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अध्याय 7

महाभारत संस्कृत - विराटपर्व

1 [वै] अथापरॊ भीमबलः शरिया जवलन्न; उपाययौ सिंहविलास विक्रमः
खजं च दर्वीं च करेण धारयन्न; असिं च कालाङ्गम अकॊशम अव्रणम

2 स सूदरूपः परमेण वर्चसा; रविर यथा लॊकम इमं परभासयन
सुकृष्ण वासा गिरिराजसारवान; स मत्स्यराजं समुपेत्य तस्थिवान

3 तं परेक्ष्य राजा वरयन्न उपागतं; ततॊ ऽबरवीज जानपदान समागतान
सिंहॊन्नतांसॊ ऽयम अतीव रूपवान; परदृश्यते कॊ नु नरर्षभॊ युवा

4 अदृष्टपूर्वः पुरुषॊ रविर यथा; वितर्कयन नास्य लभामि संपदम
तथास्य चित्तं हय अपि संवितर्कयन; नरर्षभस्याद्य न यामि तत्त्वतः

5 ततॊ विराटं समुपेत्य पाण्डवः; सुदीनरूपॊ वचनं महामनाः
उवाच सूदॊ ऽसमि नरेन्द्र बल्लवॊ; भजस्व मां वयञ्जन कारम उत्तमम

6 न सूदतां मानद शरद्दधामि ते; सहस्रनेत्र परतिमॊ हि दृश्यसे
शरिया च रूपेण च विक्रमेण च; परभासि तातानवरॊ नरेष्व इह

7 नरेन्द्र सूदः परिचारकॊ ऽसमि ते; जानामि सूपान परथमेन केवलान
आस्वादिता ये नृपते पुराभवन; युधिष्ठिरेणापि नृपेण सर्वशः

8 बलेन तुल्यश च न विद्यते मया; नियुद्ध शीलश च सदैव पार्थिव
गजैश च सिंहैश च समेयिवान अहं; सदा करिष्यामि तवानघ परियम

9 ददामि ते हन्त वरं महानसे; तथा च कुर्याः कुशलं हि भाषसे
न चैव मन्ये तव कर्म तत समं; समुद्रनेमिं पृथिवीं तवम अर्हसि

10 यथा हि कामस तव तत तथा कृतं; महानसे तवं भव मे पुरस्कृतः
नराश च ये तत्र ममॊचिताः पुरा; भवस्व तेषाम अधिपॊ मया कृतः

11 तथा स भीमॊ विहितॊ महानसे; विराट राज्ञॊ दयितॊ ऽभवद दृढम
उवास राजन न च तं पृथग्जनॊ; बुबॊध तत्रानुचरश च कश चन

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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