🙏 जीवन में कुछ पाना है तो झुकना होगा, कुएं में उतरने वाली बाल्टी झुकती है, तब ही पानी लेकर आती है| 🙏

अध्याय 56

महाभारत संस्कृत - सभापर्व

1 [वि] दयूतं मूलं कलहस्यानुपाति; मिथॊ भेदाय महते वा रणाय
यद आस्थितॊ ऽयं धृतराष्ट्रस्य पुत्रॊ; दुर्यॊधनः सृजते वैरम उग्रम

2 परातिपीयाः शांतनवा भैमसेनाः स बाह्लिकाः
दुर्यॊधनापराधेन कृच्छ्रं पराप्स्यन्ति सर्वशः

3 दुर्यॊधनॊ मदेनैव कषेमं राष्ट्राद अपॊहति
विषाणं गौर इव मदात सवयम आरुजते बलात

4 यश चित्तम अन्वेति परस्य राजन; वीरः कविः सवाम अतिपत्य दृष्टिम
नावं समुद्र इव बाल नेत्राम; आरुह्य घॊरे वयसने निमज्जेत

5 दुर्यॊधनॊ गलहते पाण्डवेन; परियायसे तवं जयतीति तच च
अतिनर्माज जायते संप्रहारॊ; यतॊ विनाशः समुपैति पुंसाम

6 आकर्षस ते ऽवाक्फलः कु परणीतॊ; हृदि परौढॊ मन्त्रपदः समाधिः
युधिष्ठिरेण सफलः संस्तवॊ ऽसतु; साम्नः सुरिक्तॊ ऽरिमतेः सुधन्वा

7 परातिपीयाः शांतनवाश च राजन; काव्यां वाचं शृणुत मात्यगाद वः
वैश्वानरं परज्वलितं सुघॊरम; अयुद्धेन परशमयतॊत्पतन्तम

8 यदा मन्युं पाण्डवॊ ऽजातशत्रुर; न संयच्छेद अक्षमयाभिभूतः
वृकॊदरः सव्यसाची यमौ च; कॊ ऽतर दवीपः सयात तुमुले वस तदानीम

9 महाराज परभवस तवं धनानां; पुरा दयूतान मनसा यावद इच्छेः
बहु वित्तं पाण्डवांश चेज जयेस तवं; किं तेन सयाद वसु विन्देह पार्थान

10 जानीमहे देवितं सौबलस्य; वेद दयूते निकृतिं पार्वतीयः
यतः पराप्तः शकुनिस तत्र यातु; माया यॊधी भारत पार्वतीयः

NO COMMENTS

LEAVE A COMMENT

🙏 ♻ प्रयास करें कि जब हम आये थे उसकी तुलना में पृथ्वी को एक बेहतर स्थान के रूप में छोड़ कर जाएं। सागर में हर एक बूँद मायने रखती है। ♻ 🙏