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जैव विविधता हमारी अन्तर्राष्ट्रीय धरोहर है और इसका संरक्षण परम आवश्यक है! – डा. जगदीश गांधी

जैव विविधता हमारी अन्तर्राष्ट्रीय धरोहर है और इसका संरक्षण परम आवश्यक है!

(1) जैव विविधता हमारी अन्तर्राष्ट्रीय धरोहर है :-

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जैव विविधता के लिए अन्तर्राष्ट्रीय दिवस प्रतिवर्ष 22 मई को मनाने की घोषणा की गयी है। यह दिवस मानव जाति को जैव विविधता के संरक्षण के लिए प्रेरित करता है। यह दिवस जन समुदाय तथा उसके लीडर्स को जैव विविधता के संरक्षण से होने वाले लाभों के बारे में शिक्षित करने का सुअवसर प्रदान करता है। जैव विविधता का संरक्षण संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख लक्ष्यों में से एक है। यह दिवस जैव विविधता के संरक्षण के लिए विश्व के सभी देशों को प्रेरित करता है। यह दिवस इस बात के चिन्तन-मनन का दिन है कि हम कैसे अपनी वसुंधरा को बचा सकते हैं। धरती को जैव विविधता के क्षरण से बचाने के ऐसे कई तरीके हैं जिसके लिए हम अकेले और सामूहिक रूप से वातावरण बनाने में अपना यथाशक्ति योगदान दे सकते हैं। इस दिशा में हमें रोजाना कुछ न कुछ करते रहने का संकल्प लेना चाहिए।

(2) जीवन का समग्र रूप पृथ्वी की सतह पर एक पतली परत में ही सीमित है :-

अभी तक ज्ञात संपूर्ण ब्राह्माण्ड में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जहां जीवन व्याप्त है। यहां सूक्ष्म पौधों से लेकर विशाल वृक्ष विद्यमान हैं, तो सूक्ष्म अमीबा से लेकर हेल जैसे विशाल प्राणी भी हैं। पृथ्वी पर लगभग दस लाख जीवधारी रहते हैं। इन जीवधारियों में मनुष्य का स्थान सर्वप्रमुख हैं। जीवन का समग्र रूप पृथ्वी की सतह पर एक पतली परत में ही सीमित है। प्रकृति जीवन के विविध रूपों का एक उलझा जाल है। पर्यावरण के निर्जीव, किन्तु अभिन्न अंगों, यथा-मिट्टी, जल, वायु ताप आदि एक-दूसरे को सतत् प्रभावित करते रहते हैं। प्रकृति ने धरातल, समुद्रों, नदियों, झीलों आदि में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और उभयचर, जलचर तथा थलचर जीवों का सृजन किया है। पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखने में इनमें से सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। ‘जैव विविधता’ का अर्थ है-जीवों की विविधता। जैव-विविधता के अंतर्गत पौधों, पशुओं और सूक्ष्म जीवों की सभी प्रजातियों तथा पारिस्थितिकी और उससे सम्बद्ध समस्त प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं। यह पृथ्वी पर जीवन का आधार है। जैव-विविधता सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

(3) पृथ्वी में नाना प्रकार के जीवन के पोषण की अद्वितीय क्षमता विद्यमान है :-

विभिन्न रूपों में पृथ्वी पर प्रकृति का विकास करोड़ों वर्षां की लम्बी प्रक्रिया के बाद हुआ है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के साथ ही जंतुओं की प्रजातिगत विविधता भी विद्यमान है। पृथ्वी पर अनेक प्रकार के जीवों की उत्पत्ति हुई और इनमें कई जीव समय-समय पर विलीन भी हो गए, यथा-डायनासोर और उसकी अन्य प्रजातियां आज से लगभग 7़50 करोड़ वर्ष पूर्व ही पृथ्वी से सदा के लिए विलुप्त हो गयी। वर्षा, ऊंचाई तथा जलवायु पृथ्वी के विभिन्न भागों में जीवन का रूप-निर्धारण करते हैं। इस कारण जीव प्रकृति की अनुपम धरोहर है। प्रकृति और जीवन में सूक्ष्म संतुलन है और पृथ्वी में नाना प्रकार के जीवन के पोषण की अद्वितीय क्षमता है।

(4) प्रजातियों की विविधता को बनाए रखने में भी जैविक विविधता एक महत्वपूर्ण हथियार के रूप में कार्य करती है :-

प्रकृति की संरचना के अनुकूल प्रत्येक जीव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यदि इनमें से किसी का भी क्षरण हो जाता है, तो उसका प्रभाव संपूर्ण पर्यावरण पर पड़ता है। जैव-विविधता में क्षरण का सर्वाधिक बुरा प्रभाव मानव जाति पर ही पड़ता है। मनुष्य ज्ञात-अज्ञात रूप में जीवों के विनाश का शिकार बन जाता है। जीवों के अचानक विलुप्त हो जाने से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है और इसके दुष्परिणामों की सर्वाधिक क्षति मनुष्य को ही उठानी पड़ती है। जैव-विविधता प्राकृतिक संतुलन में उल्लेखनीय भूमिका निभाती है। यह वैज्ञानिकों के लिए ऐसे महत्वपूर्ण स्त्रोत उपलब्ध कराती हैं, जिसके आधार पर जीवन की उत्पत्ति और विकास का सम्यक् अध्ययन कर वनस्पतियों तथा वन्यजीवों की रक्षा के साथ-साथ नए-नए प्रकार के जीवों की उत्पत्ति संभव हो सकी है। जैविक विविधता प्रजातियों की विविधता को बनाए रखने में भी एक महत्वपूर्ण हथियार के रूप में कार्य करती है। निवास-स्थान की सुरक्षा और उसके आवास के वातावरण के अनुकूलन के लिए जैव-विविधता की अधिकता अत्यधिक उपयोगी है।

 

(5) पारिस्थितिक विविधता को जैव-विविधता नियंत्रित करती है :-

पारिस्थितिकी में भी जैव-विविधता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भूमि की उर्वरता बनाए रखना, आद्रता को कायम रखना, कचरों को नियंत्रित करना आदि जैव-विविधता से ही संभव है। पारिस्थितिक विविधता को जैव-विविधता नियंत्रित करती है। यह विभिन्न जीवों की एक-दूसरे की आवश्यकता की पूर्ति में सहायक होती है। पारिस्थितिक विविधता का सबसे अच्छा स्वरूप मानव-समाज में देखने को मिलता है। मनुष्य के लिए भोजन, औषधि, उद्योगों के लिए कच्चे माल आदि विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों से ही प्राप्त किए जाते हैं।

(6) मनुष्य शायद वर्तमान युग का सर्वाधिक तीव्र मस्तिष्क वाला जीव है :-

आज से लगभग 20-30 लाख वर्ष पूर्व पृथ्वी पर अवतरित हुए मानव की जनसंख्या में पिछली कुछ शताब्दियों में अपार वृद्धि हुई है और इस जनसंख्या वृद्धि का भारी दबाव जैव-विविधता पर पड़ा है। पारिस्थितिकी के अनुकूलन के लिए जनसंख्या का नियंत्रित होना अत्यावश्यक होता है। मनुष्य शायद वर्तमान युग का सर्वाधिक तीव्र मस्तिष्क वाला जीव है। उसने अपने मस्तिष्क का उपयोग कर निरंतर विकास किया है। अपने विकास के क्रम में उसने अन्य जीवों के जीवन की बहुत ही अधिक उपेक्षा की है। अपने निवास स्थान और भोजन की समुचित व्यवस्था के लिए वनस्पतियों एवं अन्य जीवों को विनाश के कगार पर पहुंचा दिया है उसने भौतिकवाद और तीव्र औद्योगीकरण की अंध प्रवृत्तियों से दिग्भ्रमित होकर प्रकृति के सारे नियमों की अनदेखी कर दी है और इससे कुपित होकर प्रकृति ने संपूर्ण विश्व को पर्यावरणीय समस्याओं के जाल में डाल दिया है।

(7) विश्व की समस्याओं के समाधान खोजने में टीचर्स से काफी आशायें हैं :-

यूनेस्को नई दिल्ली द्वारा सिटी मोन्टेसरी स्कूल तथा एसईईडी इंडिया के सहयोग से एक नेशनल टीचर्स ट्रेनिंग वर्कशाप का आयोजन किया गया। इस वर्कशाप का विषय था : मल्टीपल प्रास्पेक्टिव अप्रोच टू बायोडाइवरसिटी। इस तीन दिवसीय वर्कशाप में टीचर्स को जैवविविधता के विषय में उपयोगी तथा सारगर्भित जानकारियाँ दी। मल्टीपल प्रास्पेक्टिव अप्रोच टू बायोडाइवरसिटी वर्कशाप का उद्देश्य टीचर्स को ईएसडी मल्टीपल प्रास्पेक्टिव लर्निंग टूल (एक्सपोर्लिंग सस्टेन्बिल डेवलेपमेन्ट) अर्थात जैवविविधता के बारे में जानकारी बढ़ाने के अभियान से जोड़ना था। इस वर्कशाप में भाग लेने के लिए मुख्य रूप से देश भर से सैकेण्डरी स्कूलों के 50 मास्टर ट्रेनर्स के ग्रुप ने प्रतिभाग किया। इस 50 मास्टर ट्रेनर्स में सीएमएस के 20 इन्वारमेन्ट कोआर्डीनेटर्स भी शामिल थे। यह गु्रप टीचर्स तथा छात्रों को मल्टी डिसप्लनेरी एण्ड मल्टी प्रास्पेक्टिव टीमें बनाने के लिए मदद की। टीचर्स तथा उनके छात्रों की टूल्स तथा फ्रेमवर्कस की जटिल मुद्दों पर सोचने के लिए आज के आधुनिक युग में बहुत जरूरत है। मानव जाति का अस्तित्व सदैव बना रहे, उससे संबंधित जटिल मुद्दों से मुक्त करने में टूल्स तथा फ्रेमवर्कस सहायता करेंगे। कुछ देश अपने देश की गंदगी तथा नुकसानदायक चीजों को दूसरों देशों में डाल देते हैं जिसकी पर्यावरण को बिगाड़ने में अह्म भूमिका होती है। इस तरह के वैश्विक मुद्दों के प्रति भी टूल्स तथा फ्रेमवर्कस जागरूक है। आज के छात्र कल को मतदाता बनेंगे तथा कुछ समाज को नेतृत्व प्रदान करेंगे। एक व्यस्क की इस नई भूमिका में उन्हें जटिल मुद्दों के सर्वश्रेष्ठ उपयुक्त उत्तर ढूंढ़ने होंगे। इन छात्रों को एकताबद्ध तथा सुरक्षित विश्व के निर्माण के लिए आगे अपना मार्ग खोजने के लिए प्रशिक्षित होना होगा। हमारा मानना है कि मल्टी प्रास्पेक्टिव अनालैसिस टूल छात्रों की इस नई भूमिका में सहायता करेगा। विश्व की समस्याओं के समाधान खोजने में टीचर्स से काफी नई आशायें हैं।

(8) वसुधा को महाविनाश से बचाने के लिए अति शीघ्र विश्व संसद का गठन नितान्त आवश्यकता है :-

इस तीन दिवसीय नेशनल वर्कशाप में देश भर से प्रतिभाग करने पधारे टीचर्स के साथ सीएमएस के 20 इन्वारमेन्ट कोआर्डीनेटर्स भी शामिल होकर ईएसडी मल्टीपल प्रास्पेक्टिव लर्निंग टूल का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस लर्निंग टूल का ज्ञान उजागर करने से सीएमएस टीचर्स अपने छात्रों में पर्यावरण, सामाजिक तथा आर्थिक मुद्दों को सुलझाने की क्षमता का विकास करने में सहायता कर सकेंगे। विश्व भर में ग्लोबल वर्मिंग, जैवविविधता के संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के लिए विश्व के सभी देशों को एक मंच पर आकर तत्काल संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्ति प्रदान करके विश्व संसद का स्वरूप प्रदान करने पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाना चाहिए। इस विश्व संसद द्वारा विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए जो भी नियम व कानून बनाये जाये, उसे विश्व सरकार द्वारा प्रभावी ढंग से लागू किया जाये और यदि इन कानूनों का किसी देश द्वारा उल्लघंन किया जाये तो उस देश को विश्व न्यायालय द्वारा दण्डित करने का प्राविधान पूरी शक्ति के साथ लागू किया जाये। इस प्रकार विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों को ग्लोबल वार्मिंग, जैवविविधता के क्षरण तथा जलवायु परिवर्तन जैसे महाविनाश से बचाने के लिए अति शीघ्र विश्व संसद के गठन की नितान्त आवश्यकता है। उद्देश्यपूर्ण शिक्षा एवं योग शिक्षा की मदद से कई जैव विविधता जैसी अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं का हल हो सकता है। जीवनशैली में बदलाव कर और जागरूकता फैला कर जैव विविधता तथा जलवायु परिवर्तन से लड़ा जा सकता है।

डा. जगदीश गांधी

डा. जगदीश गांधी

– डा. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं
संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

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