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एकादशी माहात्म्य – देवशयनी एकादशी तथा चातुर्मास्य व्रत

एकादशी माहात्म्य

श्रीकृष्ण बोले कि हे राजन्! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को देवशयनी एकादशी भी कहते हैं| चातुर्मास का व्रत इसी एकादशी से प्रारम्भ होता है| युधिष्ठिर बोले – भगवन्! विष्णु के शयन का व्रत किस प्रकार करना चाहिए और चातुर्मास्य के व्रत भी कहिए| श्रीकृष्ण बोले-हे राजन्! अब मैं आपको भगवान् विष्णु के शयन व्रत और चातुर्मास्य व्रत की कथा सुनाता हूँ| आप सावधान होकर सुनिये –

जब सूर्य कर्क राशि में आता है तो भगवान् को शयन कराते हैं और जब तुला राशि में आता है तब भगवान् को जगाते हैं| अधिक मास के आने पर भी यह विधि इसी प्रकार चलती है| इसके सिवाय और महीने में न तो शयन करना चाहिये न जगाना ही चाहिये| आषाढ़ मास की एकादशी का विधिवत् व्रत करना चाहिये| उस दिन विष्णु भगवान् की चतुर्भुजी सोने की मूर्ति बनाकर चातुर्मास्य व्रत के नियम का संकल्प करना चाहिए| भगवान् की मूर्ति को पीताम्बर पहनाकर सुन्दर श्वेत शैया पर शयन करावे और धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान् का षोडशोपचार पूजन करे, पंचामृत से स्नानादि कराकर इस प्रकार कहे – हे हृषिकेश, लक्ष्मी सहित मैं आपका पूजन करता हूँ| आप जब तक चातुर्मास शयन करें मेरे इस व्रत को निर्विघ्न रखें|

इस प्रकार विष्णु भगवान् की स्तुति करके शुद्ध भाव से मनुष्यों को दातुन आदि के नियमों को ग्रहण करना चाहिए| विष्णु भगवान् के व्रत को ग्रहण करने के पाँच काल वर्णन किए हैं| देवशयनी एकादशी से यह व्रत किया जाता है| एकादशी, द्वादशी, पूर्णमासी, अष्टमी और कर्क की संक्रान्ति से व्रत प्रारम्भ किया जाता है तथा कार्तिक शुक्ला द्वादशी को समाप्त कर दिया जाता है| व्रत के करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं| जो मनुष्य प्रति वर्ष इस व्रत को करते हैं वे सूर्य जैसे दीप्तिमान विमान पर बैठकर स्वर्ग को जाते हैं| इस व्रत में गुरु तथा शुक्र की बाल-वृद्धावस्था वर्जित नहीं है| यदि सूर्य धन राशि के अंश में भी आ गया तो यह तिथि पूर्ण समझी जाती है| जो स्त्री या पुरुष पवित्र होकर शुद्धता से इस व्रत को करते हैं वह सब पापों से छूट जाते हैं| बिना संक्रान्ति का मास (मल-मास) देवता और पितृ कर्मों में वर्जित है|

अब इसका अलग-अलग फल कहते हैं| जो मनुष्य प्रतिदिन मन्दिर में झाड़ू देते हैं, जल से धोते हैं, गोबर से लीपते हैं, मन्दिरों में रङ्ग करते हैं उनको सात जन्म तक ब्राह्मण योनि मिलती है| जो मनुष्य चातुर्मास में भगवान् को दूध, दही, घी, शहद और मिसरी आदि से स्नान कराते हैं तथा ब्राह्मणों को भूमि, स्वर्ण आदि दान देते हैं वे वैभवशाली होकर अन्त में स्वर्ग में जाकर इन्द्र सुख भोगते हैं| जो विष्णु भगवान् की सोने की प्रतिमा बनाकर धूप, दीप, नैवेद्य और पुष्प आदि से भगवान् का पूजन करते हैं, वह इन्द्रलोक में जाकर अक्षय सुख भोगते हैं| जो तुलसी से भगवान् का पूजन करते हैं या स्वर्ण की तुलसी ब्राह्मणों को दान देते हैं वे सोने के विमान में बैठकर परम गति को प्राप्त होते हैं| जो मनुष्य भगवान् को गूगल की धूप और दीप अर्पण करते हैं उनको अनेक प्रकार की सम्पत्ति मिलती है और वे जन्म-जन्मान्तर के लिए धनाढ्य हो जाते हैं| जो मनुष्य चातुर्मास में पीपल के वृक्ष तथा भगवान् विष्णु की परिक्रमा करते और पूजा करते हैं उनको विष्णुलोक की प्राप्ति होती है| जो संध्या समय देवताओं तथा ब्राह्मणों को दीप दान करते हैं तथा विष्णु भगवान् का हवन करते हैं वे सुन्दर विमान में बैठकर अप्सराओं से सेवित होते हैं| जो भगवान् का चरणामृत लेते हैं वे सब कष्टों से मुक्त हो जाते हैं| जो नित्यप्रति मन्दिर में तीनों समय 108 बार गायत्री मन्त्र का जप करते हैं, उनसे भी पाप सदैव दूर रहते हैं| जो गायत्री का ध्यान और जप करते हैं उनसे व्यास भगवान् प्रसन्न होते हैं| इसके उद्यापनों में शास्त्र की पुस्तक दान दी जाती है| जो पुराण व धर्म शास्त्र को पढ़ते या सुनते हैं एवं वस्त्र तथा स्वर्ण सहित ब्राह्मणों को दान देते हैं वे दानी, धनी, ज्ञानी और कीर्तिवानं होते हैं| जो मनुष्य विष्णु या शिव का स्मरण करते हैं अथवा उनकी सोने की मूर्ति दान करते हैं, साथ ही यह प्रार्थना करते हैं, “हे शिव! आपने त्रिपुर नामक दैत्य को मारा है, मेरे दोषों को भस्म करके मुझको सद्गुण दीजिये| वह पापों से रहित होकर धनवान, गुणवान हो जाते हैं| जो नित्यकर्म के पश्चात् सूर्य को अर्घ्य देते हैं तथा व्रत की समाप्ति पर स्वर्ण, लाल वस्त्र और गौदान करते हैं वह आरोग्यता, पूर्ण आयु तथा कीर्ति, धन और बल पाते हैं| चातुर्मास में जो मनुष्य गायत्री मंत्र द्वारा तिल से होम करते हैं और समाप्ति पर दान करते हैं उनके समस्त पाप नष्ट होकर नीरोग शरीर मिलता है तथा सुपात्र सन्तान मिलती है| जो मनुष्य अन्न से हवन करते हैं और समाप्त हो जाने पर घी का घूट भर कर वस्त्र सहित दान करते हैं वे ऐश्वर्यशाली होकर ब्रह्मा के समान भोग भोगते हैं और उनके शत्रुओं का नाश होता है| जो पीपल का पूजन करते हैं तथा अन्त में स्वर्ण सहित वस्त्रों का दान करते हैं वे सब पापों से छूटकर भगवान् के भक्त हो जाते हैं और जो मनुष्य तुलसीजी को धारण करते हैं तथा अंत में भगवान् विष्णु के निमित्त ब्राह्मणों को दान करते हैं वे विष्णुलोक को जाते हैं| जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत में भगवान् के शयन के उपरान्त उनके मस्तक पर नित्यप्रति दूर्वा चढ़ाते हैं और अन्त में स्वर्ण की दूर्वा दान करते हैं वे भी वैकुण्ठ लोक को जाते हैं और जो दान करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं कि ‘हे दूर्वे! तुम जिस भाँति इस पृथ्वी पर शाखाओं सहित फैली हुई हो उसी प्रकार मुझे भी अजर-अमर सन्तान दो’| इस प्रकार स्तुति करके सोने की दूर्वा ब्राह्मण को दान कर दे| ऐसा करने वाले मनुष्य सब पापों से छूट जाते हैं और अन्त में उनको स्वर्गलोक की प्राप्ति हो जाती है| जो भगवान् विष्णु और शिव के मन्दिर में जाकर जागरण और शिव गान गाते हैं, वे भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं| जो चातुर्मास्य व्रत में उत्तम ध्वनि वाला घंटा दान करते हैं, उनको यह प्रार्थना करनी चाहिये ‘हे भगवन्! हे जगत्पते!! आप पापों के नाश करने वाले हैं| आप मेरे करने योग्य कर्मों को तथा न करने योग्य पापों के करने से जो पाप उत्पन्न हुए थे उनको नष्ट करिये’| व्रत की समाप्ति पर जो गायों का या एक ही कपिला गौ का दान करते हैं, वस्त्र दान करते हैं अथवा जो नित्यप्रति ब्राह्मणों को नमस्कार करते हैं, वे धनाढ्य होते हैं, उनका जीवन सफल हो जाता है, साथ ही समस्त पापों से छूट जाते हैं| चातुर्मास में जो ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं उनकी आयु तथा लक्ष्मी की वृद्धि होती है| जो मनुष्य स्वर्ण का सूर्य बनाकर ब्राह्मण को दान देते हैं उसका फल सौ यज्ञों के समान होता है| शिवजी के प्रसन्नार्थ चाँदी या ताँबे का दान करते हैं, उनको श्रद्धा से पुत्र की प्राप्ति होती है| जो शहद युक्त चाँदी का बर्तन अथवा ताँबे के पात्र में गुड़ भर कर और शयन होने पर तिल, सोना और जूते का दान करते हैं वे शिव लोक को प्राप्त होते हैं| जो मनुष्य चातुर्मास में ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, अन्न वस्त्र का दान देते हैं तथा समाप्ति पर शैया दान देते हैं वे अक्षय सुख को प्राप्त करके लक्ष्मीवान् होते हैं| जो वर्षा ऋतु में गोपीचन्दन दान करते हैं वे भोग और मोक्ष को प्राप्त होते हैं| जो सूर्य और गणेशजी का पूजन करते हैं, वे उत्तम गति को प्राप्त होते हैं| जो चातुर्मास में भगवान् का हवन करते हैं और शक्कर दान करते हैं साथ ही उद्यापन करते हैं [ उद्यापन की विधि कहते हैं-चार पल या आठ पल वाले ताँबे के पात्र में शक्कर भर कर वस्त्र, फल दक्षिणा सहित पुरोहित को देते हैं उनके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें यशस्वी पुत्र की प्राप्ति होती है|

हे कुन्तीपुत्र! चातुर्मास्य व्रत करने वाला मनुष्य गंधर्व विद्या में निपुण और स्त्रियों का प्रिय होता है| जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत में फल, मूल, शाक आदि का दान देते हैं वे सुखी और राजयोगी होते हैं| जो मनुष्य इस व्रत में प्रतिदिन सोंठ, मिर्च, पीपल, वस्त्र और दक्षिणा सहित दान करते हैं, अन्त में सोने की वोंठ, मिर्च आदि दान करते हैं, वे सौ वर्ष तक जीवित रहकर स्वर्ग में जाते हैं| जो बुद्धिमान ब्राह्मण को मोती का दान करते हैं वे कीर्ति को प्राप्त होते हैं| जो मनुष्य इस व्रत में ताम्बूल दान करते हैं अथवा जितेन्द्रिय होकर पान खाना छोड़ देते हैं और अन्त में लाल वस्त्र का दान देते हैं, वे सौन्दर्यशाली, नीरोग, बुद्धिमान्, भाग्यवान तथा सुन्दर वाणी बोलने वाले बनते हैं| ताम्बूल के दान से देवता प्रसन्न होकर अनन्त धन देते हैं| जो मनुष्य इस व्रत में लक्ष्मीजी और पार्वतीजी को प्रसन्न करने के लिए हल्दी का दान करते और अन्त में चाँदी के पात्र में हल्दी रखकर देते हैं, वे स्त्रियाँ अपने पति के साथ और पति अपनी पत्नियों के साथ सुख भोगते हैं तथा सौभाग्य, अक्षय धन व सुपात्र सन्तान मिलती है, साथ ही वे देवताओं से पूजित होते हैं| जो शिव और पार्वतीजी के प्रसन्नार्थ, ब्राह्मण स्त्री तथा पुरुष का पूजन कर दक्षिणा, वस्त्र और स्वर्ण दान करते हैं और उद्यापन में शिव की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर पान देते हैं, बैल का दान करते हैं तथा मीठा भोजन को कराते हैं उन्हें सम्पत्ति और कीर्ति मिलती वे इस लोक में सुख भोग कर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होते हैं| जो मनुष्य फल का दान करते हैं और अन्त में स्वर्ण देते हैं, उनके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं| और सुपात्र सन्तान उत्पन्न होती है| फलदान से नन्दन वन का फल प्राप्त होता है| जो मनुष्य इस व्रत में पुष्प का दान करते हैं, उन्हें इस लोक में सुख और परलोक में गंधर्व पद मिलता है| जो भगवान् की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन ब्राह्मणों को दही और अन्त में भूमि या स्वर्ण का दान करता है, वह इस लोक में धन-धान्य प्राप्त कर अन्त में विष्णु लोक को जाता है| जो वस्त्र और आभूषणों सहित गौ और बछड़े का दान करते हैं, वे ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्मलोक को जाते हैं और पितरों के साथ अनेक सुखों को भोगते हैं| जो मनुष्य चातुर्मास में प्राजापत्य व्रत करते हैं और उसकी समाप्ति पर गौदानं और ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाते हैं और जो वस्त्रों व बैलों सहित हल का दान करते हैं तथा शाक, मूल और फलों का आहार करते हैं, वे विष्णु लोक को जाते हैं| जो मनुष्य केले के पत्र या पलाश के पत्रों में भोजन करते हैं, कांसे के पात्र और वस्त्र दान करते हैं तथा तेल नहीं खाते, उनके समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं| जो मनुष्य पयोव्रत करते हैं और अन्त में दूध वाली गौ दान देते हैं, वे विष्णुलोक को जाते हैं| चातुर्मास्य व्रत के प्रभाव से ब्रह्मघाती, सुरापान करने, बालघाती, असत्य भाषण करने वाला, स्त्रीघाती, किसी व्रत में विघ्न डालने वाला, अगम्या से गमन करने वाला, विधवा के शील को भंग करने वाला, ब्राह्मणी तथा चांडालिनी के साथ भोग करने वाला, इन सबके पापों को चातुर्मास्य व्रत नष्ट कर देता है|

चातुर्मास्य व्रत के अन्त में चौंसठ पल कांसे का पात्र तथा वस्त्रों और आभूषणों के साथ गौ और बछड़ा दान करना चाहिये| जो मनुष्य भूमि को गोबर से शुद्ध करके भगवान् का स्मरण करते हुए भोजन करते हैं तथा सिंचित भूमि का दान करते हैं, वे धर्मात्मा राजा होते हैं तथा उनके सन्तान भी अच्छी होती है| उनको किसी शत्रु का भय नहीं होता और अन्त में स्वर्गलोक को जाते हैं| बैल का दान करने से षट्स भोजन मिलते हैं| चातुर्मास्य व्रत में जो नित्यप्रति जागरण करते हैं तथा अन्त में ब्राह्मण को भोजन कराते हैं, उन्हें शिवलोक की प्राप्ति होती है| जो एक समय भोजन करते हैं और अन्त में निराहार रहते हैं और भूखे को भाजन कराते हैं, भक्तिपूर्वक भगवान् का पूजन करते हैं, भगवान् के शयन करने पर भूमि पर सोते हैं, जो त मैथुन नहीं करते, वे यशस्वी, लक्ष्मीवान् होकर स्वर्ग में जाते हैं| जो सपरिवार चावल या जौ का भोजन करते हैं और जो तेल नहीं लगाते, अन्त में काँसे या मिट्टी के पात्र में तेल भर कर दान करते हैं अथवा जो शाक नहीं खाते, अन्त में चाँदी के पात्र को वस्त्र में लपेट कर या दस प्रकार के शाकों से भर कर वेदपाठी ब्राह्मण को देते हैं, वे सब शिव लोक में जाकर कीर्ति प्राप्त करते हैं| जो मनुष्य गेहूँ छोड़ने का नियम करते हैं| और व्रत के अन्त में सोने के गेहूँ बनाकर दान देते हैं तथा जो व्रत में इन्द्रियों का दमन करते हैं उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है| जो मनुष्य श्रावण में शाक, भादों में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग करते हैं, वे नीरोग व स्वस्थ रहते हैं| जो मीठा, खट्टा, कड़वा पदार्थ त्याग देते हैं, वे समस्त दुर्गुणों से छूट जाते हैं| जो भगवान् का स्मरण करते हैं तथा जो पुष्प आदि का त्याग कर देते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं| जो चान्द्रायण आदि व्रत करते हैं, जो एकमात्र दूध का ही भोजन करते हैं, वे ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं तथा उनका वंश प्रलय तक रहता है| जिस दिन भगवान् उठते हैं उस दिन वाहाणों को वनों का दान तथा भोजन कराना चाहिये| यह सब दान सुपात्र को देने चाहिये| कुपात्र को दान देने और लेने वाला दोनों ही नरकगामी होते हैं|

|| इस प्रकार देवशयनी एकादशी तथा चातुर्मास्य व्रत की कथा समाप्त हुई ||

फलाहार – इसके व्रत में एक बार भोजन करते हैं और दूध, फलाहार ले सकते हैं|

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