की आशंका चिंताग्रस्त था|

वर्षा ऋतु समाप्त हो चुकी थी| बाढ़ आने की कोई संभावना न थी| अच्छी बारिश होने के कारण खेतों में फसलें भी अच्छी हुई थीं| अकाल पड़ने की भी संभावना नहीं थी| यदि कोई आपदा आ सकती थी, तो वह थी महामारी| यदि महामारी फैली तो पंडितजी का भाग्य खुल जाएगा| जब से साईं बाबा शिरडी में आए थे, पंडितजी की आमदनी तो खत्म-सी ही हो गयी थी| साईं बाबा की धूनी की भभूती असाध्य से असाध्य रोगों का समूल ही नाश कर देती थी| इसी वजह से पंडितजी के पास रोगियों ने आना बिल्कुल ही बंद-सा कर दिया था|

फिर मंदिर में भी पूजा करने वालों की संख्या भी दिन-प्रतिदिन कम होती चली जा रही थी| केवल पांच-सात ही लोग ही ऐसे बचे थे, जो पूजा करने के लिए सुबह-शाम मंदिर आया करते थे| इसके अलावा शाम के समय प्रसाद के लालच में कुछ बच्चे भी मंदिर में इकट्ठे हो जाया करते थे| इस तरह मंदिर से होने वाली आमदनी भी नाममात्र की ही रह गयी थी| पुरोहिताई का धंधा भी बस ले-देकर ही चल रहा था|

साईं बाबा के प्रवचनों को सुनकर लोगों में कथा सुनने की रुचि भी जाती रही| वर्षा भी समय पर होती थी| इसलिए समय पर वर्षा कराने के बहाने से प्रत्येक वर्ष होने वाला यज्ञ भी होना अब बंद हो गया था| भूत-प्रेत, ब्रह्मराक्षस तो जैसे बाबा के गांव में कदम रखते ही गांव से पलायन कर गये था| गांव में अब किसी भी तरह का उत्पात नहीं होता था| प्रत्येक घर में सुख-शांति बा बसेरा था ! आपस के लड़ाई-झगड़े भी अब होने बंद हो चुके थे| पंडितजी को जैसे कुछ काम ही नहीं मिल रहा था| वह सारे दिन अपने घर में बेकार ही पड़े रहते थे|

घर में पड़े-पड़े पंडितजी बहुत दु:खी हो गये थे| उनके सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी होने लगी थी|

साईं बाबा बराबर चिंता में डूबे रहते थे| एकटक आकाश की ओर देखते रहते थे, किसी से कुछ भी न बोलते थे| तभी आस-पास के बीस कोस के इलाके में हैजे की महामारी फैलने की खबर से शिरडी गांव में कोहराम मच गया| हैजे की महामारी से लोग मरने लगे|

पहले कुछ उल्टियां होतीं, दस्त होते और लोग मौत के मुंह में समा जाते|जब तक लोग रोग को समझ पाते, रोगी बिना दवा-दारू के ही भगवान के पास पहुंच जाता था|

पंडितजी की सारी भाग-दौड़ व्यर्थ चली जाती थी|

आस-पास के गांवों में हैजा फैलने की खबर सुनकर शिरडी के लोग भी अत्यंत चिंतित हो उठे|

वह सब इकट्ठा होकर साईं बाबा के पास पहुंचे|

"बाबा...बाबा ! आस-पास के गांवों में हैजा तेजी से पैर पसारता जा रहा है| अब तो वह हमारे गांव की सीमा की ओर भी बढ़ता आ रहा है| कहीं ऐसा न हो कि हमारा गांव भी इस महामारी की लपेट में आ जाए|" शिष्यों ने डरते-डरते साईं बाबा से कहा|

साईं बाबा कई सप्ताह से मौन थे| उन्होंने खाना-पीना छोड़ रखा था| सारे शिष्य और वाईजा माँ उनसे मिन्नतें करके हार गये थे, लेकिन न तो बाबा ने खाना ही खाया और न ही किसी से कोई बातचीत ही की थी|

लोगों की इस पुकार को सुनकर साईं बाबा ने एक गहरी ठंडी सांस छोड़ी और फिर आकाश की ओर पूर्ववत् की भांति देखने लगे| मस्जिद में उपस्थित लोग भी उन लोगों के साथ साईं बाबा के चेहरे को देखने लगे कि शायद बाबा इस महामारी से बचने का कोई उपाय बतायेंगे|

साईं बाबा का चेहरा एकदम गंभीर पड़ गया| चिंता की लकीर उनके सलोने मुख पर स्पष्ट रूप से नजर आ रही थीं| ऐसा लगता था कि जैसे बाबा स्वयं किसी गहरी चिंता में हैं| कुछ कर पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं| अचानक साईं बाबा ने अपनी आँखें मूंद लीं और बोले - "तुम लोग कल सुबह आना| मैं सब बताऊंगा|" कहकर बाबा शांत हो गये| सब लोग बाबा की बात सुनकर चुपचाप उठकर अपने-अपने घरों को चले गए|

अगले दिन पौ फटते ही सब लोग द्वारिकामाई मस्जिद जा पहुंचे| देखा मस्जिद के दालान में बैठे हुए साईं बाबा चक्की में जौ पीस रहे थे और जौ का आटा चक्की के चोरों तरफ फैला हुआ था|

सब लोग चुपचाप खड़े साईं बाबा को जौ पिसते हुए देखते रहे| लेकिन साईं बाबा पूरी लगन के साथ जौ पीसे जा रहे थे| किसी की हिम्मत न हो रही थी कि वह उनसे कुछ पूछने का साहस जुटा सकें|

कुछ देर बाद एक भक्त से साहस जुटाया और आगे बढ़कर पूछा - "बाबा ! आप यह क्या कर रहे हैं ?"

"महामारी को भगाने की दवा बना रहा हूं|"

"यह दवा है ?"

बाबा ने कहा - "हां, यह दवा ही है| इस आटे को एक कपड़े में भरकर ले जाओ और गांव की सीमा में चारों ओर जहां-जहां तक महामारी फैली हो इस दवा को छिड़क आओ| परमात्मा ने चाहा तो इस गांव की सीमा में हैजे की महामारी प्रवेश न कर पायेगी|"

तब शिष्यों ने एक झोली में सारा आटा भर लिया और साईं बाबा की जय-जयकार करते हुए गांव की सीमा की ओर चल पड़े| दोपहर तक गांव के चारों ओर सीमा पर आटे से लकीर-सी बना दी गयी| इस प्रकार साईं बाबा द्वारा पीसे गये आटे से सारा गांव बांध दिया गया|

साईं बाबा की इस बात पर पंडितजी को विश्वास न हो पा रहा था कि हैजे जैसी महामारी का प्रकोप इस तरह से रुक सकता है| हैजे का प्रकोप आस-पास के गांवों में बड़ी तेजी के साथ बढ़ता जा रहा था| दस-पांच आदमी रोजाना मौत के मुंह के समाते चले जा रहे थे| चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था| साईं बाबा की इस अनोखी दवा का समाचार आस-पास के गांवों तक भी पहुंच गया| लोग दवा मांगने के लिए द्वारिकामाई मस्जिद आने लगे|

"बाबा, हमारे गांव में भी हैजा फैला है| हमारे ऊपर दया करके हमें भी दवा देने की कृपा करें|"

और भी लोग साईं बाबा के पास पहुंचकर बड़े ही दयनीय स्वर में कहने लगे - "हमें भी दवा दे दो बाबा ! हम पर भी अपनी दया करो| हमारा तो सारा गांव श्मशान बन गया है|"

"अरे, तुम लोग इतना परेशान क्यों हो रहे हो ? जितनी दवा है, आपस में बांटकर ले जाओ और गांव के प्रत्येक घर में छिड़क दो| जो बीमार होगा ठीक हो जाएगा और यह महामारी तुम्हारे गांव से भी भाग जायेगी|" बाबा ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा|

आस-पास के गांवों के लोग बाकी बची हुई दवा को बांटकर ले गए| साईं बाबा की चक्की की घर्र-घर्र की आवाज फिर मस्जिद के गुम्बदों और मीनारों को गुंजायमान करने लगी| दूर-दूर के गांवों में पहुंच जाती, वहां हैजे की बीमारी का नामोनिशान ही मिट जाता| बीमार इस तरह से उठकर खड़े हो जाते, मानो वह बीमार पड़े ही नहीं हों| दवा एकदम रामबाण के समान अपना काम कर रही थी| महामारी गधे के सींग की तरह गायब होती जा रही थी|

साईं बाबा की दवा की कृपा से सैंकड़ों घर उजड़ने से बच गये| हर तरफ बस साईं बाबा की जय-जयकार के स्वर ही सुनाई पड़ रहे थे|

साईं बाबा की कृपा से सबसे अधिक नुकसान यदि किसी का हुआ तो वह थे पंडितजी ! उनको कोई भी नहीं पूछ रहा था| महामारी फैली पर उनके दवाखाने में एक भी आदमी दवा लेने तक न आया| पंडितजी साईं बाबा से बड़ी बुरी तरह से जले-भुने बैठे थे| साईं बाबा उन्हें गांव में ऐसे खटक रहे थे जैसे आँख में तिनका|

पंडितजी दिन-रात इसी चिंता में घुले जा रहे थे कि किस तरह से साईं बाबा को नीचा दिखाकर, यहां शिरडी से निकाल भगाया जाये| वह अपने मन में बराबर उनके लिए नयी-नयी योजनाएं बना रहे थे, पर उनकी सारी योजनाएं अमल में लाने पर असफल होकर रह जाती थीं| 

ऊदी का चमत्कार ऊदी का एक और चमत्कार मिस्टर थॉमस नतमस्तक हुए ब्रह्म ज्ञान पाने का सच्चा अधिकारी

Please write your thoughts or suggestions in comment box given below. This will help us to make this portal better.

SpiritualWorld.co.in, Administrator
अपनी आप बीती, आध्यात्मिक या शिक्षाप्रद कहानी को अपने नाम के साथ इस पोर्टल में सम्मलित करने हेतु हमें ई-मेल करें । (Email your story with your name, city, state & country to: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. ) Submit your story to publish in this portal

Media

 

नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

Disclaimer

 

इस वेबसाइट का उद्देश्य जन साधारण तक अपना संदेश पहुँचाना है| ताकि एक धर्म का व्यक्ति दूसरे धर्म के बारे में जानकारी ले सके| इस वेबसाइट को बनाने के लिए विभिन्न पत्रिकाओं, पुस्तकों व अखबारों से सामग्री एकत्रित की गई है| इसमें किसी भी प्रकार की आलोचना व कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया|
Special Thanks to Dr. Rajni Hans, Ms. Karuna Miglani, Ms. Anisha Arora, Mr. Ashish Hans, Ms. Mini Chhabra & Ms. Ginny Chhabra for their contribution in development of this spiritual website. Privacy Policy | Media Partner | Wedding Marketplace

Vulnerability Scanner

Connect With Us