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अध्याय 44

महाभारत संस्कृत - शांतिपर्व

1 [वैषम्पायन] ततॊ विसर्जयाम आस सर्वाः परकृतयॊ नृपः
विविशुश चाभ्यनुज्ञाता यथा सवानि गृहाणि च

2 ततॊ युधिष्ठिरॊ राजा भीमं भीमपराक्रमम
सान्त्वयन्न अब्रवीद धीमान अर्जुनं यमजौ तथा

3 शत्रुभिर विविधैः शस्त्रैः कृत्तदेहा महारणे
शरान्ता भवन्तः सुभृशं तापिताः शॊकमन्युभिः

4 अरण्ये दुःखवसतीर मत्कृते पुरुषॊत्तमाः
भवद्भिर अनुभूताश च यथा कु पुरुषैस तथा

5 यथासुखं यथाजॊषं जयॊ ऽयम अनुभूयताम
विश्रान्ताँल लब्धविज्ञानाञ शवः समेतासि वः पुनः

6 ततॊ दुर्यॊधन गृहं परासादैर उपशॊभितम
बहुरत्नसमाकीर्णं दासीदास समाकुलम

7 धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातं भरात्रा दत्तं वृकॊदरः
परतिपेदे महाबाहुर मन्दरं मघवान इव

8 यथा दुर्यॊधन गृहं तथा दुःशासनस्य च
परासादमाला संयुक्तं हेमतॊरण भीषितम

9 दासीदास सुसंपूर्णं परभूतधनधान्यवत
परतिपेदे महाबाहुर अर्जुनॊ राजशासनात

10 दुर्मर्षणस्य भवनं दुःशासन गृहाद वरम
कुबेरभवनप्रख्यं मणिहेमविभूषितम

11 नकुलाय वरार्हाय कर्शिताय महावने
ददौ परीतॊ महाराज धर्मराजॊ युधिष्ठिरः

12 दुर्मुखस्य च वेश्माग्र्यं शरीमत कनकभूषितम
पूर्णं पद्मदलाक्षीणां सत्रीणां शयनसंकुलम

13 परददौ सहदेवाय सततं परियकारिणे
मुमुदे तच च लब्ध्वा स कैलासं धनदॊ यथा

14 युयुत्सुर विदुरश चैव संजयश च महाद्युतिः
सुधर्मा चैव धौम्यश च यथा सवं जग्मुर आलयान

15 सह सात्यकिना शौरिर अर्जुनस्य निवेशनम
विवेश पुरुषव्याघ्रॊ वयाघ्रॊ गिरिगुहाम इव

16 तत्र भक्षान्न पानैस ते समुपेताः सुखॊषिताः
सुखप्रबुद्धा राजानम उपतस्थुर युधिष्ठिरम

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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