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गुण अनुसार भेद वर्णन (अध्याय 17 शलोक 7 से 22)

गुण अनुसार भेद वर्णन (अध्याय 17 शलोक 7 से 22)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 7

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥17- 7॥

Hप्राणियों को जो आहार प्रिय होता है वह भी तीन प्रकार का होता है। वैसे ही यज्ञ, तप तथा दानसभी – ये सभी भी तीन प्रकार के होते हैं। इन का भेद तुम मुझ से सुनो।

EListen to me (as I tell you) the distinction between the three kinds of yagya, penance, and alms, that are like the three kinds of food relished according to individual taste.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 8
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥17- 8॥

Hजो आहार आयु बढाने वाला, बल तथा तेज में वृद्धि करने वाला, आरोग्य प्रदान करने वाला, सुख तथा प्रीति बढाने वाला, रसमयी, स्निग्ध (कोमल आदि), हृदय की स्थिरता बढाने वाला होता है – ऐसा आहार सातविक लोगों को प्रिय होता है।

EFood that is naturally pleasing and conducive to life, intellect, strength, sound health, happiness, and satisfaction besides being savoury, tender, and durable is loved by the virtuous.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 9
कट्‌वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥17- 9॥

Hकटु (कडवा), खट्टा, ज्यादा नमकीन, अति तीक्षण (तीखा), रूखा या कष्ट देने वाला – ऐसा आहार जो दुख, शोक और राग उत्पन्न करने वाला है वह राजसिक मनुष्यों को भाता है।

EBitter, sour, salty, too hot, pungent, rough, and acidic food that gives rise to sorrow, worries, and illness, is preferred by the passionate.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 10
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥17- 10॥

Hजो आहार आधा पका हो, रस रहित हो गया हो, बासा, दुर्गन्धित, गन्दा या अपवित्र हो – वैसा तामसिक जनों को प्रिय लगता है।

EFood that is half-cooked, unsavoury, odorous, stale, leftover, and defiled is liked by men with a dull sensibility.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 11
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥17- 11॥

Hजो यज्ञ फल की कामना किये बिना, यज्ञ विधि अनुसार किया जाये, यज्ञ करना कर्तव्य है – मन में यह बिठा कर किया जाये वह सात्त्विक है।

EYagya that has scriptural sanction and the performance of which is an obligation, is fitting and auspicious when it is practised by persons with intent minds who aspire to no reward.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 12
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥17- 12॥

Hजो यज्ञ फल की कामना से, और दम्भ (दिखावे आदि) के लिये किया जाये, हे भारत श्रेष्ठ, ऐसे यज्ञ को तुम राजसिक जानो।

EAnd, O the unequalled among Bharat, be it known to you that the yagya which is embarked upon for mere ostentation, or even with a view to some reward, is contaminated by passion and moral blindness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 13
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥17- 13॥

Hजो यज्ञ विधि हीन ढंग से किया जाये, अन्न दान रहित हो, मन्त्रहीन हो, जिसमें कोई दक्षिणा न हो, श्रद्धा रहित हो – ऐसे यज्ञ को तामसिक यज्ञ कहा जाता है।

EDevoid of scriptural sanction and powerless to invoke the Supreme Spirit as well as to restrain the mind, the yagya that is engaged in without a sense of total sacrifice and faith is said to be demoniacal
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 14
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥17- 14॥

Hदेवताओं, ब्राह्मण, गुरु और बुद्धिमान ज्ञानी लोगों की पूजा, शौच (सफाई, पवित्रता), सरलता, ब्रह्मचार्य, अहिंसा – यह सब शरीर की तपस्या बताये जाते हैं।

EAdoration of God, the twice-born, the teacher-preceptor, and of the learned, along with having the qualities of innocence, uprightness, chastity, and disinclination to violence-are said to be penance of the body.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 15
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥17- 15॥

Hउद्वेग न पहुँचाने वाले सत्य वाक्य जो सुनने में प्रिय और हितकारी हों – ऐसे वाक्य बोलना, शास्त्रों का स्वध्याय तथा अभ्यास ये वाणी की तपस्या बताये जाते है।

EAnd utterance that does not agitate but is soothing, propitious, and truthful, and which is but an exercise in the study of Ved, in remembrance of the Supreme Being, and in Self-contemplation, is said to be the penance of speech.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 16
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥17- 16॥

Hमन में शान्ति (से उत्पन्न हुई प्रसन्नता), सौम्यता, मौन, आत्म संयम, भावों (अन्तःकरण) की शुद्धि – ये सब मन की तपस्या बताये जाते हैं।

EAffable temperament, tranquillity, silent meditation, selfpossession, inner purity, and the like are said to be penance of the mind.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 17
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥17- 17॥

Hमनुष्य जिस श्रद्धा से तपस्य करता है, वह भी तीन प्रकार की है। सातविक तपस्या वह है जो फल की कामना से मुक्त होकर की जाती है।

EThe threefold types of penance undergone with utmost faith by selfless persons who do not desire any fruit thereof is said to be truly righteous.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 18
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥17- 18॥

Hजो तपस्या सत्कार, मान तथा पूजे जाने के लिये की जाती है, या दिखावे अथवा पाखण्ड से की जाती है, ऐसी अस्थिर और अध्रुव (जिस का असतित्व स्थिर न हो) तपस्या को राजसिक कहा जाता है।

EAnd if undergone with the purpose of gaining homage, honour, and adoration, or for mere display, penance is unsteady and ephemeral, and is said to have the property of rajas.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 19
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥17- 19॥

Hवह तप जो मूर्ख आग्रह कारण (गलत धारणा के कारण) और स्वयं को पीडा पहुँचाने वाला अथवा दूसरों को कष्ट पहुँचाने हेतु किया जाये, ऐसा तप तामसिक कहा जाता है।

EThe penance that is undertaken out of mere stupid stubbornness or to hurt others is said to be diabolical.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 20
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥17- 20॥

Hजो दान यह मान कर दिया जाये की दान देना कर्तव्य है, न कि उपकार करने के लिये, और सही स्थान पर, सही समय पर उचित पात्र (जिसे दान देना चाहिये) को दिया जाये, उस दान को सात्विक दान कहा जाता है।

EAnd the alms that are given to the right person at the right place and time, and in the spirit that charity is a bounden duty done without any expectation, are said to be good.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 21
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥17- 21॥

Hजो दान उपकार हेतु, या पुनः फल की कामना से दिया जाये, या कष्ट भरे मन से दिया जाये उसे राजसिक कहा जाता है।

EAnd alms which are offered grudgingly and for a good turn in exchange, or with some recompense in view, is said to be impulsive and morally improper.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 22
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥17- 22॥

Hपरन्तु जो दान गलत स्थान पर या गलत समय पर, अनुचित पात्र को दिया जाये, या बिना सत्कार अथवा तिरस्कार के दिया जाये, उसे तामसिक दान कहा जायेगा।

EAnd the alms which are dispensed without deference or contemptuously to unworthy recipients at an inappropriate place and time are said to be diabolical.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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