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अध्याय 349

महाभारत संस्कृत - शांतिपर्व

1 [भीस्म] स पन्नगपतिस तत्र परययौ बराह्मणं परति
तम एव मनसा धयायन कार्यवत्तां विचारयन

2 तम अभिक्रम्य नागेन्द्रॊ मतिमान स नरेश्वरः
परॊवाच मधुरं वाक्यं परकृत्या धर्मवत्सलः

3 भॊ भॊ कषाम्याभिभासे तवां न रॊषं कर्तुम अर्हसि
इह तवम अभिसंप्राप्तः कस्यार्थे किं परयॊजनम

4 आभिमुख्याद अभिक्रम्य सनेहात पृच्छामि ते दविज
विविक्ते गॊमतीतीरे किं वा तवं पर्युपाससे

5 [बराह्मन] धर्मारण्यं हि मां विद्धि नागं दरष्टुम इहागतम
पद्मनाभं दविजश्रेष्ठं तत्र मे कार्यम आहितम

6 तस्य चाहम असांनिध्यं शरुतवान अस्मि तं गतम
सवजनं तं परतीक्षामि पर्जन्यम इव कर्षकः

7 तस्य चाक्लेश करणं सवस्ति कारसमाहितम
वर्तयाम्य अयुतं बरह्मयॊगयुक्तॊ निरामयः

8 [नाग] अहॊ कल्यान वृत्तस तवं साधु सज जनवत्सलः
शरवाध्यस तवं महाभाग परं सनेहेन पश्यसि

9 अहं स नागविप्रर्षे यथा मां विन्दते भवान
आज्ञापय यथा सवैरं किं करॊमि परियं तव

10 भवन्तं सवजनाद अस्मि संप्राप्तं शरुतवान इह
अतस तवां सवयम एवाहं दरष्टुम अभ्यागतॊ दविज

11 संप्राप्तश च भवान अद्य कृतार्थः परतियास्यति
विस्रब्धॊ मां दविजश्रेष्ठ विषये यॊक्तुम अर्हसि

12 वयं हि भवता सर्वे गुणक्रीता विशेषतः
यस तवम आत्महितं तयक्त्वा माम एवेहानुरुध्यसे

13 [बराह्मन] आगतॊ ऽहं महाभाग तव दर्शनलालसः
कं चिद अर्थम अनर्थज्ञः परस्तु कामॊ भुजंगम

14 अहम आत्मानम आत्मस्थॊ मार्गमाणॊ ऽऽतमनॊ हितम
वासार्थिनं महाप्राज्ञ बलवन्तम उपास्मि ह

15 परकाशितस तवं सवगुणैर यशॊ गर्भगभस्तिभिः
शशाङ्ककरसंस्पर्शैर हृद्यैर आत्मप्रकाशितैः

16 तस्य मे परश्नम उत्पन्नं छिन्धि तवम अनिलाशन
पश्चात कार्यं वदिष्यामि शरॊतुम अर्हति मे भवान

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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