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मानवता के संरक्षण के लिए एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था बनाना आवश्यक है! – डा. जगदीश गांधी

मानवता के संरक्षण के लिए एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था बनाना आवश्यक है!

(1) संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘अन्तर्राष्ट्रीय मानवतावादी दिवस’ मनाने की घोषणा की

अन्तर्राष्ट्रीय मानवतावादी दिवस लोगों में मानवताकी भावना जगाने तथा विकसित करने के लिए ही शुरू किया गया है। दिसम्बर 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 19 अगस्त को ‘विश्व मानवतावादी दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। संयुक्त राष्ट्र संघ के बगदाद (इराक) में आफिस पर आतंकवादी हमले में 19 अगस्त, 2003 को 22 लोग मारे गए थे। अन्तर्राष्ट्रीय मानवता दिवस विश्व के उन सभी लोगों को एक श्रद्धाजंलि थी जिन्होंने अपना जीवन मानवता की राह पर चलते हुए विश्व को समर्पित कर दिया। मानव जाति के लिए अपने जीवन का बलिदान करने वाले भारत सहित विश्व के सभी मानवतावादियों को हम शत-शत नमन् करते हैं।

 

(2) रफ्ता-रफ्ता हम मानव अस्तित्व के समूल विनाश की ओर बढ़ते जा रहे हैं

मानवता एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा बहुत ही व्यापक है। आज विश्व का हर देश मानवीय संवेदना की निरन्तर कमी की वजह से कराह रहा है। हम मानव होकर भी मानवता के भाव से परे हैं। जैसे-जैसे मानव भौतिक प्रगति की राह पर आगे बढ़ रहा है वैसे-वैसे वह मानवता की सामाजिक एवं आध्यात्मिक भावना से दूर होता जा रहा है। एक देश मानवता को भुलाकर दूसरे देश की जनता पर बम गिराने में लगा है। विश्व में शरणार्थियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। अफ्रीका में करोड़ों लोग भूख की वजह से दम तोड़ रहे हैं वहीं कांगो जैसे गणराज्यों में हैवानियत का दर्दनाक मंजर देखने का मिल रहा है। इसके अतिरिक्त विश्व के कई हिस्सों में मानवता का निरंतर क्षय हो रहा है।

 

(3) समस्या विकराल होने के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ की मदद पर्याप्त नहीं है

एशिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में इस समय करोड़ों लोग भूखमरी और गंभीर अकाल की वजह से पीडित हैं। इनमें से सबसे बुरी हालत महिलाओं और अबोध बच्चों की है। हालत इतने गंभीर हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ भी सभी पीड़ितों की मदद करने में खुद को असहाय पा रहा है। अफ्रीका ही नहीं विश्व के कई अन्य हिस्सों में समाज को मानवता की जरूरत है। आज जहाँ भी प्राकृतिक आपदाएँ या कोई अन्य घटनायें होती है तो सबसे पहले लोग आसपास की जनता से मानवता के नाते मदद की आस रखते हैं।

 

(4) बच्चों को सुरक्षित भविष्य देना हमारा प्रथम दायित्व

बच्चों को सुरक्षित भविष्य देना संसार के सभी राष्ट्रों का प्रथम कर्तव्य एवं दायित्व है। क्योंकि आज के बच्चे ही कल उस देश के साथ ही सारे विश्व के भाग्य निर्माता बनेंगे। आज 4 में से 1 बालक गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, बढ़ती हुई हिंसा, असुरक्षा और भेदभाव का शिकार हैं। 11 सितम्बर 2001 को हुए न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर आतंकवादी हमले के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद आज मानव सभ्यता का सबसे घातक शत्रु बन गया है। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद पूरे संसार में फैली अराजकता का ही दुष्परिणाम है। यह एक ऐसी गम्भीर स्थिति है जहाँ लोग हिंसात्मक और विध्वंसकारी गतिविधियों द्वारा अपनी शिकायतों या दुखों का काल्पनिक समाधान खोजते हैं और इनके लिए वे व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं।

 

(5) बच्चों की सुरक्षा और मानवाधिकारों के विषय में प्रत्येक देश की चिन्ता एक जैसी है

आज की बिगड़ी हुई सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव लाने के लिए बच्चे ही सबसे सशक्त माध्यम हैं। बच्चों की सुरक्षा के विषय में सभी देश एकमत हैं। युद्धोन्माद में डूबी विश्व के अधिकांश देशों की सरकारों का ध्यान मैं संसार के बच्चों की दयनीय स्थिति की ओर दिलाना चाहता हूँ। जो निम्नवत हैं

  1. विश्व के पाँच साल से कम उम्र वाले 40,000 बच्चे रोज कुपोषण और बीमारियों से मरते हैं। लगभग 9.9 करोड़ बच्चों की 5 वर्ष की आयु से पूर्व ही आम बीमारियों और कुपोषण से मृत्यु हो जाती है।
  2. विश्व के 1.5 से 1.8 करोड़ बच्चे प्रत्येक वर्ष बचाये जा सकने वाले कारणों के अभाव में मृत्यु के शिकार होते हैं। जबकि इनमें से आधे बच्चे स्वास्थ्य सम्बन्धी देखभाल द्वारा बचाये जा सकते थे। 8,000 बच्चों की टीकाकरण के अभाव में मौत हो जाती है। लगभग 7,000 बच्चे दस्त से तथा 6,000 बच्चे निमोनिया से प्रतिदिन मरते हैं। इनको लगभग 2.5 बिलियन डॉॅलर की स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है।
  3. प्राइमरी स्कूल आयु वर्ग के लगभग 10 करोड़ बच्चे किसी भी तरह के शैक्षिक कार्यक्रम में शामिल नहीं है।
  4. विकासशील देशों के केवल आधे बच्चों को ही स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है और इससे भी कम को शौच की सही व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।
  5. लाख मातायें बच्चे को जन्म देने या गर्भावस्था के समय मृत्यु का शिकार हो जाती हैं।
  6. कई विकासशील देशों में स्तनपान में कमी आई है जबकि बोतल से दूध पीने वाले शिशु अधिकतर बीमारियों के शिकार होते हैं और स्तनपान करने वाले शिशुओं से 25 प्रतिशत अधिक बाल्यावस्था में ही मृत्यु के शिकार हो जाते हैं।
  7. प्रत्येक वर्ष कम से कम 2,50,000 बच्चे खाने में विटामिन ‘ए’ की थोड़ी सी कमी की वजह से अपनी दृष्टि गवां बैठते हैं।
  8. संसार भर में 10 करोड़ से अधिक बच्चे कठिन और खतरनाक परिस्थितियों में काम करने के लिए बाध्य किये जाते हैं। इनमें से कई बंधुआ मजदूर की तरह वेतन रहित कार्य करते हैं। 9. 100 करोड़ से अधिक लोगों के पास या तो कोई घर नहीं है या फिर उन्हें बहुत ही अमानवीय परिस्थितियों में अपने बच्चों के साथ रहना पड़ रहा है।
  9. पूरे संसार में एक करोड़ से अधिक बाल शरणार्थी हैं। शरणार्थी कैम्पों में कुपोषण से पीड़ित ये बच्चे अपने माँ-बाप से अलग होकर सारी जिन्दगी बन्द रिफ्यूजी कैम्पों में गुजार देते हैं। जिन्हें चारों ओर से बन्दूकें और काँटेदार तार की बाड़े घेरे रहती हैं।
  10. विश्वव्यापी समस्याओं को विश्व स्तर के समाधानों की आवश्यकता है।
  11. विश्वव्यापी समाधानों के अभाव के कारण विश्व स्तर की समस्यायें और अधिक जटिल और गूढ़ होती जा रही हैं और सारी मानव जाति को उलझाती जा रही हैं।

(6) विश्वव्यापी समस्याओं के समाधान के लिए विश्वव्यापी प्रयासों की आवश्यकता है

अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, ग्लोबल वार्मिंग, परमाणु शस्त्रों की बढ़ती होड़, युद्ध, कानूनविहीनता, कुपोषण, महामारी, भूख आदि विश्वव्यापी समस्याओं से संसार के लगभग दो अरब तथा चालीस करोड़ बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए प्रभावशाली एवं विश्वव्यापी प्रयासों की आज अविलम्ब आवश्यकता है। जिसके लिए सभी देशों की आपसी सहमति से विश्व सरकार का गठन ही इसका एकमात्र समाधान है। प्रत्येक राष्ट्र के लिए अपने देश के बच्चों का सुरक्षित भविष्य सबसे प्रमुख मुद्दा है। इसलिए सभी राष्ट्रों के मामले में भी विश्व के दो अरब तथा चालीस करोड़ बच्चों का सुरक्षित भविष्य सबसे सर्वमान्य मुद्दा तथा चिन्ता का विषय है। प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय कानून की डोर से विश्व के राष्ट्रों को
बांधकर एकताबद्ध किया जा सकता है। संसार को एकताबद्ध करके युद्धरहित बनाया जा सकता है। ऐसे होने से प्रत्येक राष्ट्र द्वारा अपनी सुरक्षा के नाम से होने वाले रक्षा बजट तथा मानव संसाधन को बचाकर प्रत्येक व्यक्ति के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा आदि की अच्छी व्यवस्था करने में लगाया जा सकता है।

(7) वसुधैव कुटुम्बकम् तथा भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 विश्वव्यापी समस्याओं का एकमात्र समाधान है

अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद जैसी विश्वव्यापी समस्याओं को केवल अन्तर्राष्ट्रीय कानून के ही द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है, युद्धों के द्वारा नहीं। इस हेतु सारे विश्व की एक प्रभावशाली कानून व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्ति प्रदान करके विश्व संसद के रूप में गठन शीघ्र करना होगा। विश्व में एकता एवं शांति स्थापित करने के लिए भारत को सारे विश्व की न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने के लिए कार्य करने के लिए आगे आना चाहिए। भारत के पास अपनी संस्कृति का वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श तथा विश्व का सबसे अनूठा संविधान है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करने तथा विश्व एकता के लिए कार्य करने के लिए भारत के प्रत्येक नागरिक तथा राज्य को बाध्य किया गया है। आज विश्व में प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अभाव में अराजकता का मौहाल व्याप्त है। भारत को विश्व के सभी देशों से परामर्श करके उन्हें विश्व संसद, विश्व सरकार तथा विश्व न्यायालय के शीघ्र गठन के लिए सहमत करना चाहिए। शान्ति प्रिय देश भारत ही अपनी उदार संस्कृति, स्वर्णिम सभ्यता तथा अनूठे संविधान के बलबूते सारे विश्व में शान्ति स्थापित कर सकता है।

 

डा. जगदीश गांधी

डा. जगदीश गांधी

– डा. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं
संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

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