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अध्याय 40

महाभारत संस्कृत - आश्वमेधिकपर्व

1 [बर] अव्यक्तात पूर्वम उत्पन्नॊ महान आत्मा महामतिः
आदिर गुणानां सर्वेषां परथमः सर्ग उच्यते

2 महान आत्मा मतिर विष्णुर विश्वः शम्भुश च वीर्यवान
बुद्धिः परज्ञॊपलब्धिश च तथा खयातिर धृतिः समृतिः

3 पर्याय वाचकैः शब्दैर महान आत्मा विभाव्यते
तं जानन बराह्मणॊ विद्वान न परमॊहं निगच्छति

4 सर्वतः पाणिपादश च सर्वतॊ ऽकषिशिरॊमुखः
सर्वतः शरुतिमाँल लॊके सर्वं वयाप्य स तिष्ठति

5 महाप्रभार्चिः पुरुषः सर्वस्य हृदि निश्रितः
अणिमा लघिमा पराप्तिर ईशानॊ जयॊतिर अव्ययः

6 तत्र बुद्धिमतां लॊकाः संन्यासनिरताश च ये
धयानिनॊ नित्ययॊगाश च सत्यसंधा जितेन्द्रियाः

7 जञानवन्तश च ये के चिद अलुब्धा जितमन्यवः
परसन्नमनसॊ धीरा निर्ममा निरहंकृताः
विमुक्ताः सर्व एवैते महत्त्वम उपयान्ति वै

8 आत्मनॊ महतॊ वेद यः पुण्यां गतिम उत्तमाम
स धीरः सर्वलॊकेषु न मॊहम अधिगच्छति
विष्णुर एवादि सर्गेषु सवयम्भूर भवति परभुः

9 एवं हि यॊ वेद गुहा शयं परभुं; नरः पुराणं पुरुषं विश्वरूपम
हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं; स बुद्धिमान बुद्धिम अतीत्य तिष्ठति

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