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Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता10. विभूतियोगभक्तियोग की व्याख्या (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 10 शलोक 8 से 11)

भक्तियोग की व्याख्या (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 10 शलोक 8 से 11)

भक्तियोग की व्याख्या (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 10 शलोक 8 से 11)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 8

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥10- 8॥

Hमैं ही सब कुछ का आरम्भ हूँ, मुझ से ही सबकुछ चलता है। यह मान कर बुद्धिमान लोग पूर्ण भाव से मुझे भजते हैं।

EAware of the reality that I am the source of all creation as also the motive that stirs it to effort, and possessed of faith and devotion, wise men remember and worship only me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 9
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥10- 9॥

Hमुझ में ही अपने चित्त को बसाऐ, मुझ में ही अपने प्राणों को संजोये, परस्पर एक दूसरे को मेरा बोध कराते हुये और मेरी बातें करते हुये मेरे भक्त सदा संतुष्ट रहते हैं और मुझ में ही रमते हैं।

EThey who anchor their minds on me, sacrifice their breath to me, and are contented with speaking only of my greatness among themselves, always dwell in me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥10- 10॥

Hऍसे भक्त जो सदा भक्ति भाव से भरे मुझे प्रीति पूर्ण ढंग से भजते हैं, उनहें मैं वह बुद्धि योग (सार युक्त बुद्धि) प्रदान करता हूँ जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त करते हैं।

EI bestow upon the devotees, who always remember me and adore me with love, that discipline of yog by learning which they attain to none but me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥10- 11॥

Hउन पर अपनी कृपा करने के लिये मैं उनके अन्तकरण में स्थित होकर, अज्ञान से उत्पन्न हुये उनके अँधकार को ज्ञान रूपी दीपक जला कर नष्ट कर देता हूँ।

ETo extend my grace to them, I dwell in their innermost being and dispel the gloom of ignorance by the radiance of knowledge.

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Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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