भक्त सधना जी (Bhagat Sadhna Ji)

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मानव जीवन में सदा परिवर्तन आता रहता है| वह परिवर्तन किसी न किसी घटना पर होता है और जीवन को बदल कर रख देता है| भक्त सधना कसाई था लेकिन प्रभु भक्त बन गया| आपकी कथा श्रवण कीजिए|

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भक्त सधना जी के माता-पिता के नाम का पता कहीं नहीं मिलता| कर्म कसाई का था| आपका जन्म नगर सेवान (हैदराबाद, सिंध) में हुआ और उसी नगर में ही वास रहा| सधना जी को बचपन से ही सन्तों-फकीरों एवं महापुरुषों के पास बैठकर ज्ञान चर्चा सुनने की श्रद्धा थी| आप मूर्ति पूजक थे| इनको कहीं से सालगराम का पत्थर मिल गया था, जिसे मांस तोलने के लिए भार बना लिया| जिसे लोग बुरा मानते लेकिन लोगों को इस बात का पता नहीं था कि साधना जी सालगराम को देवता मानकर पूजते और उसके सहारे ही वह अपना मांस बेचने का कामकाज करते थे| सधना जी सालगराम से लाभ ही प्राप्त करते और वह उनके जीवन का सहारा था|

हिन्दू पंडित एवं संतों में बड़ी चर्चा हो रही थी कि सधना कसाई सालगराम से मांस क्यों तोलता है? एक दिन एक संत सधना जी की दुकान पर आया और विनती की कि 'हे सधने! यह काला पत्थर मुझे दे दो, मैं इसकी पूजा-अर्चना किया करूंगा| यह सालगराम है, तुम कोई अन्य पत्थर रख लो| यह तुम्हारे लिए भार तोलने के कार्य योग्य है|'

सधना जान गया कि यह सन्त सालगराम ले जाना चाहता है| सधना ने बिना झिझक सालगराम उठा कर सन्त को पकड़ा दिया| वह सालगराम लेकर अपने डेरे को चला गया| डेरे पहुंच कर उसने सालगराम को स्नान करवाया और धूप-दीप जलाकर चंदन का तिलक लगाया तथा पुष्प भेंट किए| सन्त ने पूजा की और रात होने पर सो गया| जब साधू सोया हुआ था, तब उसे एक स्वप्न में सालगराम ने कहा - "तुम ने यह बहुत बुरा किया है, सधने के पास मैं बहुत खुश था क्योंकि वह हृदय से प्रेम एवं मेरी पूजा करता था, सच्ची श्रद्धा के साथ वह मेरा हो चुका था| वह मुझ से अटूट प्रेम करता है, मैं पूजा एवं सत्कार का भूखा नहीं, अपितु प्रेम का भूखा हूं, सधना मांस तोलते हुए भी मुझे याद करता था, मुझे उसके पास छोड़ आओ|"

यह वचन सुनकर संत की नींद खुल गई| वह सोचता हुआ और अपने किए कर्म पर पछताता रहा| जब दिन उदय हुआ तो संत सधने के पास वापिस गया| उसने सधने को कहा-'सधना जी! अपना सालगराम वापिस ले लो| यह आपके पास ही ठीक है| आप धन्य हो, जिसे परमेश्वर याद करता है|

'क्यों संत जी?' सधने ने पूछा तो संत ने उसको रात के सपने की सारी बात कह सुनाई| यह बात सुन कर सधना के मन में और ज्यादा चाव तथा प्रेम उत्पन्न हो गया| वह प्रभु भक्ति करने लग गया| भक्त सधना उसी सालगराम के साथ मांस तोलता और उसकी पूजा-अर्चना करता| मन में सदा प्रभु का सुमिरन करता रहता|

भक्त सधना का मांस बेचने का कार्य छोड़ना

एक दिन की बात है, रात के समय एक साहूकार सधना जी के पास बकरे का मांस लेने के लिए आ गया| सधना ने बताया कि इस समय मांस नहीं है, क्योंकि जो बकरा बनाया था, वह समाप्त हो गया है| साहूकार स्नेही व्यक्ति था, जिस कारण सधना उसे मोड़ भी नहीं सकता था| इसलिए सधने ने जीवित बकरे के 'कोफ्ते' काटकर साहूकार को देने चाहे| जब सधना छुरी पकड़कर बकरे के निकट गया तो बकरा हंस पड़ा| हंस कर करहने लगा, 'हे सधना! जगत से बाहरी करने लगे हो|' यह सुनकर सधना जी बहुत हैरान हुए कि यह जानवर बोल रहा है| उसी समय सधने के हाथ से छुरी भूमि पर गिर गई| सधने ने बकरे से पूछा-'हे बकरे! यह बताओ मैं क्या नया खेल रचने लगा हूं| मेरा कर्म है तुझे मार कर बेचना|'

बकरा बोला, 'सुनो! पहले यह सिलसिला चला आ रहा है कि कभी मैं बकरा और तुम कसाई और कभी मैं कसाई और तुम बकरा| इस जन्म में तुम मेरे शरीर का एक अंग साहूकार को काटकर देने लगे हो| यह नया खेल है| कल को मैं भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करूंगा क्योंकि हम कर्म के एक दूसरे के साथी हैं| यह अपना धर्म बन चुका है| एक-दूसरे का मांस काटकर बेचना|'

बकरे के बात ने सधने को एक नया ज्ञान करवा दिया| उस दिन से सधना ने साहूकार को स्पष्ट जवाब दे दिया और अगली सुबह मांस बेचने का अन्धा छोड़ दिया| वह प्रभु भजन करने लगा|

 

हत्या का आरोप लगना 

भक्त सधना जी को जब पूर्ण ज्ञान हो गया कि प्रभु का नाम जपने में ही भला है तो वह पुरुषोतम जी के दर्शनों के लिए जगन्नाथ पुरी की यात्रा के लिए सिंध में से चल पड़ा| जगन्नाथ पुरी शहर पहुंचने से एक पड़ाव समीप ही उसको रात हो गई| उसने सोचा कि किसी गृहस्थी के घर से भोजन मांग कर खा लूं और रात्रि कहीं बिता दूं और फिर आगे चलेगा| यह सोचकर एक घर के द्वार के आगे खड़े होकर उसने आवाज़ दी| उस घर में दो ही सदस्य रहते थे| नारी की आयु लगभग २०-२२ साल थी| वह बड़ी सुन्दर एवं नवयौवना थी लेकिन उसका पति कुरुप और रोगी था| उस सुन्दरी ने जब सधना जी को देखा तो आगे बुला लिया| वह बड़ी नम्रता एवं प्रेम भरे शब्दों में बोली, 'अन्दर आइए! गृह पवित्र करें, धन्य भाग्य हमारे जो आप पधारे हो| ईश्वर आए हो| भोजन लीजिए, बिस्तरा और चारपाई पर आराम करें| मैं सेवा करती हूं|'

उसकी यह श्रद्धा देखकर सधना जी उसके आंगन में पहुंच गए और चारपाई पर बैठ गए| उस सुन्दर स्त्री ने बड़े चाव और श्रद्धा के साथ भोजन तैयार किया| भोजन तैयार करके सधना जी के चरण धुलाए और चौंतरे में बिठा कर भोजन खिलाया| जितनी देर सधना जी भोजन करते रहे, उतनी देर वह स्त्री पंखा झलती रही| उसी तरह जैसे पति को एक पत्नी पंखा झलती है| साथ-साथ वह प्रेम भरी मीठी-मीठी बातों से पूछती रही कि सधना जी किधर से आए हो और कहां जा रहे हैं तथा क्यों साधू बने हैं|

जब सधना ने भोजन कर लिया तो उस सुन्दरी ने एक अच्छा बिस्तर बिछा कर रात काटने के लिए सधना से विनती की| सधना ने उस स्त्री की विनती स्वीकार कर ली| प्रभु नाम का सिमरन करता हुआ भक्त सो गया| जब आधी रात का समय हुआ तो वह सुन्दर नवयुवती श्रृंगार करके सधना जी की चारपाई पर आ गई| उसके हृदय में कामवासना थी| वासना ने उसके रक्त को उबाल दिया| वह वासना में अन्धी हो गई थी| उसका यह पागलों वाला व्यवहार देखकर सधना जी ने कहा, 'बहन! आप मेरे पास से जाइए| प्रत्येक स्त्री को पतिव्रता रहना चाहिए| मैं तो पहले ही पापों के कारण दर-दर भटक रहा हूं, मुझ्र और पापों का भागी मत बनाओ| जाओ! आप मेरी बहन हैं|'

उस स्त्री की विपरीत बुद्धि वासना के मंद कारण उसने उल्टा ही सोचा था| उसने ख्याल किया कि शायद संत उसके पति से डरता है| वह वापिस लौट गई और दस मिनट के पश्चात अपने पति का सिर काट कर सधना जी के पास ले आई| सधना जी को अपने पति का कटा सिर दिखलाकर बोली, 'हे प्रियतम! यदि तुम्हें मेरे पति का भय था तो यह लो उसका सिर, मैं उसको अपना पति नहीं मानती थी, मेरे माता-पिता ने जबरदस्ती मेरा विवाह कर दिया| वह निकम्मा और रोगी था, इसको मरना ही चाहिए था| अब मैं आपको अपना पति मानती हूं| मुझे अपना बनाकर मुझसे प्रेम कीजिए| मेरे यौवन के नशे को लूटो| छोड़ें, शर्म-हया तथा सारी झिझकें, मैं आपके साथ संतनी होकर फिरूंगी| जीवन में भोग विलास ही तो सब कुछ है|'

सधना जी उसकी सारी बातें सुनते रहे| जब उसने मन में सारी बकवास कर ली तो क्रोधित होकर बोले, 'चंडालन! पापिन! तुम ने महापाप किया है| इस पाप के फलस्वरूप तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा| मैं पाप करने के लिए तैयार नहीं| मैं तेरे घर से अभी जा रहा हूं| तुम विष की गंदल हो! नागिन हो! जिसने अपने पति का खून कर दिया वह पराए मर्द से कैसे प्यार करेगी| धिक्कार है, ऐसे प्यार को जिसके डंक का कोई ईलाज नहीं| सधना जी आपे से बाहर हो गए|

वह इतना कहते हुए उठने लगे तो यह देखकर वह महां पापिन हत्यारिन चिल्ला उठी, 'अरे मेरे पति को मार कर मेरे साथ कुकर्म करना चाहता है| तुम सन्त नहीं, हत्यारे हो| लोगों! मैं लूट गई, अरे! भागो! मेरे प्यारे पति की सन्त ने हत्या कर दी है| पकड़ो दौड़ने लगा है| उस पापिन का यह शोर देखकर सधना जी हैरान अवश्य हुए, पर घबराए नहीं| उन्होंने सोचा कि देखा जाएगा, ईश्वर क्या करता है? शायद मेरे किसी पाप का फल मिलना रह गया है, जो मैं इस पापिन के घर रात काटने के लिए रुक गया| यह सब प्रभु की लीला है|

उस स्त्री का शोर सुनकर लोग इकट्ठा हो गए| उसकी बात सुनकर उन्होंने सधना जी को घेर लिया और पकड़कर हाकिम के पास पेश किया| हाकिम भी ऐसा था कि उसने तुरंत सधना जी के हाथ काट देने का हुक्म दे दिया| उस समय सधना जी ने प्रभु के आगे प्रार्थना की -

 

न्रिप कंनिया के कारनै इकु भइआ भेखधारी||
कामारथी सुआरथी वा की पैज सवारी||१||
तव गुन कहा जगत गुरा जउ करमु न नासै||
सिंघ सरन कत जाईऐ जउ जंबुकु ग्रासे ||१|| रहाउ||
एक बूंद जल कारने चात्रिकु दुखु पावै||
प्रान गए सागरु मिलै फुनि कामि न आवै||२||
प्रान जु थाके थिरु नही कैसे बिरमावउ||
बूडि मूए नउका मिलै कहु काहि चढ़ावउ||३||
मै नाही कछु हउ नही किछु आहि न मोरा||
अउसर लजा राखि लेहु सधना जनु तोरा||४|| 



भाव-हे ईश्वर! राजकन्या के साथ विवाह रचाने के लिए एक बढ़ई ने विष्णु का रूप धारण कर लिया था| वह कथा इस प्रकार थी कि एक राजकन्या ने प्रण किया कि वह भगवान विष्णु के अलावा किसी से विवाह नहीं करेगी| एक बढ़ई ने किसी तपोबल द्वारा विष्णु रूप तो धारण कर लिया लेकिन उसके पास भगवान विष्णु जी वाली शक्ति नहीं थी| लेकिन आवश्यकता पड़ने पर उसने प्रार्थना की तो उसके पास शक्ति आ गई|

हे प्रभु! उस कामुक एवं खुदगर्ज इन्सान की भी लाज रख ली, मेरी इज्जत क्यों नहीं बचाते! हे जगत पालक! हे भगवान! तुम्हारी क्या प्रशंसा है कि तुम्हारी कृपा से मेरे कर्म न नाश हो| उस मनुष्य शेर को अपना गुरु क्यों मानना है, यदि गीदड़ों ने ही घेर कर रखना है| जल की एक बूंद के बदले पपीहा कूकता है| यदि वह प्यासा ही मर जाए, मृत को समुद्र में फैंक दिया जाए तो उसका क्या लाभ है? प्रभु मेरे नैन प्राण काम नहीं करते| हृदय धड़क रहा है| मैं इनको कैसे सहारा दूं? हे प्रभु! डूब गए पुरुष के लिए नाव किस काम? मैं तेरा हूं| इस समय मेरी लाज रखो| मेरे पिछले कर्मों को क्षमा कर दें| हे दाता! दया कीजिए|

हाकिम का हुक्म और लोगों के शोर मचाने पर भक्त सधना जी को हत्यारा मान लिया गया और उसके हाथ काट देने का हुक्म हाकिम ने वापिस न लिया| सधना के हाथ काट दिए गए| हाथ काटे गए तो परमात्मा ने हाकिम को बताया कि असली कातिल सधना नहीं अपितु एक नारी है|

एक पड़ोसन जिसने सारा तमाशा देखा था, उसको परमात्मा ने प्रेरणा दी और वह शोर मचाने लगी कि संत को बिना किसी दोष के सज़ा दे दी गई| यह कत्ल तो चंचल नारी ने आप किया है| असली कातिल यही है| यह सुनकर लोग उसको पकड़कर ले गए और हाकिम के आगे पेश किया| हाकिम ने उस स्त्री को धरती में दफना कर मरवा दिया| भक्त सधना जी बिना हाथों के अपंग घूमते रहे और प्रभु की भक्ति में लिवलीन रहे| प्रभु की अनुकंपा से सारी रिद्धियां-सिद्धियां प्राप्त हुईं| आपकी समाधि सरहंद नगर में है|

 

सत्ता और बलवंड

सत्ता और बलवंड दोनों सगे भाई थे| वह भाट जाति से थे और पांचवें पातशाह श्री गुरु अर्जुन देव जी के समय उनकी हजूरी में कीर्तन किया करते थे| रागों में निपुण होने के कारण वह अच्छे रबाबी बन गए| उनकी चारों तरफ कीर्ति थी और गुरु घर में उनको अच्छा मान-सम्मान प्राप्त था| उनका कीर्तन सुनकर सारी संगत का समां बंध जाता था| सत्ता की लड़की जवान हुई तो उसका विवाह करने का निर्णय किया गया| गुरु घर के रबाबी होने के कारण उन्होंने सलाह की कि लड़की का विवाह बड़ी धूमधाम के साथ किया जाएगा लेकिन सत्ता और बलवंड के पास इतना धन नहीं था कि जो अच्छा दहेज दे सकें और आए मेहमानों एवं बारातियों को अच्छा से अच्छा भोजन खिला सकें| सत्ता ने अपने भाई बलवंड से सलाह करके मन में सोचा कि वह सतिगुरु जी के आगे प्रार्थना करेंगे कि सतिगुरु जी एक दिन की सारी भेंट उन्हें देने की कृपा करें, वह भेंट अधिक होगी तथा उनके सारे कार्य संवर जाएंगे|

यह सोचकर दोनों भाई सतिगुरु जी के पास गए और विनती की, 'महाराज! हमारी लड़की का विवाह है लेकिन विवाह का खर्च पूरा करने के लिए हमारे पास कुछ नहीं, इसलिए आप जी कृपा करके आज की सारी भेंट हमें देकर मेहर करें|'

रबाबियों की यह बात सुनकर सतिगुरु जी मुस्करा दिए और वचन किया, 'राय कन्या की शादी की चिन्ता न करो| गुरु घर में कीर्तनीए होने के कारण आपको कोई कमी नहीं आएगी| आवश्यकता अनुसार आपको धन मिल जाएगा|

लेकिन सत्ता और बलवंड सतिगुरु जी के वचनों का भावार्थ न समझ सके, उनके मन में लालच आ गया था| सतिगुरु जी उनके मन की बदली हुई दशा को जान गए थे| इसलिए गुरु जी अहंकार की अग्नि से उन दोनों को बचाना चाहते थे| लेकिन रबाबी अहंकार से न बच सके और उन्होंने अपनी जिद्द न छोड़ी| अन्त में सतिगुरु जी ने वचन किया, 'ठीक है, जो भेंट कल संगत चढ़ाएगी आप ले जाना और उससे अपनी पुत्री की शादी कर लेना|'

प्रात:काल सत्ता और बलवंड ने कीर्तन करना शुरू किया लेकिन उनकी वृति कीर्तन की तरफ से उखड़कर भेंट की ओर लग गई| कीर्तन के समय जो भी सिक्ख या गुरु घर का श्रद्धालु आकार नमस्कार करता तो दोनों भाइयों की निगाह उसके चढ़ावे की तरफ लग जाती| इस तरह कीर्तन में रस न रहा, ताल की एकसुरता टूट गई और लै कांपने लगी| गुरुबाणी में भी कई भूलें होने लगीं तथा बेरसी छा गई|

उनके कीर्तन की बेरसी और संगत के कम आने के कारण ऐसा सबब बना कि एक सौ रूपए से अधिक चढ़ावा भेंट न हुआ| भेंट कम देखकर दोनों भाइयों के सिर में पानी फिर गया|

वह कुछ गुस्से और हैरानी के साथ बोले, 'महाराज! संगत की ओर से भेंटे बहुत कम चढ़ाई गई हैं, इसलिए हमारी और सहायता कीजिए, इतने से शादी नहीं हो सकती|

यह सुनकर पांचवें पातशाह मुस्कराए और वचन किया, 'भाई आप ने चढ़ावे का फैसला किया था| इसलिए चढ़ावा ले जाओ| कन्या की किस्मत में जो कुछ होगा, वह उसको मिल जाएगा| लड़की की चिन्ता न करो पर अपना वचन निभाओ|'

उस समय दोनों भाइयों की बुद्धि भ्रष्ट हो गई तथा उनको किसी बात की समझ ही नहीं आई| मन में अहंकार था कि वह कीर्तनीए हैं, यदि कीर्तन न करेंगे तो गुरु का दरबार कैसे लगेगा? सतिगुरु महाराज जी की शक्ति का अनुभव भी भूल गया और अहंकार करके बैठने का फैसला कर लिया|

अगली सुबह 'आसा की वार' का कीर्तन होना था लेकिन दोनों ही रबाबी हाजिर न हुए और घर में पलंग पर लेटे रहे| दरबार में संगत इंतजार करने लगी| सतिगुरु जी भी अपने नियम अनुसार दरबार में उपस्थित हुए और सिंघासन पर विराजमान हो गए| गुरु जी ने रबाबियों को दरबार में अनुपस्थित देखकर एक सिक्ख को कहा कि वह उन दोनों को बुला कर लाए| श्रद्धालु सिक्ख दौड़ कर गया| उसने दोनों भाइयों सत्ता और बलवंड को जाकर कहा, 'श्रीमान जी! सच्चे पातशाह आपको याद कर रहे हैं, आप चलकर कीर्तन करो|'

यह सुनकर सत्ते के तनबदन में आग लग गई और पागलों की तरह गुस्से से बोला, 'हमने कोई कीर्तन नहीं करने जाना| यदि हमने चढ़ावे के लिए कहा तो मसंदों द्वारा चढ़ावा रोक दिया गया| हमारे साथ भेदभाव किया गया है| इसलिए आज से हम गुरु घर में कीर्तन नहीं करेंगे| किसी और सोढी या बेदी के आगे कीर्तन करके उसको गुरु बना सकते हैं| गुरु बनाना या न बनाना हमारे वश में है| 

यह उत्तर सुनकर सिक्ख वापिस लौट आया और उसने सारी बात सतिगुरु महाराज जी के आगे व्यक्त कर दी|

दया एवं विनय के सागर सच्चे पातशाह नाराज न हुए अपितु भाई गुरदास जी को यह कह कर भेजा कि वह रागियों को सत्कार सहित दरबार में ले आएं| उनकी कन्या का विवाह उसी तरह धूमधाम से हो जाएगा, जैसा वह चाहते हैं|

भाई गुरदास जी सत्ता और बलवंड के घर पहुंचे| उन्होंने बड़ी नम्रता से दोनों को समझाने का प्रयास किया लेकिन रबाबियों का गुस्सा शांत न हुआ| भाई बलवंड ने बड़े गुस्से और मूर्खता के साथ यह जवाब दिया, 'जाओ आप कीर्तन कर लो| गुरु यदि इतनी शक्ति रखते हैं तो वह आप ही कीर्तन करें| हम आगे से गुरु दरबार में कीर्तन नहीं करेंगे|' भाई गुरदास जी ने फिर भी इसका गुस्सा न किया अपितु सत्ता और बलवंड को समझा कर उनके मन को शांत करने का अथक प्रयास किया लेकिन वे टस से मस न हुए| दोनों भाई हठ करके बैठे रहे मगर गुरु दरबार में उपस्थित न हुए|

पांचवें पातशाह श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज स्वयं सिंघासन से उठकर रबाबियों के घर पहुंचे| संगत भी गुरु जी के साथ जाना चाहती थी लेकिन सतिगुरु जी ने भाई गुरदास जी के अलावा किसी अन्य को साथ न लिया| दीन दुनिया के वाली सत्ता और बलवंड के घर पधारे तो सबब से दरवाजा खुला हुआ था| गुरु साहिब आंगन में चले गए| आगे दोनों भाई चारपाई पर बैठे थे| उन्होंने इतना जिद्दीपन अपनाया कि न उठकर श्री सतिगुरु अर्जुन देव जी को नमस्कार की और न ही उनका स्वागत किया| अपितु आंखें झुकाकर बैठे रहे| सतिगुरु जी ने नम्रता से वचन किया| अपितु आंखें झुकाकर बैठे रहे| सतिगुरु जी ने नम्रता से वचन किया, 'चलो, भाई! गुरु घर में कीर्तन करो और सतिगुरु नानक देव जी की खुशियां प्राप्त करो| गुरु घर के साथ नाराज तोना ठीक नहीं, गुरुबाणी संगत को सुनानी है| आपकी कन्या की शादी के लिए आपको पर्याप्त धन मिल जाएगा|'

राय बलवंड बड़ा गुस्सैल स्वभाव वाला साबित हुआ| उसने आगे से बड़े अहंकार के साथ कहा, 'हमने नहीं कीर्तन करने जाना| हमने आपको गुरु बनाने का प्रयास किया लेकिन आपने हमारे साथ छल करके भेंटें न चढ़ने दीं, जिससे दिल चाहे कीर्तन करवा लें| हम किसी अन्य सोढी के पास चले जाएंगे| श्री गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु रामदास जी तक हम ही गुरु बनाते आए हैं, यदि हम कीर्तन न करते तो आपको किसने गुरु मानना था?'

श्री गुरु अर्जुन देव जी ने जब ऐसे कटु वचन सुने तो बड़े सतिगुरुों की निंदा सुनी, तब वह सहन न कर सके और क्रोध में आकर वचन किया - 'सत्ता और बलवंड आप कुष्ठी हो गए हो, यह कुष्ठ आपको तंग करेगा|' यह वचन करके गुरु जी अपने दरबार में आ गए|

दरबार में आकर गुरु जी ने अपनी आत्मिक शक्ति का एक महान चमत्कार दिखाया| वह चमत्कार इस प्रकार था कि उन्होंने दरबार में हुक्म कर दिया कि आज से गुरु घर के सिक्ख आप कीर्तन किया करेंगे| साज बजाएंगे और ऐसे अहंकारी गायकों की कभी आवश्यकता नहीं रहेगी| यह वचन करके सतिगुरु जी ने दो सिक्खों को इशारा किया कि वह साज पकड़कर कीर्तन करें| सिक्खों ने साज लेकर राग गाया| ऐसा चमत्कार हुआ कि गंधर्व रागियों की तरह कीर्तन का रस बंध गया तथा सचमुच ही रबाबियों की आवश्यकता न रही|

 

सत्ता और बलवंड को कुष्ठ रोग होना 

सतिगुरु जी के वापिस आने के पश्चात सत्ता और बलवंड को सचमुच ही कुष्ठ रोग हो गया| वह जिधर को निकलते, लोग उनके दर्शन न करते और अपना द्वार बंद कर लेते, क्योंकि वह सतिगुरु जी के फिटकारे हुए थे| धीरे-धीरे रोग बढ़ गया| एकत्रित किया हुआ धन समाप्त हो गया और गुरु निंदकों को किसी सोढी या बेदी ने मुंह न लगाया| दिन-ब-दिन उनकी दशा खराब हो गई तथा वह दुःख पाने लगे|

दुखी हुए दोनों भाई चाहते थे कि सतिगुरु जी उन दोनों की भूल क्षमा कर दें लेकिन वह सतिगुरु जी के हजूर में किसी तरह भी नहीं जा सकते थे| गुरु जी ने हुक्म किया था कि जो भी कोई इन दोनों की फरियाद करेगा, उनका मुंह काला कर दिया जाएगा| जिस कारण कोई भी सिक्ख डरता हुआ सतिगुरु के समक्ष विनती न करता| सभी डरते थे कि सतिगुरु जी शायद उनको भी श्राप न दे दें|

दोनों भाई अपनी छत पर खड़े होकर अपने मुख पर आप तमाचे मारते थे और की हुई भूल पर रो-रोकर पछतावा करते| वह चिल्ला कर कहते, 'कोई हमारा दुःख सुने तथा गुरु जी के पास ले चले, हम पापी और महाकुष्ठी हैं| हमारी फरियाद सुनी जाए|' लेकिन कोई भी हां न करता जो उनकी फरियाद सुनता|

राय बलवंड को याद आया कि लाहौर में भाई लधा परोपकारी हैं| दुःख-तकलीफ उठाते हुए पैदल चलकर दोनों भाई लाहौर पहुंचे| भाई लधा जी के पास जाकर उन्होंने विलाप करके कहा, 'भाई लधा जी आप परोपकारी महापुरुष हो, यह तो आप ने सुन ही लिया है कि हमने सतिगुरु अर्जुन देव जी पातशाह के हजूर निंदा भरे वचन बोले हैं| अहंकार और लालच ने बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी| हम अन्धे और बहरे हो गए थे| सतिगुरु के वचन अनुसार हमें कुष्ठ रोग हो गया है| हम अत्यंत दु:खी हैं| कृपा करें और सतिगुरु जी से भूल क्षमा करवा दें|'

इस तरह विनती करते हुए वह रोते तथा पीटते गए| तब भाई लधा परोपकारी के मन में दया आ गई| उन्होंने वचन किया, अब आप जाएं, मैं कल सतिगुरु जी के दरबार में स्वयं हाजिर होकर प्रार्थना करूंगा और आपके लिए क्षमा की भीख मांगूंगा| आशा है कि सतिगुरु जी मेहर के घर में आएंगे|

सत्ता और बलवंड भाई लधा जी से कुछ आशा भरे वचन सुनकर उसका यश करते हुए अपने घर लौट आए|

भाई लधा जी लाहौर में सतिगुरु जी के श्रद्धालु सिक्ख थे| आप बड़े परोपकारी तथा दया धर्म और नाम के रसिया थे| जिस कारण हर कोई दुखिया उनके पास जाता और विनती करता था| उनको जब पता लगा कि सत्ता और बलवंड की जो सिफारिश करेगा उसको बदनाम होना पड़ेगा| उसकी हर तरफ बदनामी होगी, क्योंकि सतिगुरु का हुक्म है कि जो कोई सत्ता तथा बलवंड की सिफारिश करेगा उसका मुंह काला करके गधे पर बैठा कर घुमाया जाएगा| परोपकारी भाई लधा जी ने आप ही नशर होने का उपाय बना लिया| भाई लधा ने एक गधा मंगवा कर उसको चिथड़ों की लगाम डाली और फटी हुई गोदड़ी डालकर उसके ऊपर आप बैठ गए| भाई लधा ने अपने मुंह और बदन पर कालिख पोत ली और लोगों के लिए निकम्मा बन गए| वह लाहौर से अमृतसर की तरफ चल पड़े| भाई लधा जी एक महान परोपकारी गुरसिक्ख थे और अपनी हानि करके भी दूसरों का सदा भला करते थे| धीरे-धीरे चलते हुए वह अमृतसर पहुंच गए| सतिगुरु जी को पहले ही पता चल गया था| इसलिए सतिगुरु जी स्वयं आगे होकर मिले तथा हंसकर वचन किया -

'...भाई लधा जी! यह कैसा सांग बनाया हुआ है ?'

'महाराज! जिस तरह आपकी आज्ञा!' भाई लधा जी ने उत्तर दिया|

'महाराज! सत्ता और बलवंड कुष्ठ रोगी हो गए हैं तथा कुरला रहे हैं| दया कीजिए, आपका यश करेंगे, भूल अनुभव करते हैं, इन्हें क्षमा कर दें| बच्चे सदा भूलें करते रहते हैं और माता-पिता क्षमा करते रहते हैं| मेहर करें| फिर भी गुरु घर के कीर्तनीए हैं|' इस तरह भाई लधा जी ने विनती की|

सतिगुरु जी ने भाई लधा जी को गधे से नीचे उतारा और हाथ-मुंह धुलाया तथा वार दिया, 'भाई लधा परोपकारी|' यह भी वचन कर दिया, 'अच्छा! जिस तरह इन्होंने सतिगुरु महाराज (गुरु नानक देव जी तथा बाकी के गुरु साहिबों की| निंदा की थी, तैसे ही यश करें, वह जैसे-जैसे यश करते जाएंगे, वैसे ही उनका कुष्ठ रोग दूर होता जाएगा|

सतिगुरु जी का यह हुक्म सत्ता और बलवंड को सुनाया गया| उन्होंने गुरु साहिब से अपनी भूल की क्षमा मांगी व फिर से दरबार में कीर्तन करने लगे| इनके द्वारा किया गया गुरु यश बाणी के रुप में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज है| आओ दर्शन करें -

रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सत्तै डूमि आखी

१ओ सतिगुरु प्रसादि||
नाउ करता कादरु करे किउ बोलु होवै जोखीवदै ||
दे गुना सति भैण भराव है पारंगति दानु पड़ीवदै ||
नानकि राजु चलाइआ सचु कोटु सताणी नीव दै ||
लहणे धरिओनु छतु सिरि करि सिफती अंम्रितु पीवदै ||
मति गुर आतम देव दी खड़गि जोरि पराकुइ जीअ दै ||
गुरि चेले रहरासि कीई नानकि सलामति थीवदै ||
साहि टिका दितोसु जीवदै ||१||
लहणे दी फेराईऐ नानका दोही खटिऐ ||
जोति ओहा जुगति साइ सहि काइआ फेरि पलटिए ||
झुलै सु छतु निरंजनी मलि तखतु बैठा गुर हटिऐ ||
करहि जि गुर फुरमाइआ सिल जोगु अलूणी चटीऐ ||
लंगरु चलै गुर सबदि हरि तोटि न आवी खटिऐ ||
खरचे दिति खसंम दी आप खहदी खैरि दबटीऐ ||
होवै सिफति खसंम दी नूरु अरसहु झटीऐ ||
तुधु डिठे सचे पातिसाह मलु जनम जनम दी कटीऐ ||
सचु जि गुरि फुरमाइआ किऊ एदू बोलहु हटिऐ ||
पुत्री कउलु न पालिओ करि पीरहु कंन्हि मुरटीऐ ||
दिलि खोटै आकी फिरनि बंनि भारु ऊचाइन्हि छटीऐ ||
जिनि आखी सोई करे जिनि कीती तिनै थटीऐ ||
कउणु हारे किनि ऊवटीऐ ||२||
जिनि कीती सो मंनणा को सालु जिवाहे साली ||
धरम राई है देवता लै गला करे दलाली ||
सतिगुरु आखै सचा करे सो बात होवै दरहाली ||
गुर अंगद दी दोही फिरी सचु करतै बंधि बहाली ||
नानकु काइआ पलटु करि मलि तखतु बैठा सै डाली ||
दरु सेवे उमति खड़ी मसकलै होई जंगाली ||
दरि दरवेसु खसंम दै नाई सचै बाणी लाली ||
बलवंड खीवी देक जन जिसु बहुती छाउ पत्राली ||
लांगरि दउलति वंडीऐ रसु अंम्रितु खीरि घिआली ||
गुरसिखा के मुख उजले मनमुख थीए पराली ||
पए कबूलु खसंम नालि जां घाल मरदी घाली ||
माता खीवी सहु सोइ जिनि गोइ उठाली ||३||
होरिंओ गंग वहाईऐ दुनिआई आखै कि किओनु ||
नानक ईसरि जगनाथि उचहदी वैणु विरिकिओनु ||
माधाणा परबतु करि नेत्रि बासकु सबदि रिड़किओनु ||
चउदह रतन निकालिअनु करि आवा गउणु चिलाकिओनु ||
कुदरति अहि वेखालीअनु जिणि ऐवड पिड ठिणकिओनु ||
लहणे धरिओनु छत्रु सिरि असमानि किआड़ा छिकिओनु ||
जोति समाणी जोति माहि आपु आपै सेती मिकिओनु ||
सिखां पुत्रां घोखि कै सभ उमति वेखहु जिकिओनु ||
जां सुधोसु तां लहणा टिकिओनु ||४||
फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ||
जपु तपु संजमु नालि तुधु होरु मुचु गरूरु ||
लबु विणाहे माणसा जिउ पाणी बूरु ||
वारिऐ दरगह गुरु की कुदरती नूरु ||
जितु सु हाथ न लभई तूं ओहु ठरूरु ||
नउ निधि नामु निधानु है तुधु विचि भरपूरु ||
निंदा तेरी जो करे सो वंञै चूरु ||
नेड़ै दिसै मात लोक तुधु सुझै दूरु ||
फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ||५||
सो टिका सो बैहणा सोई दिबाणु ||
पियू दादे जेविहा पोता परवाणु ||
जिनि बासकु नेत्रै घतिआ करि नेहि ताणु ||
जिनि समुंदु विरोलिआ करि मेरु मधाणु ||
चउदह रतन निकालिअनु कीतोनु चानाणु ||
घोड़ा कीतो सहज दा जतु कीओ पलाणु ||
धणखु चड़ाइओ सत दा जस हंदा बाणु ||
कलि विचि धू अंधारु सा चड़िआ रै भाणु ||
सतहु खेतु जमाइओ सतहु छावाणु ||
नित रसोई तेरीऐ घिउ मैदा खाणु ||
चारे कुंडां सूझीओसु मन महि सबदु परवाणु ||
आवा गउणु निवारिओ करि नदरि नीसाणु ||
अउतरिआ अउतारु लै सो पुरखु सुजाणु ||
झखड़ि वाउ न डोलई परबतु मेराणु ||
जाणै बिरथा जीअ की जाणी हू जाणु ||
किआ सालाही सचे पातिसाह जां तू सुघड़ु सुजाणु ||
दानु जि सतिगुर भावसी सो सते दाणु ||
नानक हंदा छत्त्रु सिरि उमति हैराणु ||
सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ||
पिऊ दादै जेविहा पोत्रा परवाणु ||६||
धंनु धंनु रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सवारिआ ||
पूरी होई करामाति आपि सिरजणहारै धारिआ ||
सिखी अतै संगती पारब्रहमु करि नमसकारिआ || 
अटलु अथाहु अतोलु तू तेरा अंतु न पारावारिआ ||
जिन्ही तूं सेविआ भाउ करि से तुधु पारि उतारिआ ||
लबु लोभु कामु क्रोधु मोहु मारि कढे तुधु सपरवारिआ ||
धंनु सु तेरा थानु है सचु तेरा पैसकारिआ ||
नानकु तू लहणा तूहै गुरु अमरु तू वीचारिआ ||
गुरु डिठा तां मनु साधारिआ ||७||
चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ||
आपीन्है आपु साजिओनु आपे ही थंम्हि खलोआ ||
आपे पटी कलम आपि आपि लिखणहारा होआ || 
सभ उमति आवण जावणी आपे ही नवा निरोआ ||
तखति बैठा अरजन गुरु सतिगुर का खिवै चंदोआ ||
उगवणहु तै आथवणहु चहु चकी कीअनु लोआ ||
जिन्ही गुरू न सेविओ मनमुखा पइआ मोआ ||
दूणी चउणी करामाति सचे का सचा ढोआ ||
चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ||८||१||

इस तरह जब सत्ता तथा बलवंड ने गुरु महाराज की उस्तति की तो उनका कुष्ठ रोग दूर हो गया| भोग डाला गया तथा अमृत सरोवर में स्नान किया तथा वे तरोताजा शुद्ध हो गए| वह पुन: गुरु दरबार में कीर्तन करने लग गए|

लेकिन सतिगुरु महाराज जी ने हुक्म दिया कि आगे से तमाम सिक्ख राग तथा साज विद्या की शिक्षा प्राप्त करें तथा गुरु घर में हर कोई श्रद्धालु कीर्तन कर सकता है| रबाबियों की अजारेदारी को समाप्त कर दिया गया| वह इसलिए कि कोई शिकायत देकर कीर्तन करने से आकी न हो| यदि रागी या रबाबी न भी मिले तो भी कीर्तन होता रहे| 

भक्त परमानंद जी गनिका जी भक्त पीपा जी राजा हरिचन्द

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