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अध्याय 25

महाभारत संस्कृत - सभापर्व

1 [व] स शवेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य भारत
देशं किं पुरुषावासं दरुमपुत्रेण रक्षितम

2 महता संनिपातेन कषत्रियान्तकरेण ह
वयजयत पाण्डवश्रेष्ठः करे चैव नयवेशयत

3 तं जित्वा हाटकं नाम देशं गुह्यक रक्षितम
पाकशासनिर अव्यग्रः सह सैन्यः समासदत

4 तांस तु सान्त्वेन निर्जित्य मानसं सर उत्तमम
ऋषिकुल्याश च ताः सर्वा ददर्श कुरुनन्दनः

5 सरॊ मानसम आसाद्य हाटकान अभितः परभुः
गन्धर्वरक्षितं देशं वयजयत पाण्डवस ततः

6 तत्र तित्तिरि कल्माषान मण्डूकाक्षान हयॊत्तमान
लेभे स करम अत्यन्तं गन्धर्वनगरात तदा

7 उत्तरं हरिवर्षं तु समासाद्य स पाण्डवः
इयेष जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनः

8 तत एनं महाकाया महावीर्या महाबलाः
दवारपालाः समासाद्य हृष्टा वचनम अब्रुवन

9 पार्थ नेदं तवया शक्यं पुरं जेतुं कथं चन
उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तम इदम अच्युत

10 इदं पुरं यः परविशेद धरुवं स न भवेन नरः
परीयामहे तवया वीर पर्याप्तॊ विजयस तव

11 न चापि किं चिज जेतव्यम अर्जुनात्र परदृश्यते
उत्तराः कुरवॊ हय एते नात्र युद्धं परवर्तते

12 परविष्टश चापि कौन्तेय नेह दरक्ष्यसि किं चन
न हि मानुषदेहेन शक्यम अत्राभिवीक्षितुम

13 अथेह पुरुषव्याघ्र किं चिद अन्यच चिकीर्षसि
तद बरवीहि करिष्यामॊ वचनात तव भारत

14 ततस तान अब्रवीद राजन्न अर्जुनः पाकशासनिः
पार्थिवत्वं चिकीर्षामि धर्मराजस्य धीमतः

15 न परवेक्ष्यामि वॊ देशं बाध्यत्वं यदि मानुषैः
युधिष्ठिराय तत किं चित करवन नः परदीयताम

16 ततॊ दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्य आभरणानि च
मॊकाजिनानि दिव्यानि तस्मै ते परददुः करम

17 एवं स पुरुषव्याघ्रॊ विजिग्ये दिशम उत्तराम
संग्रामान सुबहून कृत्वा कषत्रियैर दस्युभिस तथा

18 स विनिर्जित्य राज्ञस तान करे च विनिवेश्य ह
धनान्य आधाय सर्वेभ्यॊ रत्नानि विविधानि च

19 हयांस तित्तिरि कल्माषाञ शुकपत्रनिभान अपि
मयूरसदृशांश चान्यान सर्वान अनिलरंहसः

20 वृतः सुमहता राजन बलेन चतुरङ्गिणा
आजगाम पुनर वीरः शक्र परस्थं पुरॊत्तमम

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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