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अध्याय 156

महाभारत संस्कृत - उद्योगपर्व

1 [ज] तथा वयूढेष्व अनीकेषु कुरुक्षेत्रे दविजर्षभ
किम अकुर्वन्त कुरवः कालेनाभिप्रचॊदिताः

2 तथा वयूढेष्व अनीकेषु यत तेषु भरतर्षभ
धृतराष्ट्रॊ महाराज संजयं वाक्यम अब्रवीत

3 एहि संजय मे सर्वम आचक्ष्वानवशेषतः
सेनानिवेशे यद्वृत्तं कुरुपाण्डवसेनयॊः

4 दिष्टम एव परं मन्ये पौरुषं चाप्य अनर्थकम
यद अहं जानमानॊ ऽपि युद्धदॊषान कषयॊदयान

5 तथापि निकृतिप्रज्ञं पुत्रं दुर्द्यूत देविनम
न शक्नॊमि नियन्तुं वा कर्तुं वा हितम आत्मनः

6 भवत्य एव हि मे सूत बुद्धिर दॊषानुदर्शिनी
दुर्यॊधनं समासाद्य पुनः सा परिवर्तते

7 एवंगते वै यद भावि तद भविष्यति संजय
कषत्रधर्मः किल रणे तनुत्यागॊ ऽभिपूजितः

8 तवद युक्तॊ ऽयम अनुप्रश्नॊ महाराज यथार्हसि
न तु दुर्यॊधने दॊषम इमम आसक्तुम अर्हसि
शृणुष्वानवशेषेण वदतॊ मम पार्थिव

9 य आत्मनॊ दुश्चरिताद अशुभं पराप्नुयान नरः
एनसा न स दैवं वा कालं वा गन्तुम अर्हति

10 महाराज मनुष्येषु निन्द्यं यः सर्वम आचरेत
स वध्यः सर्वलॊकस्य निन्दितानि समाचरन

11 निकारा मनुजश्रेष्ठ पाण्डवैस तवत्प्रतीक्षया
अनुभूताः सहामात्यैर निकृतैर अधिदेवने

12 हयानां च गजानां च राज्ञां चामिततेजसाम
वैशसं समरे वृत्तं यत तन मे शृणु सर्वशः

13 सथिरॊ भूत्वा महाराज सर्वलॊकक्षयॊदयम
यथा भूतं महायुद्धे शरुत्वा मा विमना भव

14 न हय एव कर्ता पुरुषः कर्मणॊः शुभपापयॊः
अस्वतन्त्रॊ हि पुरुषः कार्यते दारु यन्त्रवत

15 के चिद ईश्वर निर्दिष्टाः के चिद एव यदृच्छया
पूर्वकर्मभिर अप्य अन्ये तरैधम एतद विकृष्यते

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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