मीरा बाई जी (46)

हरो जन की भीर

हरि तुम हरो जन की भीर।द्रोपदी की लाज राखी चट बढ़ायो चीर॥

मेरो दरद न जाणै कोय

हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।घायल की गति घायल जाणै जो कोई घायल होय।

पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायो

पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायो॥ टेक॥वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु किरपा कर अपनायो॥

राखौ कृपानिधान

अब मैं सरण तिहारी जी मोहि राखौ कृपा निधान।अजामील अपराधी तारे तारे नीच सदान।

दूर नगरी बड़ी दूर नगरी-नगरी कैसे आऊं मैं तेरी गोकुल नगरी

दूर नगरी बड़ी दूर नगरी-नगरीकैसे आऊं मैं तेरी गोकुल नगरीदूर नगरी बड़ी दूर नगरी

पग घुंघरूं बांध मीरा नाची रे

पग घुंघरूं बांध मीरा नाची रे॥मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गै दासी रे।पग घुंघरूं बांध मीरा नाची रे।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर काटो जम का फंदा

नटवर नागर नन्दा भजो रे मन गोविन्दाश्याम सुन्दर मुख चन्दा भजो रे मन गोविन्दा।

दरस म्हारे बेगि दीज्यो जी

दरस म्हारे बेगि दीज्यो जीओ जी अन्तरजामी ओ राम खबर म्हारी बेगि लीज्यो जीआप बिन मोहे कल ना पडत है जीओजी तडपत हूं दिन रैन रैन में नीर ढले है जी

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥

राणोजी रूठे तो म्हारो कांई करसी म्हे तो गोविन्दरा गुण गास्यां हे माय

राणोजी रूठे तो म्हारो कांई करसी म्हे तो गोविन्दरा गुण गास्यां हे माय॥

आज मोहिं लागे वृन्दावन नीको

आज मोहिं लागे वृन्दावन नीको॥घर-घर तुलसी ठाकुर सेवा दरसन गोविन्द जी को॥१॥

गली तो चारों बंद हु हैं मैं हरिसे मिलूं कैसे जाय

गली तो चारों बंद हु हैं मैं हरिसे मिलूं कैसे जाय॥ऊंची-नीची राह रपटली पांव नहीं ठहराय।सोच सोच पग धरूं जतन से बार-बार डिग जाय॥

तुम बिन नैण दुखारा

म्हारे घर आ प्रीतम प्यारा॥तन मन धन सब भेंट धरूंगी भजन करूंगी तुम्हारा।म्हारे घर आ प्रीतम प्यारा॥

प्रभु कब रे मिलोगे

प्रभु जी तुम दर्शन बिन मोय घड़ी चैन नहीं आवड़े॥टेक॥अन्न नहीं भावे नींद न आवे विरह सतावे मोय।घायल ज्यूं घूमूं खड़ी रे म्हारो दर्द न जाने कोय॥१॥

मोहन गिरवरधारीको म्हारो प्रणाम

म्हारो प्रणाम बांकेबिहारीको।मोर मुकुट माथे तिलक बिराजे।

दरस बिन दूखण लागे नैन

दरस बिन दूखण लागे नैन।जबसे तुम बिछुड़े प्रभु मोरे कबहुं न पायो चैन।

स्याम मने चाकर राखो जी गिरधारी लाला चाकर राखो जी

स्याम मने चाकर राखो जी गिरधारी लाला चाकर राखो जी।

म्हांरो अरजी

तुम सुणो जी म्हांरो अरजी।भवसागर में बही जात हूं काढ़ो तो थांरी मरजी।

तेरो कोई नहिं रोकणहार मगन हो मीरा चली

तेरो कोई नहिं रोकणहार मगन हो मीरा चली॥लाज सरम कुल की मरजादा सिरसै दूर करी।मान-अपमान दो धर पटके निकसी ग्यान गली॥

होरी खेलत हैं गिरधारी

होरी खेलत हैं गिरधारी।मुरली चंग बजत डफ न्यारो।

बंसीवारा आज्यो म्हारे देस। सांवरी सुरत वारी बेस

बंसीवारा आज्यो म्हारे देस। सांवरी सुरत वारी बेस॥आऊं-आऊं कर गया जी कर गया कौल अनेक।गिणता-गिणता घस ग म्हारी आंगलिया री रेख॥

मीरा शरण गही चरणन की लाज रखो महाराज

अब तो निभायां सरेगी बांह गहे की लाज।समरथ शरण तुम्हारी सैयां सरब सुधारण काज॥

मैं गिरधर के घर जाऊं

मैं गिरधर के घर जाऊं।गिरधर म्हांरो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं॥

कोई कहियौ रे प्रभु आवनकी

कोई कहियौ रे प्रभु आवनकीआवनकी मनभावन की।

सखी मेरी नींद नसानी हो

सखी मेरी नींद नसानी हो।पिवको पंथ निहारत सिगरी रैण बिहानी हो।

बादल देख डरी हो स्याम मैं बादल देख डरी

बादल देख डरी हो स्याम मैं बादल देख डरी।श्याम मैं बादल देख डरी।

बसो मोरे नैनन में नंदलाल

बसो मोरे नैनन में नंदलाल।मोहनी मूरति सांवरि सूरति नैणा बने बिसाल।अधर सुधारस मुरली राजत उर बैजंती-माल॥

प्रभुजी थे कहां गया नेहड़ो लगाय

प्रभुजी थे कहां गया नेहड़ो लगाय।छोड़ गया बिस्वास संगाती प्रेम की बाती बलाय॥

सहेलियां साजन घर आया हो

सहेलियां साजन घर आया हो।बहोत दिनां की जोवती बिरहिण पिव पाया हो॥

जागो बंसीवारे जागो मोरे ललन

जागो बंसीवारे जागो मोरे ललन।रजनी बीती भोर भयो है घर घर खुले किवारे।जागो बंसीवारे जागो मोरे ललन॥

हे मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी री

हे मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी री।कैं कहुं काज किया संतन का।कैं कहुं गैल भुलावना॥

स्वामी सब संसार के हो सांचे श्रीभगवान

स्वामी सब संसार के हो सांचे श्रीभगवान॥स्थावर जंगम पावक पाणी धरती बीज समान।सबमें महिमा थांरी देखी कुदरत के कुरबान॥

हरि मेरे जीवन प्राण अधार

हरि मेरे जीवन प्राण अधार।और आसरो नांही तुम बिन तीनूं लोक मंझार॥हरि मेरे जीवन प्राण अधार

पपैया रे पिवकी बाणि न बोल

पपैया रे पिवकी बाणि न बोल।सुणि पावेली बिरहणी रे थारी रालेली पांख मरोड़॥

मैं तो सांवरे के रंग राची

मैं तो सांवरे के रंग राची।साजि सिंगार बांधि पग घुंघरू लोक-लाज तजि नाची॥

बरसै बदरिया सावन की सावन की मनभावन की

बरसै बदरिया सावन की सावन की मनभावन की।सावन में उमग्यो मेरो मनवा भनक सुनी हरि आवन की।

आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी

आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी।

बाला मैं बैरागण हूंगी

बाला मैं बैरागण हूंगी।जिन भेषां म्हारो साहिब रीझे सोही भेष धरूंगी।सील संतोष धरूं घट भीतर समता पकड़ रहूंगी।

मन रे परसि हरिके चरण

मन रे परसि हरिके चरण।सुभग सीतल कंवल कोमलत्रिविध ज्वाला हरण।जिण चरण प्रहलाद परसे इंद्र पदवी धरण॥

प्यारे दरसन दीज्यो आय तुम बिन रह्यो न जाय

प्यारे दरसन दीज्यो आय तुम बिन रह्यो न जाय॥जल बिन कमल चंद बिन रजनी ऐसे तुम देख्यां बिन सजनी।आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन बिरह कालजो खाय॥

सुण लीजो बिनती मोरी मैं शरण गही प्रभु तेरी

सुण लीजो बिनती मोरी मैं शरण गही प्रभु तेरी।तुम तो पतित अनेक उधारे भव सागर से तारे॥

प्रभुजी मैं अरज करुं छूं म्हारो बेड़ो लगाज्यो पार

प्रभुजी मैं अरज करुं छूं म्हारो बेड़ो लगाज्यो पार॥

गोबिन्द कबहुं मिलै पिया मेरा

गोबिन्द कबहुं मिलै पिया मेरा।चरण-कंवल को हंस-हंस देखू राखूं नैणां नेरा।गोबिंद कबहुं मिलै पिया मेरा।

तनक हरि चितवौ जी मोरी ओर

तनक हरि चितवौ जी मोरी ओर।हम चितवत तुम चितवत नाहीं मन के बड़े कठोर।

राम मिलण के काज सखी मेरे आरति उर में जागी री

राम मिलण के काज सखी मेरे आरति उर में जागी री।तड़पत-तड़पत कल न परत है बिरहबाण उर लागी री।

म्हारे घर होता जाज्यो राज

म्हारे घर होता जाज्यो राज।अबके जिन टाला दे जा सिर पर राखूं बिराज॥
 

नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

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