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अध्याय 47

महाभारत संस्कृत - आरण्यकपर्व

1 [ज] यद इदं शॊचितं राज्ञा धृतराष्ट्रेण वै मुने
परव्राज्य पाण्डवान वीरान सर्वम एतन निरर्थकम

2 कथं हि राजा पुत्रं सवम उपेक्षेताल्प चेतसम
दुर्यॊधनं पाण्डुपुत्रान कॊपयानं महारथान

3 किम आसीत पाण्डुपुत्राणां वने भॊजनम उच्यताम
वानेयम अथ वा कृष्टम एतद आख्यातु मे भवान

4 [वै] वानेयं च मृगांश चैव शुद्धैर बाणैर निपातितान
बराह्मणानां निवेद्याग्रम अभुञ्जन पुरुषर्षभाः

5 तांस तु शूरान महेष्वासांस तदा निवसतॊ वने
अन्वयुर बराह्मणा राजन साग्नयॊ ऽनङ्गयस तथा

6 बराह्मणानां सहस्राणि सनातकानां महात्मनाम
दश मॊक्षविदां तद्वद यान बिभर्ति युधिष्ठिरः

7 रुरून कृष्णमृगांश चैव मेध्यांश चान्यान वनेचरान
बाणैर उन्मथ्य विधिवद बराह्मणेभ्यॊ नयवेदयत

8 न तत्र कश चिद दुर्वर्णॊ वयाधितॊ वाप्य अदृश्यत
कृशॊ वा दुर्बलॊ वापि दीनॊ भीतॊ ऽपि वा नरः

9 पुत्रान इव परियाञ जञातीन भरातॄन इव सहॊदरान
पुपॊष कौरवश्रेष्ठॊ धर्मराजॊ युधिष्ठिरः

10 पतींश च दरौपदी सर्वान दविजांश चैव यशस्विनी
मातेव भॊजयित्वाग्रे शिष्टम आहारयत तदा

11 पराचीं राजा दक्षिणां भीमसेनॊ; यमौ परतीचीम अथ वाप्य उदीचीम
धनुर्धरा मांसहेतॊर मृगाणां; कषयं चक्रुर नित्यम एवॊपगम्य

12 तथा तेषां वसतां काम्यके वै; विहीनानाम अर्जुनेनॊत्सुकानाम
पञ्चैव वर्षाणि तदा वयतीयुर; अधीयतां जपतां जुह्वतां च

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