Homeआध्यात्मिक न्यूज़विभिन्न देशों के मुख्य न्यायाधीशों ने भारत की न्याय व्यवस्था को सराहा

विभिन्न देशों के मुख्य न्यायाधीशों ने भारत की न्याय व्यवस्था को सराहा

विभिन्न देशों के मुख्य न्यायाधीशों ने भारत की न्याय व्यवस्था को सराहा

हाल ही में सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ ने सी.एम.एस. कानपुर रोड आॅडिटोरियम में 20वें अन्तर्राष्ट्रीय मुख्य न्यायाधीश सम्मेलन का आयोजन किया। सी.एम.एस. बुलेटिन की एडिटर डा. प्रीति शंकर से कुछ न्यायाधीशों ने बातचीत की व भारत से जुड़े कुछ अहम मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रश्न 1ः जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद को हटाने व बच्चों के सुन्दर भविष्य के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के बारे में आपके क्या विचार हैं?

उत्तरः 1. युगाण्डा के सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति, श्री आॅवास्टाइन एस नशीमिये ने कहा – भारत ने उत्तरी राज्य जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाकर एक मजबूत कदम उठाया है। इसकी हम सराहना करते हैं, किन्तु अब हमंे निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिएः

अ. जम्मू और कश्मीर व भारत के अन्य क्षेत्रों के बच्चों के बीच कोई भेदभाव नहीं होना चाहिये। उनको बराबर का दर्जा व प्रगति के अवसर मिलने चाहिए कि वे सर्वांगीण विकास कर सकें और भारत की मुख्य धारा से जुडे़।

ब. सभी पार्टियों को कानून के दायरे में रहकर शान्ति व स्थिरता बनाए रखना चाहिए।

स. मानवीय अधिकारों व स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना और उनका आदर होना चाहिए।

2. दक्षिणी अफ्रीका गणराज्य के मुख्य न्यायाधीश मोगियोना मोगियोन्ग ने कहा – बच्चों व लोगों के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए सभी उचित कदम उठाने चाहिए।

3. पेरू के सुपीरियर जज, न्यायमूर्ति जुआन मैनुएल रोसेल मरकाडो ने कहा –

धारा 370 को हटाने से जम्मू और कश्मीर के बच्चों को सुन्दर भविष्य मिलेगा। साथ ही यह आवश्यक है कि हम वहाँ के मूल निवासियों के मत का आदर करें। उनके अधिकार व स्वतंत्र विचारों को साथ में लेकर चलना चाहिए।

विभिन्न देशों के मुख्य न्यायाधीशों ने भारत की न्याय व्यवस्था को सराहा

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प्रश्न 2ः अरब देशों में काफ़ी दिनों से युद्ध व खून खराबा चल रहा है। क्या न्यायालय के दखल अंदाजी से इसको रोका जा सकता है?

उत्तरः युगाण्डाः युद्ध और आतंकवाद के खिलाफ कानून पहले से ही मौजूद है। किन्तु इसको माना नहीं जाता। लोग इसका पालन नहीं करते। प्रभावशाली देशों को एकजुट होकर देखना चाहिए कि अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान हो व इसे लागू किया जाए। अन्तर्राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के निर्णयों का पालन होना चाहिए।

उत्तर 2ः दक्षिण अफ्रीका – नहीं, न्यायपालिका इन युद्धों को नहीं रोक सकता। इनको रोकने का केवल एकमात्र तरीका है इनकी जड़ में जाना कि इनकी उत्पत्ति कैसे हुई। अफ्रीका का काँगों प्रदेश खनिज पदार्थो का धनी है। मध्य-पूर्वी देशों में तेल की भरमार है। यह देखना होगा कि इन युद्धों से फ़ायदा किसका है। ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों (जैसे सी.एम.एस. द्वारा आयोजित यह सम्मेलन) में लोग निष्पक्ष व निडर होकर अपने विचार व्यक्त कर पाते हैं व वैश्विक समस्याओं पर खुलकर बातचीत कर सकते हैं और युद्धों के कारणों को जान सकते हैं। अखबारों व मीडिया को भी इन कारणों पर प्रकाश डालना चाहिए। अपराध को सामने लाने से ही इसको खत्म कर सकते हैं, छिपाने से नहीं।

उत्तर 3ः पेरू – कोर्ट के दखल से अरब देशों में चल रहे युद्ध नहीं समाप्त होंगे। लोगों के मस्तिष्क में बदलाव आना पड़ेगा। खून खराबा केवल कानून बनाने से नहीं कम होगा। इन कानूनों का पालन भी उतना ही आवश्यक है। यदि कट्टरपंथी लोग होंगे तो कानून लागू ही नहीं किया जाएगा। लोगों के दिमाग बदलने होंगे इनको प्रगतिशील व खुले दिमाग का बनना होगा।

प्रश्न 3ः क्या न्यायालय कानून द्वारा ग्लोबल वार्मिन्ग पर अंकुश लगा सकते हैं और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग व उनकी सुरक्षा के बीच सामन्जस्य स्थापित कर सकते हैं?

उत्तर 1 – युगाण्डा – अमीर और औद्योगिक दृष्टि से सम्पन्न देश ही ओज़ोन की परत को नुकसान पहुँचा रहे हैं। अफ्रीका व दक्षिणी अमरीका के देश विकसित देशों को प्राकृतिक संसाधन करवाते हैं जिससे उनकी फैक्ट्रियाॅं चलती हैं। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों को लगाने के लिए पेड़-पौधों का चादर को नष्ट कर दिया जाता है जिससे हरियाली कम हो जाती है। कारों से भी धुँआ निकलता है जो पर्यावरण के लिए घातक है। गरीब देशों की सरकारें यदि अमीर उद्योगपतियों को अपने प्राकृतिक संसाधन नहीं उपलब्ध कराते, तो वे इन गरीब देशों में विपक्ष की पार्टियों को मजबूत करके सरकार ही गिरवा सकते हैं। इस डर से वे इन उद्योगपतियों को अपनी मनमानी करने पर मजबूर हो जाते हैं। वे पेड़ों को काटते हैं और नए पेड़ नहीं लगाते। पर्यावरण को हरा भरा रखने के लिए यह आवश्यक है कि इसके लिए अलग से पूँजी सुरक्षित रहें।

उत्तर 2ः दक्षिण अफ्रीका – हमारे पास कानून हैं पर केवल कानून से हम अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा नहीं कर सकते। हमारे देश में खनिज पदार्थ व वनों की दौलत है परन्तु उद्योगों से निकलने वाले जहरीले पदार्थ हमारी नदियों को दूषित कर रहे हैं। जिनके पास पैसा है वे ही आने-जाने के साधनों के भी मालिक हैं। वे हमारा शोषण करते हैं।

उत्तर 3 – पेरू – विकसित देश जैसे अमरीका, इन्गलैण्ड व यूरोपीय देशों के पास औद्योगिकी है जिससे प्रदूषण पर नियन्त्रण रखा जा सकता है। गरीब देशों के पास पर्यावरण प्रदूषण के ऊपर काबू पाने की प्राद्योगिकी है। अच्छे कानून के साथ हमें प्रौद्योगिक विकास की भी आवश्यकता है। जैसे कि ऐसी कारें भी विकसित की जाएँ जो पेट्रोल व डीज़ल के अलावा ऊर्जा प्रदान कर सकें जैसे सौर्य व जल ऊर्जा इत्यादि।

विभिन्न देशों के मुख्य न्यायाधीशों ने भारत की न्याय व्यवस्था को सराहा

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प्रश्न 4ः अयोध्या में राम मन्दिर बनाने के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसलें के बारे में आपका मत।

उत्तर 1 – युगाण्डा – पूरब में कई समस्याएं संस्कृति, धर्म और आस्था से जुड़ी रहती हैं समय से कई समस्याओं का स्वयं समाधान हो जाता है। समय बलवान है, समय औषधि है। एक पीढ़ी में जो मुद््दे बहुत अहम होते हैं, वे अगली पीढ़ी में हल्के पड़ जाते हैं। बच्चों की व दादा दादियों की सोच में भिन्नता होती है। जहाँ दादा दादी अपनी आस्था व सोच से बंधे हुए किसी मुद्दे की लड़ाई लड़ रहे होते हैं, वही नई पीढ़ी शायद शान्ति व सदभावना चाहते हुए उस मुद्दे पर समझौता कर लें। अयोध्या का मुद्दा एक ‘‘टाइम बाॅम’’ था। इसे सरकार व न्यायालय ने बड़ी सूझ बूझ और समझारी से सुलझाया।

उत्तर 2ः दक्षिण अफ्रीका – एक जज होने के नाते, मैं भारत के उच्चतम न्यायालय के फैसलें का सम्मान करता हूँ।

उत्तर 3ः पेरू – स्पेन व अन्य पूर्वी यूरोपीय देशों में कई मस्जिदें है, जिन पर गिरजेघर (चर्च) बना दिये गये हैं व गिरजों पर मस्जिदें। यह मुद्दे ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रूप से काफी संवदेनशील हैं। न्यायालयों को लोगों की आस्था व विश्वास को ध्यान मंे रखते हुए निर्णय लेने पड़ते हैं। प्रत्येक केस (विवाद) अनूठा व अलग होता है। एक आम या समान वाक्य नहीं बोला जा सकता। अन्त में कानून की सर्वोपरि है। यह वाकई में सराहनीय है कि भारत में इस मुद्दे का कितने शान्ति पूर्ण ढं़ग से निबटारा किया गया इसकी मैं दाद देता हूँ।

(हरि ओम शर्मा)
मुख्य जन-सम्पर्क अधिकारी
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

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