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विश्वरूप का दर्शन (अध्याय 11 शलोक 14 से 31)

विश्वरूप का दर्शन (अध्याय 11 शलोक 14 से 31)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 14

संजय उवाच (Sanjay Said):

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥11- 14॥

Hतब विस्मय (आश्चर्य) पू्र्ण होकर जिसके रोंगटे खड़े हो गये थे, उस धनंजयः ने उन देव को सिर झुका कर प्रणाम किया और हाथ जोड़ कर बोले।

EThen overwhelmed by awe and with his hair standing on end, Arjun paid obeisance to the great God and spoke thus with folded hands.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 15

अर्जुन उवाच (Arjun Said):

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान्।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥11- 15॥

Hहे देव, मुझे आप के देह में सभी देवता और अन्य समस्त जीव समूह, कमल आसन पर स्थित ब्रह्मा ईश्वर, सभी ऋषि, और दिव्य सर्प दिख रहे हैं।

EI see in you, O Lord, all the gods, hosts of beings. Brahma on his lotus-seat, Mahadev, all the great sages, and miraculous serpents.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 16
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥11- 16॥

Hअनेक बाहें, अनेक पेट, अनेक मुख, अनेक नेत्र, हे देव, मैं आप को हर जगह देख रहा हूँ, हे अनन्त रुप। ना मुझे आपका अन्त, न मध्य, और न ही आदि (शुरुआत) दिख रहा, हे विश्वेश्वर (विश्व के ईश्वर), हे विश्व रुप (विश्व का रुप धारण किये हुये)।

EO Lord of all the worlds, I behold your many stomachs, mouths, and eyes as well as your infinite forms of all kinds, but, O the Omnipresent, I can see neither your end, your middle, nor your beginning.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 17
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥11- 17॥

Hमुकुट, गदा और चक्र धारण किये, और अपनी तेजोराशि से संपूर्ण दिशाओं को दीप्त करते हुये, हे भगवन्, आप को मैं देखता हूँ, लेकिन आपका निरीक्षण करना अत्यन्त कठिन है क्योंकि आप समस्त ओर से प्रकाशमयी, अप्रमेय (जिसके समान कोई न हो) तेजोमयी हैं।

EI see you crowned and armed with a mace and a chakr, luminous all over, like blazing fire and the sun, dazzling, and immeasurable.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥11- 18॥

Hआप ही अक्षर (जिसका कभी नाश नहीं होता) हैं, आप ही परम हैं, आप ही जानना ज़रुरी है (जिन्हें जाना जाना चाहिये), आप ही इस विश्व के परम निधान (आश्रय) हैं। आप ही अव्यय (विकार हीन) हैं, मेरे मत में आप ही शाश्वत धर्म के रक्षक सनातन पुरुष हैं।

EI believe that you are Akshar, the imperishable God who is worthy of being known, the supreme goal of the Self, the great haven of the world, keeper of eternal Dharm, and the universal Supreme Spirit.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 19
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥11- 19॥

Hआप आदि, मध्य और अन्त रहित (अनादिमध्यान्तम), अनन्त वीर्य (पराक्रम), अनन्त बाहू (बाजुयें) हैं। चन्द्र (शशि) और सूर्य आपके नेत्र हैं। हे भगवन, मैं आपके आग्नि पूर्ण प्रज्वलित वक्त्रों (मूँहों) को देखता हूँ जो अपने तेज से इस विश्व को तपा (गरमा) रहे हैं।

EI see you without beginning, end or middle, possessed of boundless might, innumerable hands, eyes like the sun and the moon, and a face as bright as fire, lighting up the world with your radiance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 20
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥11- 20॥

Hस्वर्ग (आकाश) और पृथिवी के बीच में जो भी स्थान है, सभी दिशाओं में, वह केवल एक आप के द्वारा ही व्याप्त है (स्वर्ग से लेकर पृथिवी तक केवल आप ही हैं)। आप के इस अद्भुत उग्र (घोर) रूप को देख कर, हे महात्मा, तीनों लोक प्रव्यथित (भय व्याकुल) हो रहे हैं।

EAnd, O Supreme Being, the whole space between heaven and earth is filled up by you and the three worlds are trembling with fear at the sight of your divine but terrible form.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 21
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥11- 21॥

Hआप ही में देवता गण प्रवेश कर रहे हैं। कुछ भयभीत हुये हाथ जोड़े आप की स्तुति कर रहे हैं। महर्षी और सिद्ध गण स्वस्ति (कल्याण हो) उच्चारण कर उत्तम स्तुतियों द्वारा आप की प्रशंसा कर रहे हैं।

EMultitudes of gods are dissolving in you while a host of them are fearfully extolling your name and glories with folded hands, and, repeatedly pronouncing benediction, hosts of great sages and men of attainment are singing sublime hymns in your praise.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 22
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥11- 22॥

Hरूद्र, आदित्य, वसु, साध्य गण, विश्वदेव, अश्विनी कुमार, मरूत गण, पितृ गण, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध गण – सब आप को विस्मय से देखते हैं।

EThe Rudr, sons of Aditi, Vasu, Sadhya,8 sons of vishwa, the Ashwin, Marut, Agni and hordes of gandharv, yaksh, demons and men of achievement, are all looking up at you with marvel.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 23
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥11- 23॥

Hहे महाबाहो, बहुत से मुख, बहुत से नेत्र, बहुत सी बाहुयें, बहुत सी जँगाऐं (उरु), पैर, बहुत से उदर (पेट), बहुत से विकराल दांतो वाले इस महान् रूप को देख कर यह संसार प्रव्यथित (भयभीत) हो रहा है और मैं भी।

ELooking at your colossus form with its many mouths and eyes, hands, thighs and feet, stomachs and dreadful tusks, O the mighty-armed, all beings are struck with terror and so am I.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 24
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥11- 24॥

Hआकाश को छूते, अनेकों प्रकार (वर्णों) वाले आपके दीप्तमान रूप, जिनके खुले हुये विशाल मुख हैं और प्रज्वलित (दिप्तमान) विशाल नेत्र हैं – आपके इस रुप को देख कर मेरी अन्तर आत्मा भयभीत (प्रव्यथित) हो रही है। न मुझे धैर्य मिल रहा हैं, हे विष्णु, और न ही शान्ति।

EWhen I look at your enormous, dazzling form that reaches right up to the sky, with its numerous manifestations, wide open mouth, and huge glowing eyes, O Vishnu, my inmost soul trembles in fear, I am bereft of courage and peace of mind.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 25
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥11- 25॥

Hआपके विकराल भयानक दाँतो को देख कर और काल-अग्नि के समान भयानक प्रज्वलित मुखों को देख कर मुझे दिशाओं कि सुध नहीं रही, न ही मुझे शान्ति प्राप्त हो रही है। प्रसन्न होईये हे देवेश (देवों के ईश), हे जगन्-निवास।

ESince I have lost my sense of direction and joy by beholding your faces with their frightening tusks and flaming like the great conflagration that is believed to consume the world in the event of doom, I entreat you, O God of gods, to be merciful and pacified.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 26, 27
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥11- 26॥

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥11- 27॥

Hधृतराष्ट्र के सभी पुत्र और उनके साथ और भी राजा लोग, श्री भीष्म, द्रोण, तथा कर्ण और हमारे पक्ष के भी कई मुख्य योधा आप के भयानक विकराल दाँतों वाले मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। और आप के दाँतों मे बीच फसें कईयों के सिर चूर्ण हुये दिखाई दे रहे हैं।

EAnd I see Dhritrashtr’s sons along with many other kings, Bheeshm, Dronacharya, Karn, even the commanders of our side and all… Beings rushing wildly into your dreadful mouth with its terrible tusks, and some of them lying between your teeth with crushed heads.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 28
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥11- 28॥

Hजैसे नदियों के अनेक जल प्रवाह वेग से समुद्र में प्रवेश करते हैं (की ओर बढते हैं), वैसे ही नर लोक (मनुष्य लोक) के यह योद्धा आप के प्रज्वलित मुखों में प्रवेश करते हैं।

EWarriors of the human world are flinging themselves into your flaming mouths just as numerous rivers plunge into the ocean.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 29
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥11- 29॥

Hजैसे जलती अग्नि में पतंगे बहुत तेज़ी से अपने ही नाश के लिये प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार अपने नाश के लिये यह लोग अति वेग से आप के मुखों में प्रवेश करते हैं।

EThey cast themselves into your mouths for their destruction just as flying insects fling themselves into the flame.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 30
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥11- 30॥

Hअपने प्रज्वलित मुखों से इन संपूर्ण लोकों को निगलते हुये और हर ओर से समेटते हुये, हे विष्णु, आपका यह उग्र प्रकाश संपूर्ण जगत में फैल कर इन लोकों को तपा रहा है।

EDevouring all the worlds with your flaming mouths and licking your lips, your intense lustre is consuming the whole world by filling it with its radiance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 31
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥11- 31॥

Hइस उग्र रुप वाले आप कौन हैं, मुझ से कहिये। आप को प्रणाम है हे देववर, प्रसन्न होईये। हे आदिदेव, मैं आप को अनुभव सहित जानना चाहता हूँ। मैं आपकी प्रवृत्ति अर्थात इस रुप लेने के कारण को नहीं जानता।

ESince I am ignorant of your nature, O Primal Being, and wish to know its reality, I pay my humble obeisance and pray you, O supreme God, to tell me who you are in this terrible form.

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