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रात कैसी बीती?

एक बाबाजी घूमते-फिरते एक शहर में पहुँचे| रात हो गयी थी| सरदी के दिन थे| शहर का दरवाजा बंद हो गा था| बाबाजी को ठण्ड लगी| गरम कपड़ा पास में था नहीं| बाबा जी ने सोने के लिये जगह देखी| एक भड़भूँजे की भट्ठी थी|

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बाबा जी ने देखा कि यह जगह बढ़िया है| भट्ठी के भीतर थोड़ी-थोड़ी गरमाहट थी| बाबा जी उसके भीतर जाकर सो गये|

सुबह हुई| बाबा जी की नींद खुली| बगल में ही राजा का महल था| उधर राजा की नींद खुली| राजा ने अपने साथियों से पूछा-‘कहो भाई! रात कैसी बीती?’ इधर बाबाजी भट्ठी के भीतर से बोले-‘कुछ तुम्हारे-जैसी, कुछ तुम्हारे से अच्छी!’ राजा को अनजानी आवाज सुनकर थोड़ा आश्चर्य हुआ| राजा ने फिर पूछा -‘रात कैसी बीती?’ बाबाजी ने फिर कहा-‘कुछ तुम्हारे-जैसी, कुछ तुम्हारे से अच्छी!’ राजा ने अपने आदमियों को भेजा कि जाकर देखो, ‘यह कौन बोल रहा है? उसको पकड़कर मेरे सामने लाओ|’ राजपुरुषों ने बाहर जाकर चारों ओर देखा, पर उनको कोई दिखाई नहीं दिया| जब पुनः बाबाजी ने वही बात कही, तब राजपुरुषों ने देखा कि भट्ठी के भीतर एक बाबाजी बैठे हैं, वही बोल रहे हैं! उन्होंने बाबाजी से कहा कि चलो, आपको राजा ने बुलाया है| बाबाजी ने कहा कि मैंने कौन-सा अपराध किया है, जिसके कारण राजा ने मेरे को बुलाया है? राजपुरुषों ने कहा कि आपके किसी अपराध के कारण राजा ने नहीं बुलाया है, वे तो आपसे मिलकर कुछ बात करना चाहते हैं| बाबाजी भट्ठी से बाहर निकले| उनके मुखपर और शरीर पर जगह-जगह भट्ठी की राख लगी हुई थी| कहीं-कहीं कालिख लगी हुई थी! वे उसी अवस्था में राजपुरुषों के साथ चल पड़े|

राजपुरुषों ने बाबाजी को राजा के सामने लाकर खड़ा कर दिया| राजा ने बाबाजी को प्रणाम किया और पूछा कि मेरे प्रश्न का उत्तर आपने दिया था? बाबाजी बोले-‘मैंने प्रश्न सुना तो उत्तर दे दिया, मेरे को पता नहीं कि प्रश्न आपने किया था!’ राजा ने कहा-‘मैंने पूछा कि रात कैसे बीती तो आपने उत्तर दिया कि कुछ तुम्हारे-जैसी, कुछ तुम्हारे से अच्छी| अब आप बतायें कि रात मेरे-जैसी कैसी बीती? मैं तो महल में सोया था और आप भट्ठी में , फिर मेरे-जैसी कैसे हुई?’ बाबाजी बोले-‘जब मैं और आप सो गये, तब न तो मेरे को भट्ठी याद रही और न आपको महल याद रहा, तो हम दोनों बराबर हो गये न? आप नरम नरम गद्दों पर सोये, मैं नरम-नरम राख पर सोया!’ राजा बोला-‘और मेरे से अच्छी कैसे हुई?’ बाबाजी बोले-‘नींद खुलते ही आपको अपनी और राज्य की सैकड़ो चिंताएँ सताने लगीं, पर मेरे को कोई चिन्ता है ही नहीं! इसलिये मेरी रात आपसे भी अच्छी बीती!’

चाह गयी चिन्ता मिटी, मनुआँ बेपरवाह|
जिनको कछु न चाहिये, सो साहन के साह||   

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