श्री गुरु गोबिंद सिंह जी - गुरुगद्दी मिलना

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श्री गुरु तेग बहादर जी (Shri Guru Tek Bahadar Ji) के समय जब औरंगजेब के हुकम के अनुसार कश्मीर के जरनैल अफगान खां ने कश्मीर के पंडितो और हिंदुओं को कहा कि आप मुसलमान हो जाओ| अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो क़त्ल कर दिया जायेगा| कश्मीरी पंडित भयभीत हो गए|

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उन्होंने अपना अन्न जल त्याग दिया और प्रार्थना करने लगे| कुछ दिन के बाद उन्हें आकाशवाणी के द्वारा अनुभव हुआ कि इस समय धर्म की रक्षा करने वाले श्री गुरु तेग बहादर जी (Shri Guru Tek Bahadar Ji) हैं| आप पंजाब जाकर अपनी व्यथा बताओ| वह आपकी सहायता करने में समर्थ हैं| 

आकाशवाणी के अनुसार पंडित पूछते-पूछते श्री गुरु तेग बहादर जी के पास आनंदपुर आ गए और प्रार्थना की कि महाराज! हमारा धर्म खतरे में है हमे बचाएं| 

उनकी पूरी बात सुनकर गुरु जी सोच ही रहे थे कि श्री गोबिंद सिंह (Shri Guru Gobind Singh Ji) जी वहाँ आ गए| गुरु जी कहने लगे बेटा! इन पंडितो के धर्म की रक्षा के लिए कोई ऐसा महापुरुष चाहिए, जो इस समय अपना बलिदान दे सके| 

पिता गुरु का वह वचन सुनकर श्री गोबिंद जी (Shri Guru Gobind Singh Ji) ने कहा कि पिता जी! इस समय आप से बड़ा और कौन महापुरुष है, जो इनके धर्म कि रक्षा कर सकता है? आप ही इस योग्य हो| 

अपने नौ साल के पुत्र की यह बात सुनकर गुरु जी बहुत प्रसन्न हुए| आपने पंडितो को कहा कि जाओ अफगान खां से कह दो कि अगर हमारे आनंदपुर वासी गुरु जी मुसलमान हो जाएगें तो हम भी मुसलमान बन जाएगें|


यह बात सुनकर औरंगजेब ने गुरु जी को दिल्ली बुला लिया| गुरु जी ने सन्देश वाहक को कहा कि तुम चले जाओ हम अपने आप बादशाह के पास पहुँच जाएगें| गुरु जी ने घर बाहर का प्रबंध मामा कृपाल चंद को सौंप कर तथा हर बात अपने साहिबजादे को समझा दी और आप पांच सिखों को साथ लेकर दिल्ली की और चल दिए|

जब गुरु साहिब जी किसी भी तरह ना माने तो औरंगजेब ने गुरु जी को डराने के लिए भाई मति दास को आरे से चीर दिया और भाई दिआले जी को पानी की उबलती हुई देग में डालकर आलू की तरह उबाल दिया| दोनों सिखों ने अपने आप को हँस-हँस कर पेश किया| जपुजी साहिब का पाठ तथा वाहि गुरु का उच्चारण करते हुए सच खंड जा विराजे| बाकी तीन सिख गुरु जी के पास रह गए| 

गुरु जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक जानकर बाकी तीन सिखों को वचन किया कि तुम अपने घरों को चले जाओ अब यहाँ रहने का कोई लाभ नहीं है| उन्होंने प्रार्थना की कि महाराज! हमारे हाथ पैरों को बेडियाँ लगी हुई हैं, दरवाजों पर ताले लगे हुए हैं हम यहाँ से किस तरह से निकले| गुरु जी ने वचन किया कि आप इस शब्द का "कटी बेडी पगहु ते गुरकीनी बन्द खलास" का पाठ करो| आपकी बेडियाँ टूट जाएगीं और दरवाजों के ताले खुल जाएगे और तुम्हें कोई नहीं देखेगा|


इसके पश्चात गुरु जी ने अपनी माता जी व परिवार को धैर्य देने वह प्रभु की आज्ञा को मानने के लिए शलोक लिखकर भेजे - 

गुन गोबिंद गाइिओ नही जनमु अकारथ कीन|| 
कहु नानक हरि भजु मना जिहि विधि जल कौ मीन||१||


यहाँ से आरम्भ करके अंत में लिखा -

राम नामु उरि मै गहियो जाकै सम नही कोइि|| 
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारो होइि||५७||

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब पन्ना १४२६-१४२९)


इन शालोको के साथ ही गुरु जी ने पांच पैसे और नारियल एक सिख के हाथ आनंदपुर भेज के गुरु गद्दी अपने सुपुत्र श्री गोबिंद राय को दे दी|

परन्तु गुरुगद्दी पर बैठने की पूरी मर्यादा श्री गुरु तेग बहादर जी (Shri Guru Tek Bahadar Ji) के अन्तिम संस्कार करने के बाद 12 मघहर संवत 1232 को की गई| इस समय बाबा बुड्डा जी से पांचवी पीढ़ी उनके बड़े पोत्र बाबा राम कुइर (बाबा गुरबक्श सिंह) जी ने आप जी को गुरुगद्दी का तिलक लगाकर गुरु की मर्यादा अर्पण की| इसके पश्चात संगत ने अपनी अपनी भेंट अर्पण करके आपको नमस्कार किया|

आपजी ने गुरुगद्दी पर बैठकर अपने बाबा श्री गुरु हरि गोबिंद जी की तरह मीरी-पीरी दोनों कामों को अपना लिया| अच्छे योद्धा, शस्त्र व घोड़े अपने पास इक्टठे करने शुरू कर दिए| बीबी वीरो के पांच पुत्र, बाबा सूरज मल जी के दो पौत्र तथा श्री गुरु हरिगोबिंद जी के प्र्रोहित का पुत्र दयानन्द आदि योद्धे सतिगुरु के पास आनंदपुर रहने लगे| सतिगुरु जी इन से मिलकर नित्य प्रति शस्त्र विद्या का और घोड़े की सवारी का अभ्यास करते रहते| इनके साथ ही आपजी गुरु घर की मर्यादा के अनुसार सिख सेवकों को सतिनाम के उपदेश द्वरा आनन्दित करते| 


बिचित्र नाटक में आप जी लिखते हैं - 

राज साज हम पर जब आयो || जथा शकत तब धरम चलायो || 
भांति भांति बन खेल शिकारा || मरे रीछरोझ झंखार || १ || 

(दशम-ग्रंथ: बिचित्र नाटक: ७ वां अध्याय)

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