काले के भतीजे को वरदान देना

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एक दिन काला अपने यतीम भतीजो लोहिया और संदली को साथ लेकर गुरु हरि राय जी के पास लाया| पहले उसने गुरु जी को माथा टेका फिर अपने भतीजो को ऐसा करने के लिए कहा| परन्तु वहाँ खड़े खड़े ही बच्चों के पेट बजने लगे| गुरु जी ने कहा कालेआ! यह क्या कहतें हैं|

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काले ने कहा महाराज! मेरा भाई मर चुका है और मेरे भतीजे पेट से भूखें हैं| यह आपसे रोटी मांगते हैं| गुरु जी खुश होकर कहने लगे कालेआ! यह अनेक औरों को भी रोटी देंगे| यह बड़े सौभाग्यशाली होंगे|

यह वरदान लेकर काला घर वापिस आ गया| वह बहुत खुश था| उसने आकर अपनी स्त्री को बताया कि वह अपने भतीजों के लिए राज्य का वरदान ले आया है| पत्नी कहने लगी कि अपने बच्चे तो इनकी प्रजा बनकर रहेंगे| तुमने इन का क्या सोचा है? 

अपनी स्त्री की ऐसी बात सुनकर काला अपने बच्चों को भी गुरु जी के पास ले आया और प्रार्थना करने लगा कि गुरु जी जब से मेरी पत्नी ने मेरे भतीजों के बारे में यह सुना है कि उन्हें राज्य प्राप्त होगा और मेरे पुत्र इनकी अधीनता में रहेंगे| इनके प्रजा बनकर रह जायेगे| इसलिए मेरे पुत्रों को भी राज्य का वरदान बक्शो| आगे से गुरु जी मुस्कुरा पड़े और कहने लगे तुम्हारे पुत्र भी स्वतंत्रता से खेती करेगें और किसी का हाला नहीं भरेगे| 

यह वरदान लेकर काला खुशी खुशी घर आ गया| उसने सारी बात पत्नी को बताई कि गुरु जी ने ऐसा वरदान दिया है| तब उसे शांति प्राप्त हुई| 

गुरु के वरदान से काले के भतीजों के संतान नाभे और पटियाला के राजे हुए| और उसके अपने पुत्रों की संतान बिना किसी को हाला दिए अपनी खेती करते रहे| 

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