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विश्वव्यापी निःशस्त्रीकरण की दिशा में सार्थक कदम उठाने का समय अब आ गया है! – डा. जगदीश गाँधी

अवतारों को ही परमपिता परमात्मा का ‘सही पता’ मालूम होता है! - डा. जगदीश गाँधी

(1) शान्ति की सबसे बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ के वैश्विक निःशस्त्रीकरण के प्रयास:- संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल एसेम्बली ने वर्ष 1978 के स्पेशल सेशन में सदस्य देशों को शस्त्रों की बढ़ती होड़ के खतरों पर अंकुश लगाने तथा जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 24 से 30 अक्टूबर तक को वैश्विक निःशस्त्रीकरण सप्ताह मनाने की घोषणा की।

संयुक्त राष्ट्र समय-समय पर इस विषय पर सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष तथा अधिकृत गैर-सरकारी संस्थाओं की मीटिंग बुलाकर वैश्विक निःशस्त्रीकरण का प्रयास करता है। वैश्विक निःशस्त्रीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने समय-समय पर सदस्य देशों को सन्धि के लिए भी प्रेरित किया है। शक्तिशाली देश संयुक्त राष्ट्र संघ की उपेक्षा करके खतरनाक परमाणु बम बनाने की होड़ में संलग्न हैं। विज्ञान की प्रगति इस युग की अभूतपूर्व उपलब्धि है। प्रकृति की शक्तियों को हाथ में लेने की क्षमता शायद ही कभी इतनी बड़ी मात्रा में मनुष्य के हाथ रही हो। विज्ञान दुधारी तलवार है। इससे जहाँ स्वर्गोपम सुख-शांति की प्राप्ति की जा सकती है, वहाँ ब्रह्मांड के इस अप्रतिम संुदर ग्रह को-पृथ्वी को, चूर्ण-विचूर्ण करके भी रखा जा सकता है। यदि एक पागल आदमी बस एक बम चला दे तो करोड़ों आदमी तो वैसे ही मर जाएँगे, बाकी बचे आदमियों के लिए हवा जहर बन जाएगी। जहरीली हवा, जहरीला पानी, जहरीले अनाज और जहरीले घास-पात को खा करके आदमी जिंदा नहीं रह सकता। तब सारी दुनिया के आदमी खत्म हो जाएँगे।

(2) एक प्रभावशाली विश्व शासन तथा विश्व न्यायालय होना चाहिए:- मानव जाति विनाश की दिशा में लगातार बढ़ती जा रही है। हाइड्रोजन और एटम अस्त्रों की इतनी बड़ी मात्रा उसने सर्वनाश के लिए ही सँजोई है। प्रस्तुत दुर्बुद्धि के बाहुल्य के रहते हुए यह असंभव नहीं कि इस बारूद में कोई उन्मादी किसी भी क्षण आग लगा दे और यह ईश्वरीय अरमानों से सँजोई, सींची हुई दुनिया क्षण भर में धूलिकण बनकर किसी नीहारिका के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगे। विश्व का ऐसा दुःखद अंत काल्पनिक नहीं, वर्तमान परिस्थितियों में उस स्तर का खतरा पूरी तरह मौजूद है। एक शोध के अनुसार परमाणु शस्त्र बनाने में जितनी धनराशि व्यय होती है उससे कई गुना धनराशि उसे नष्ट करने में व्यय होती है। स्टार वाॅर की तैयारी के तहत अन्तरिक्ष में भी शक्तिशाली देशों ने घातक मिसाइलें फिट कर रखी है। एक शुद्ध, दयालु तथा ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित व्यक्ति के लिए समस्त विश्व एक कुटुंब के समान है।  महात्मा गांधी ने कहा था कि कोई-न-कोई दिन ऐसा जरूर आयेगा, जब जगत शांति की खोज करता-करता भारत में आयेगा और भारत समस्त संसार की ज्योति बनेगा। पवित्रता सबसे बड़ा हथियार होता है। पवित्र तथा शुद्ध होने पर व्यक्ति परिवार के लिए, परिवार गांव के लिए, गांव जिले के लिए, जिला प्रांत के लिए, प्रांत राष्ट्र के लिए और राष्ट्र सारे संसार के लिए अपने को कुर्बान करता है।

(3) जब दो बमों के विस्फोट से मानवता कराह उठी!:- 65 वर्ष पूर्व 9 अगस्त, 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के नागासाकी नगर पर फैट मैननाम का प्लूटोनियम बम गिराया था। इसके साथ ही तीन दिन पूर्व 6 अगस्त, 1945 को अमेरिका ने जापान के ही हिरोशिमा शहर पर लिटिल बाँयनाम का यूरेनियम बम का विस्फोट किया था। इन दोनों परमाणु बमों का हिरोशिमा एवं नागासाकी नगर तथा इन दोनों शहरों में रहने वाले लोगों पर पड़ा प्रभाव इस प्रकार रहा:-

  1. हिरोशिमा में गिरे बम के कारण 13 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में तबाही फैल गई थी।
  2. शहर की 60 प्रतिशत से अधिक इमारतें नष्ट हो गई।
  3. एक अनुमान के अनुसार हिरोशिमा की कुल 3 लाख 50 हजार की आबादी में से 1 लाख 40 हजार लोग मारे गए थे।
  4. इनमें सैनिक और वह लोग भी शामिल थे जो बाद में परमाणु विकिरण की वजह से मारे गये। इसके पश्चात् भी बहुत से लोग लंबी बीमारी कैंसर और अपंगता के भी शिकार हुए।
  5. तीन दिनों बाद अमरीका ने नागासाकी शहर पर पहले से भी बड़ा हमला किया, जिसमें लगभग 74 हजार लोग मारे गए थे और इतनी ही संख्या में लोग घायल हुए थे।
  6. नागासाकी शहर के पहाड़ों से घिरे होने के कारण केवल 6.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही तबाही फैल पाई।
  7. इसके अलावा इन दोनों बमों के रेडिएशन के प्रभाव से बाद के वर्षों में भी हजारों बच्चों में कैंसर जैसी बीमारी होती रही और वे असमय काल के ग्रास में समाते रहें।
  8. इन बमों से निकलने वाली विषैली गैसों नेे 18000 किलोमीटर तक के क्षेत्र को अपने प्रभाव में ले लिया था।
  9. इन बमों के प्रभाव से इतनी ऊर्जा पैदा हुई जिससे 20,000 फाॅरेनहाइट डिग्री तक गर्मी पैदा हुई जिससे बिल्डिंग व मकान आदि कागजों की तरह उड़ने लगे।
  10. इन बमों के धुंए की गुबार 18 किमी तक ऊँची उठ गई थी।
  11. इन बमों के प्रभाव से बच्चों व बड़ों की चमड़ी तक गल कर आपस में चिपक गई।

(4) बमों के जोर से नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय कानून से विश्व को कुटुम्ब बनाया जा सकता है:-

एक आंकड़े के अनुसार वर्तमान में विश्व में परमाणु संपन्न देश व उनके द्वारा निर्मित परमाणु बमों की संख्या इस प्रकार हैं:-

  1. यूनाइटेड स्टेट्स    अमेरिका                10,640 परमाणु बम
  2. रूस                            10,000 परमाणु बम
  3. फ्रांस                               464 परमाणु बम
  4. चीन                               420 परमाणु बम
  5. इजरायल                           200 परमाणु बम
  6. यूनाइटेड किडंगम                           200 परमाणु बम
  7. भारत                                95 परमाणु बम
  8. पाकिस्तान                            50 परमाणु बम

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 हमें अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करने की सीख देता है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करना राष्ट्रीय कानून का सम्मान जैसा ही पवित्र कत्र्तव्य है।

(5) अब हिरोशिमा और नागासाकी जैसी घटनाएं दोहराई न जायें!:- नाभिकीय अस्त्र या परमाणु बम एक विस्फोटक युक्ति है जिसकी विध्वंशक शक्ति का आधार नाभिकीय अभिक्रिया होती है। यह नाभिकीय संलयन या नाभिकीय विखण्डन या इन दोनांे प्रकार की नाभिकीय अभिक्रियाओं के सम्मिलन से बनाये जा सकते हैं। दोनो ही प्रकार की अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप थोड़े ही सामग्री से भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है। आज का एक हजार किलो से थोड़ा बड़ा नाभिकीय हथियार इतनी ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है जितनी कई अरब किलो के परम्परागत विस्फोटकों से ही उत्पन्न हो सकती है। नाभिकीय हथियार महाविनाशकारी हथियार कहे जाते हैं। आज की परिस्थितियाँ ऐसी हैं, जिनमें मनुष्य तबाही की ओर जा रहा है। दो महायुद्ध हो चुके हैं और अब तीसरा हुआ तो दुनिया का ठिकाना नहीं रहेगा; क्योंकि वर्तमान में घातक शस्त्र इतने जबरदस्त बने हैं, जो आज दुनिया में कहीं भी चला दिए गए तो एक परमाणु बम पूरी दुनिया को समाप्त कर देने के लिए काफी है। नागासाकी और हिरोशिमा पर तो आज की तुलना में छोटे-छोटे दो बम गिराए गए थे। आज उनकी तुलना में एक लाख गुनी ताकत के बम बनकर तैयार हैं।  

(6) युद्ध में फंसी हुई दुनिया शांति के अमृत की प्यासी है:- वर्तमान में एटम बम के अलावा 22 प्रकार के अन्य बमों का निर्माण विभिन्न देशों के द्वारा किये जा चुके हैं, जो बहुत ज्यादा भयानक एवं खतरनाक हैं। ये बम इतने ज्यादा खतरनाक है जिनके द्वारा पूरे विश्व का खात्मा कई बार किया जा सकता है। युद्ध में फंसी हुई दुनिया शांति के अमृत की प्यासी है। अणुबम ने उन श्रेष्ठतम भावनाओं को मार दिया है, जिन्होंने मानव-जाति को युगों से जीवित रखा है। सर्वनाश का जो खतरा दुनिया के सिर पर झूल रहा है, उससे बचने का इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है कि हृदय की एकता को उसमें समाये हुए सारे भव्य अर्थो के साथ साहसपूर्वक और बिना किसी शर्त के स्वीकार कर लिया जाय। अगर हथियारों के लिए इसी प्रकार की पागलपन भरी प्रतिस्पर्धा जारी रही तो निश्चित रूप से उसका परिणाम ऐसे भयानक मानव-संहार के रूप में आयेगा जैसा कि संसार के इतिहास में इसके पहले कभी नहीं हुआ। अगर कोई विजेता बचा रहा तो जिस राष्ट्र की विजय होगी, उसके लिए वह विजय भी जीवित-मृत्यु जैसी बन जायेगी।

(7) पृथ्वी एक देश है तथा मानव जाति इसके नागरिक है:- हमारा मानना है कि सारे संसार में व्याप्त ग्लोबल वार्मिंग, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद एवं तीसरे विश्व युद्ध की विभीषिका जैसी विषम सामाजिक परिस्थितियों से मुक्ति के लिए संतुलित एवं उद्देश्यपूर्ण शिक्षा को विश्वव्यापी बनाना चाहिए। प्राचीन काल से हमारे चारों वेद वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात सारी वसुधा एक कुटुम्ब के समान हैका सन्देश दे रहे हैं। वसुधैव कुटुम्बकम को सी0एम0एस0 ने 55 वर्ष पूर्व अपनी स्थापना के समय से जय जगतके ध्येय वाक्य के रूप में अपनाया है। बहाउल्लाह ने कहा है कि पृथ्वी एक देश है तथा मानव जाति इसके नागरिक है। धर्म की अज्ञानता को दूर करने के लिए विश्व धर्म की शिक्षा बच्चों को देने की आवश्यकता है। सारे विश्व में इस ज्ञान को फैलाना चाहिए कि ईश्वर एक है, धर्म एक है तथा मानव जाति एक है। हमें पूरा विश्वास है कि शैतानी सभ्यता के स्थान पर आध्यात्मिक सभ्यता स्थापित करने में हम निकट भविष्य में सफल होंगे।

(8) विश्व एकता की शिक्षा की आज सर्वाधिक आवश्यकता है:- हमारा मानना है कि युद्ध के विचार मानव मस्तिष्क में पैदा होते हैं। इसलिए मानव मस्तिष्क में ही शान्ति के विचार डालने होंगे। मनुष्य को विचारवान बनाने की श्रेष्ठ अवस्था बचपन है। इसलिए संसार के प्रत्येक बालक को विश्व एकता एवं विश्व शांति की शिक्षा बचपन से अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए। मानव इतिहास में वह क्षण आ गया है जब शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन लाने का सशक्त माध्यम बनकर विश्व भर में हो रही उथल-पुथल का समाधान विश्व एकता तथा विश्व शान्ति की शिक्षा द्वारा प्रस्तुत करना चाहिए। हमें बाल एवं युवा पीढ़ी को अपने चुने हुए क्षेत्र में वल्र्ड लीडर बनाना है। इसके साथ ही विश्व के सभी देशों का यह नैतिक उत्तरदायित्व है कि वे विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के सुन्दर एवं सुरक्षित भविष्य के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्ति प्रदान कर उसे विश्व संसद के रूप में परिवर्तित करना चाहिए। ग्लोबल विलेज के युग में अब वैश्विक समाज का एक प्रभावशाली विश्व शासन तथा विश्व न्यायालय होना चाहिए तभी वसुधैव कुटुम्बकम् तथा ग्लोबल विलेज की अवधारणा साकार होगी।  

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